Home गौरतलब संसद की नई इमारत लोकतंत्र को सुरक्षित रख पाएगी.?

संसद की नई इमारत लोकतंत्र को सुरक्षित रख पाएगी.?

कई बार बसने और उजड़ने को अभिशप्त दिल्ली एक बार फिर बड़े बदलाव के लिए तैयार हो रही है। अयोध्या में राम मंदिर के भूमिपूजन के बाद अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली में नए संसद भवन की आधारशिला भी रख दी। पिछले साल ही अगस्त में मोदीजी ने भारत की आजादी के 75 वें वर्षगांठ के मौके पर 2022 तक में एक नए संसद के निर्माण की बात की थी। और अब उस राह पर उन्होंने कदम आगे बढ़ा दिए हैं। वांटेड फिल्म में सलमान खान का चर्चित संवाद कि मैंने एक बार जो कमिटमेंट कर दी तो फिर मैं अपने आप की भी नहीं सुनता, इस वक्त देश के प्रधानमंत्री पर काफी हद तक लागू होता दिखता है।

 हालांकि रोजगार, विकास, सामाजिक समरसता आदि आम जनता की बेहतरी को लेकर किए गए उनके कमिटमेंट इस बात में शामिल नहीं किए जा सकते। वे सब तो चुनावी जुमले बना दिए गए हैं। अलबत्ता चुनाव जीतने के लिए ध्रुवीकरण का इस्तेमाल करते हुए जो वादे उन्होंने किए, वो पूरा करने के लिए सारी कोशिशें की जा रही हैं। फिर चाहे कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म करना हो या राम मंदिर का भूमिपूजन करना हो या भाजपा के वो दबे-छिपे वादे जो उसने अपने पोषक उद्योगपतियों से किए होंगे। जैसे देश की सार्वजनिक संपत्ति को निजी हाथों में सौंपना, रेल, तेल, बिजली, बैंक, कोयला, दूरसंचार, शिक्षा, स्वास्थ्य हर क्षेत्र में सरकार की ओर से घाटा दिखाकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेना, ताकि देश चंद उद्योगपतियों के रहमोकरम पर चले। आज की परिभाषा में इसे आत्मनिर्भर कहा जाने लगा है।

लॉकडाउन के लंबे दौर में डगमगाती अर्थव्यवस्था के बीच इस आत्मनिर्भरता के नए-नए मंत्र रोजाना जनता की कान में फुंके गए। जब जनता महामारी से घबराई हुई अपने घरों में कैद थी और उसकी कमाई के सारे तरीके बाधित हो चुके थे, उस वक्त केंद्रीय आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय ने महत्वाकांक्षी और विवादित सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के लिए दिल्ली मास्टर प्लान में संशोधन को मंजूरी देते हुए नोटिफिकेशन जारी था। इसके तहत राष्ट्रपति भवन से लेकर इंडिया गेट तक चार वर्ग किमी. क्षेत्र में स्थित कई ऐतिहासिक इमारतों का पुनर्निर्माण और पुनर्विकास प्रस्तावित है। इसके लिए पांच प्लॉटों के लिए लैंड यूज में संशोधन किया गया है।

इस प्रोजेक्ट के खिलाफ अदालत में कई याचिकाएं दायर की गईं, लेकिन आज प्रधानमंत्री ने इसकी आधारशिला रख दी। इस मौके पर उन्होंने कहा कि नया संसद भवन आत्मनिर्भर भारत का गवाह बनेगा। पुराने भवन से देश की आवश्यकताओं की पूर्ति हुई, लेकिन नए संसद भवन से 21वीं सदी की आकांक्षाएं पूरी होंगी। हम भारत के लोग मिलकर अपनी संसद के इस नए भवन को बनाएंगे और इससे सुंदर क्या होगा, इससे पवित्र क्या होगा कि जब भारत अपनी आजादी के 75 वर्ष का पर्व मनाए, तो उस पर्व की साक्षात प्रेरणा, हमारी संसद की नई इमारत बने। 

