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किरणमयी नायक महिलाओं की साख से खेल गई..

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-सुनील कुमार॥
छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग के अध्यक्ष डॉ. किरणमयी नायक का एक चौंकाने वाला बयान आया है जिसमें उन्होंने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि ज्यादातर मामलों में लड़कियां पहले से सहमति से संबंध बनाती हैं, लिव-इन में रहती हैं, और बात बिगडऩे पर रेप का केस दर्ज करा देती हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे रिश्ते में पडऩे का नतीजा बुरा होता है। कई लड़कियां तो 18 साल की होते ही शादी कर लेती हैं, और बच्चा होने पर आयोग में शिकायत लेकर आती हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी लड़कियों को फिल्मी तरीके से किसी के चक्कर में नहीं पडऩा चाहिए।


किरणमयी नायक महज कांग्रेस सरकार की मनोनीत आयोग अध्यक्ष नहीं हैं, वे लंबे समय से कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय रही हैं, और पेशे से एक वकील भी हैं। वे कानून को और लोगों के मुकाबले बेहतर समझती हैं, और इसलिए भी उनका यह बयान हक्का-बक्का करता है। बलात्कार की शिकायतों में भारत में यह कानूनी व्यवस्था लंबे समय से है कि बलात्कार की शिकायत कर रही लडक़ी या महिला की नीयत पर जज भी शक नहीं करेंगे। मोटेतौर पर उसकी शिकायत को तब तक सही ही माना जाएगा जब तक वह गलत या झूठी साबित न हो जाए। जब कानून में ही ऐसी व्यवस्था करके रखी है, तो महिला आयोग की अध्यक्ष का बयान उनकी कानूनी जिम्मेदारी के ठीक उल्टे जा रहा है। महिला आयोग का तो जिम्मा ही यही है कि उसके पास आने वाली लड़कियों और महिलाओं की शिकायतों पर वह गौर करे, जो मामले सार्वजनिक रूप से उसकी नजर में भी आते हैं, उन पर गौर करे। अब अगर आयोग की अध्यक्ष ही महिलाओं की शिकायतों पर शक करते हुए उन्हें झूठी शिकायतें न करने की नसीहत दे रही हैं, तो ऐसा लगता है कि महिला आयोग का नजरिया भी समाज में चली आ रही पुरूषवादी सोच से ही उपजा हुआ है। अगर किसी लडक़ी या महिला की शिकायत झूठी है, तो उस पर आयोग भी जांच करने के बाद उसे खारिज कर सकता है, और अदालत भी। लेकिन शिकायतों को लेकर ऐसा आम बयान तो नाजायज है।


हिन्दुस्तान में दिक्कत यह है कि ताकत की जगह पर बैठने के बाद भी महिलाएं दूसरी महिलाओं के हक के आम मुद्दे को नहीं समझ पाती हैं। कई सांसद और भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री भी किसी आंदोलन के दौरान किसी सरकार को उसकी निष्क्रियता, निकम्मेपन, या गैरजिम्मेदारी के लिए चूडिय़ां भेंट करने चली जाती हैं मानो चूडिय़ां कायरता या कमजोरी का प्रतीक हैं। अभी हमें जितना याद पड़ता है उसके मुताबिक इंदिरा गांधी ने प्रदर्शन के इस तरीके की आलोचना की थी, और इंदिरा गांधी को गुजरे भी कई दशक हो चुके हैं। तब से अब तक गंगा का पानी और बहुत प्रदूषित हो चुका है, लेकिन लोगों की सोच नहीं बदली है। अभी कुछ महीने पहले ही खबरों में आए एक बड़े विरोध-प्रदर्शन में बड़ी पार्टियों की प्रमुख महिलाएं किसी सरकार को चूडिय़ां भेंट करते दिख रही थीं।


हिन्दुस्तानी समाज में एक तो वैसे भी महिलाओं के साथ सैकड़ों बरस का भेदभाव चले ही आ रहा है। पहले महिलाओं को सती बनाया जाता था, फिर कन्या भ्रूण हत्या लोकप्रिय थी जो कि आज तक दबे-छुबे चली आ रही है, और दहेज-हत्या, बलात्कार, कामकाज की जगह पर यौन शोषण बहुत ही आम बात है। इन सबके साथ-साथ घर में पुरूषों और लडक़ों के खाना खा लेने के बाद ही महिला और लड़कियों की बारी आती है। एक-दो बरस पहले मुंबई के टाईम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट थी कि वहां के टाटा कैंसर हॉस्पिटल में बच्चों में कैंसर की पहचान होने के बाद उन्हें इलाज के लिए वापिस लाए जाने वाले बच्चों में लड़कियां गिनी-चुनी ही रहती हैं, और तमाम लडक़े इलाज के लिए लाए जाते हैं। अब आंकड़ों और तथ्यों पर आधारित एक जिम्मेदार अस्पताल का यह निष्कर्ष एक बड़ा सुबूत है कि हिन्दुस्तान में लडक़ों को बचाने लायक माना जाता है, और लड़कियों को मरने के लिए छोड़ देने के लायक।


इन्हीं तमाम बातों को देखते हुए हिन्दुस्तान के कानून में महिलाओं की यौन शोषण की शिकायतों को गंभीरता से लेने के लिए पहले विशाखा गाईडलाईंस बनाई गईं, और उसे बाद में एक व्यापक कानून की शक्ल दी गई। बलात्कार या यौन शोषण की शिकायतकर्ता महिला की नीयत पर कोई शक न किया जाए यह भी भारत में सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर तय की गई एक कानूनी व्यवस्था है। इसके बाद भी महिला आयोग की अध्यक्ष का ऐसा व्यापक और आम बयान महिलाओं की आम विश्वसनीयता और साख को खत्म करता है। और इस तरह से यह बयान महिला आयोग के मकसद को ही शिकस्त देता है। हम बहस के लिए अगर पल भर को यह मान भी लें कि उनकी कही बात सही है, और लड़कियां सहमति से संबंध बनाती हैं, और बाद में शिकायत करती हैं। ऐसा होने पर भी उनका शिकायत का हक खत्म नहीं होता है। संबंध बनाने का यह मतलब नहीं रहता कि बाद में कोई शिकायत ही न हो सके।


इसी राज्य छत्तीसगढ़ में कई सरकारी अफसरों द्वारा मातहत कर्मचारियों के यौन शोषण के चर्चित मामले बरसों से चले आ रहे हैं, और उन पर पिछली सरकार के बाद यह सरकार भी कार्रवाई करने से कतरा रही है। छोटे ओहदों की जिन महिलाओं के शोषण के मामलों पर कांग्रेस पार्टी भाजपा सरकार के दौरान सार्वजनिक रूप से आलोचना करती थी, आज सरकार बनकर कांग्रेस उन पर चुप है, और महिलाओं का यौन शोषण करने वाले लोगों को बढ़ावा भी दे रही है। महिला आयोग को ऐसे मामलों को उठाना चाहिए, और पार्टी-पॉलीटिक्स से परे महिलाओं के व्यापक हित और व्यापक हक के लिए काम करना चाहिए। किरणमयी नायक का खुद होकर दिया हुआ यह बयान बहुत ही निराशाजनक है, और इससे एक तबके के रूप में महिलाओं की साख को उन्होंने बहुत नुकसान पहुंचाया है। ऊंचे ओहदे, ऊंची जिम्मेदारियां भी लेकर आते हैं, और उनके साथ ऊंचे दर्जे की सावधानी भी बरती जानी चाहिए।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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