कभी निजीकरण के खिलाफ और अब..

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-डॉ अमिता नीरव॥

जब मैंने अखबार में काम करना शुरू किया था, तब वहाँ बड़ा सुकून था। समय को साधने के अतिरिक्त और किसी तरह का तनाव नहीं था। हो सकता है हो, लेकिन वह भी विभागीय प्रमुख के हिस्से ही हुआ करता होगा। बाकियों का काम बहुत सुकून में चलता था।

आलम यह था कि जो एक बार हमारे अखबार में नौकरी पर लगा, अमूमन वह वहीं से सुकून से रिटायर होता था। हमने अपने कई वरिष्ठों को वहीं से रिटायर होते देखा था। बाद के वक्त में कुछ उत्साही औऱ महत्वाकांक्षी लोग अखबार छोड़कर गए भी तो या तो लौट आए या फिर पुराने दिनों को याद करके दुखी होते रहे।

जब अखबार बिका तो नए मैनेजमेंट और नए संपादकजी ने अखबार बिकने का ठीकरा अखबार के कर्मचारियों के सिर फोड़ा। आनन-फानन में पुराने औऱ वरिष्ठ सहयोगियों को विदा कर दिया गया औऱ उनकी जगह पर कम तनख्वाह में नए कच्चे-पक्के लोगों की भर्ती की गई।

एडिशंस में कॉस्ट कटिंग के नाम पर लोगों को निकाला गया। कॉस्ट कटिंग के नाम पर हेड ऑफिस में भी टटपूँजी कटौतियाँ की गई। ब्यूरोज में लोगों को कम किया गया… घाटा कम नहीं हुआ। कर्मचारी बदले, मैनेजमेंट बदल गया, समय बढ़ गया, तनाव और सख्ती सब बढ़ गई, लेकिन घाटा जस-का-तस बना हुआ है।

पढ़ाई के दौरान निजी और सार्वजनिक उद्यम की बहसों में मेरा पक्ष हमेशा भाग लेने वाले के पक्ष के उलट हुआ करता था। यदि सामने वाला निजीकरण के पक्ष में होता था तो मैं निजीकरण के विपक्ष में होती, यदि सामने वाला विपक्ष में होता था तो मैं पक्ष में। वजह इस विषय पर ज्यादा-से-ज्यादा जानना और फिर राय बनाना था।

उस वक्त जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और निजीकरण की प्रक्रिया तेज थी, तब विपक्ष के रूप में निजीकरण के खिलाफ बीजेपी के तर्क बहुत धारदार थे। तब लगता था कि बीजेपी तो देश में ‘गाँधी के हाशिए’ के आदमी की दिक्कत को समझने वाली पार्टी है।

देखते-ही-देखते पार्टी ने 180 डिग्री की पलटी मार दी है। जो लोग कभी स्वदेशी के गीत गाया करते थे, वह अचानक एफडीआई पर लहालोट हो रहे हैं। तो धीरे-धीरे सरकार ने सार्वजनिक उपक्रमों को बेचने की शुरुआत कर दी है। यूँ वाजपेयी सरकार ने इसके लिए बाकायदा एक मंत्रालय बनाया था जिसे बड़ा आकर्षक नाम दिया था विनिवेश मंत्रालय…।

राजेश कहते हैं कि यदि कोई पुराना नास्तिक नया-नया आस्तिक बनता है तो वह पत्थर-पत्थर सिर नवाता है। ठीक यही बीजेपी कर रही है।

निजीकरण के पक्ष में तर्क है कि सार्वजनिक उपक्रम में भ्रष्टाचार बहुत है, वे घाटे में हैं और जो तर्क व्यक्तिवादी देते हैं वो तो है ही कि सरकार का काम व्यापार करना नहीं है। सार्वजनिक उपक्रम के घाटे में जाने से उन्हें बेच दिया जाना चाहिए, लेकिन किंगफिशर, स्पाइस जेट जैसी एयरलाइंस और कई मीडिया हाउसेस के साथ बहुत सारे निजी उपक्रम के घाटे में जाने और कर्मचारियों की छँटनी की जिम्मेदारी किसी पर नहीं आती है।

निजी उपक्रम पैरासाइट्स की तरह जनता के पैसों औऱ संसाधनों पर फलते-फूलते हैं फिर भी घाटे में चले जाते हैं, लेकिन यह अच्छा है। समाज की जमीन उन्हें सरकार सब्सिडाइज्ड रेट पर उपलब्ध करवाती है, बिजली सब्सिडाइज्ड रेट पर बिजली मिलती हैं, सारा मूलभूत ढाँचा सरकार बनाकर देती है। सरकारें सेज और इंडस्ट्रियल एरिया में उद्योगों को तमाम तरह की सुविधाएँ देती है, फिर भी ये घाटे में चले जाते हैं। तब कोई सवाल नहीं पूछा जाता है।

सरकार इन्हें लोन देती है, ये लोन डकार जाते हैं। सरकार इनके लोन राइट ऑफ कर देती है या फिर ये लोन लेकर फरार हो जाते हैं, फिर कहते हैं कि ये निजी उद्योग हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर जनता के पैसों से बनता है और उसका निजी उद्योगपति अपना मुनाफा कमाने में उपयोग करते हैं।

रेलवे स्टेशंस, पटरियाँ सारा ढाँचा सरकारी हो उद्योगपति सिर्फ ट्रेन चलाएँ, इसी तरह हवाई अड्डे सब सरकारी हैं, बस एयरक्राफ्ट और स्टाफ हमारा है और मुनाफा भी हमारा होगा। सारे संसाधन समाज के हैं और उद्योग आपका है। समाज के संसाधनों का उपयोग करके आप मुनाफा कमा रहे हैं।

घाटे में हैं तब भी उद्योगों का पैसा नहीं डूब रहा है, पैसा तो सरकार का और प्रकारांतर से नागरिकों का ही डूब रहा है। निजी उद्योग जरा खुद इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप करें और फिर मुनाफा कमाकर दिखाएँ, तब माना जाएगा कि यह उद्योग निजी है।

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