इतनी सुंदर और लुभावनी बातों में अगर आम जनता भ्रमित हो जाए, तो कोई आश्चर्य नहीं। वैसे प्रधानमंत्री से यह सवाल जरूर किया जाना चाहिए कि संसद भवन में अगर जनप्रतिनिधित्व की जिम्मेदारी ईमानदारी से न निभाई जाए, अगर संविधान की आत्मा को जिंदा न रखा जाए तो फिर भव्य इमारत का भारत क्या करेगा। आजादी के 75 बरस होने पर भी अगर आधे से अधिक भारत भुखमरी, कुपोषण, बेरोजगारी, अशिक्षा का शिकार रहेगा और दो-तीन प्रतिशत अमीर लोगों के पास देश की संपत्ति का अधिकांश हिस्सा रहेगा, तो ऐसे भव्य संसद भवन का भारत क्या करेगा।

देश के आम जन की आवश्यकताएं पूरी होती रहें तो 21वीं सदी के भारत की आकांक्षाएं अपने आप पूरी हो जाएंगी। आज तो हाल ये है कि देश के अन्नदाता 15 दिनों से राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर दिन-रात डटे हुए हैं और सरकार में शामिल लोग उन पर तंज कस रहे हैं कि ये आंदोलन पाकिस्तान और चीन से प्रायोजित है। पिछले साल इन्हीं दिनों दिल्ली शाहीन बाग में सीएए विरोधी आंदोलन का गवाह बना था और इस साल नए कृषि कानूनों के खिलाफ हो रहे आंदोलन को देख रहा है। इन हालात को देखकर हम अपने लोकतंत्र को लेकर कैसे निश्चिंत हो सकते हैं। क्योंकि जनसाधारण के आंदोलन की वजहें सरकार के मनमाने फैसले ही हैं। नए संसद भवन में आकर सरकार मनमानी करना छोड़ देगी या अपने बहुमत का बेजा फायदा नहीं उठाएगी, ऐसी कोई गारंटी तो नहीं मिल रही।

फिर नए संसद भवन की आधारशिला रखने पर आम जनता किस वजह से खुश हो। घर और मकान में बुनियादी अंतर यही होता है कि मकान ईंट-गारे का बनता है और घर में ईंट-गारे के साथ परस्पर प्रेम और विश्वास भी होता है। अब तक संसद भवन भारत के लोगों के हितों के लिए घर समान ही था, पर अब उसे केवल मकान की शक्ल देने की तैयारी की जा चुकी है। सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट पर संविधान की भावना से जुड़ी इन आपत्तियों के अलावा दिक्कत ये भी है कि इस के अमल में आने से करीब 80 एकड़ जमीन ‘प्रतिबंधित’ हो जाएगी, जो जमीन अब तक जनसामान्य के लिए खुली थी, उस पर सिर्फ सरकारी अधिकारियों की पहुंच होगी। इस प्रोजेक्ट का कोई पर्यावरण ऑडिट नहीं कराया गया। कम से कम 1000 पेड़ इसमें काटे जाएंगे। 80 एकड़ जमीन के ग्रीन कवर की भरपाई करने की कोई योजना नहीं है।

प्रोजेक्ट का कोई ऐतिहासिक या हेरिटेज ऑडिट भी नहीं हुआ है, इसलिए अंदेशा है कि देश की ऐतिहासिक विरासत कहीं गुम न हो जाए। सरकार 2022 तक नए संसद भवन के पूरा होने का दावा कर रही है। लेकिन आम जनता की गाढ़ी कमाई के कई हज़ार करोड़ रुपए लगाकर अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना पूरी करने पर अड़ी सरकार क्या ये दावा कर सकती है कि इस नए संसद भवन से देश के लोकतंत्र को भी सुरक्षित ठिकाना मिल पाएगा।

(देशबंधु)

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