गरीब देश की अमीर संसद का हिंसक और अश्लील प्रदर्शन

गरीब देश की अमीर संसद का हिंसक और अश्लील प्रदर्शन

Page Visited: 5795
0 0
Read Time:10 Minute, 21 Second

-सुनील कुमार॥
भारत के नए संसद भवन का शिलान्यास उस वक्त किया गया है जब सुप्रीम कोर्ट ने इसके निर्माण पर रोक लगाकर रखी है। खींचतान कर अदालत से सरकार ने इस भूमिपूजन और शिलान्यास की इजाजत ली थी, और आज देश की बदहाली के बीच हजार करोड़ के बजट वाली यह इमारत बनाने पर सरकार आमादा है। मौजूदा संसद भवन एक सदी पुराना भी नहीं है, और इसे छोटा बताया जा रहा है। देश का मीडिया लिख रहा है कि दुनिया के बहुत से देशों में संसद की इमारतें सदियों पुरानी हैं। हालैंड की संसद की इमारत 13वीं सदी में बनी है, अमरीका की संसद भवन सन् 1800 में बनी है, और उसे दो सदी से अधिक हो गए हैं। ब्रिटिश संसद की इमारत 1840 और 1870 में बनी है। इटली की संसद की इमारत 16वीं सदी में बनी है। फ्रांस की संसद 1615 से 1645 के बीच बने भवन में लगती है। भारत का संसद भवन 1927 में बनकर तैयार हुआ था, और अब इसे छोटा बताकर एक नया ही भवन बनाया जा रहा है।


अभी जब सुप्रीम कोर्ट ने इस भवन निर्माण पर रोक लगाई हुई है, तो जाहिर है कि शिलान्यास और भूमिपूजन करके निर्माण करने की कोई हड़बड़ी तो थी नहीं। ऐसे में जब किसान इसी दिल्ली के किनारे सडक़ों पर धरना दिए हुए एक पखवाड़े से खुली ठंड में पड़े हैं, वहां कुछ मौतें भी हो गई हैं। आज देश में राजनीतिक बकवासों से परे सिर्फ एक ही मुद्दे पर चर्चा चल रही है, और वह किसानों का मुद्दा है। इस बीच नए संसद भवन को बनाने के लिए समारोहपूर्वक पूजा का मौका कुछ अटपटा है, और ऐसा लगता है कि किसी भी संवेदनशील लोकतंत्र को आज इससे बचना चाहिए था, क्योंकि निर्माण पर तो सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई हुई ही है। अब कहने के लिए यह कहा जा सकता है कि संसद भवन के लिए शिलान्यास का फैसला लोकसभा अध्यक्ष का है जो कि संसद परिसर के मुखिया माने जाते हैं, लेकिन उन्हें अध्यक्ष बनाने वाली भाजपा और उसके प्रधानमंत्री की औपचारिक या अनौपचारिक सहमति के बिना तो ऐसा कोई कार्यक्रम लोकसभा अध्यक्ष ने तय किया नहीं होगा।


भारत का मौजूदा संसद भवन भारी भव्यता वाला है, और यह भी अपने आपमें एक फिजूलखर्ची वाली शाही फितरत की इमारत रही। लेकिन वह वक्त अंग्रेज राज का था जो कि राजसी मिजाज वाला ही था, और जिसने अपने खुद के देश और गुलाम देशों में पश्चिमी वास्तुशिल्पियों से ऐसी ही शाही इमारतें बनवाई थीं। आज अंग्रेजों के वक्त के बनाए गए सडक़ और रेल के पुल तो सौ बरस बाद भी मजबूती के साथ काम कर रहे हैं, इसलिए संसद भवन की मजबूती को लेकर कोई शक नहीं हो सकता। पिछले कई दशकों में ऐसा भी सुनाई नहीं पड़ा कि संसद भवन का कोई हिस्सा जर्जर होकर गिर गया हो, और वह लोगों के लिए खतरा बन गया हो। इसलिए नए संसद भवन की सोच पहली नजर में हम एक बहुत बड़ी फिजूलखर्ची लगती है। अगर संसद का काम पिछली पौन सदी में बढ़ते-बढ़ते इतना बढ़ गया है कि उसके दफ्तर के लिए जगह कम पडऩे लगी हैं, तो दफ्तर की कोई इमारत आसपास की लगी हुई जगह पर बनाकर उससे संसद भवन को जोड़ा जाना चाहिए था, न कि संसद के लिए ही नई इमारत बनाना।


हम लोकसभा और राज्यसभा दोनों की कार्रवाई टीवी पर देखते हैं, और सेंट्रल हॉल में दोनों सदनों के संयुक्त सत्रों को भी देखते हैं, इनमें से किसी में भी जगह कम नहीं पड़ती। इससे परे लोगों को बीबीसी टीवी पर ब्रिटिश संसद की कार्रवाई देखनी चाहिए जहां भारतीय लोकसभा की तरह निम्न सदन, हाऊस ऑफ कॉमन्स के दरवाजे पर सांसद खड़े रहते हैं, और सीट खाली होने का इंतजार करते हैं। वहां संसदीय सीटों की संख्या बढ़ गई लेकिन ब्रिटिश संसद ने अपने सदन में सीटें नहीं बढ़ाईं, इसलिए वहां सारे सदस्य एक साथ नहीं बैठ सकते। कुछ न कुछ सांसद दरवाजे पर खड़े रहते हैं, और सीट खाली होने पर जाकर बैठते हैं। दूसरी तरफ उसी ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था पर बनी हुई भारतीय संसद में तो अभी 6 बरस पहले ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पहली बार पांव धरते हुए वहां माथा टिकाया था, और इन 6 बरसों में ही वह संसद भवन नाकाफी लगने लगा!


हजार करोड़ की लागत से यह नया संसद भवन बनाया जा रहा है। लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों की गिनती करें तो प्रति सांसद इस भवन की लागत करीब एक-सवा करोड़ रूपए आएगी। आज जब देश में फटेहाली है, गरीबी और बेरोजगारी है, जब अन्नदाता किसान सडक़ों पर मर रहा है, तब देश की संसद का अपने ऊपर यह निहायत गैरजरूरी और नाजायज है। होना तो यह चाहिए कि सांसद किफायत और सादगी में जीकर अपने विचार-विमर्श, बहस और तर्क-वितर्क बेहतर बनाते, लेकिन वह तो हो नहीं रहा। संसद अप्रासंगिक हो चुकी है, और एक संवैधानिक जरूरत की तरह वहां ध्वनिमत से काम चल रहा है। ऐसी संसद जिसने अपनी बुनियादी भूमिका खो दी है, उस संसद को इतनी फिजूलखर्ची का कौन सा नैतिक हक हो सकता है? और फिर सरकार में खर्च के न्यायोचित रहने का एक सिलसिला होता है। जब कोई भी सरकारी निर्माण अपनी उम्र खो बैठता है, जब वह खतरनाक हो जाता है, तब उसकी जगह नई इमारत बनाई जाती है। आज तो संसद की इमारत का कोई खतरा सुनाई नहीं पड़ा था, और अब जब पूरी दुनिया में कागजों का काम घट रहा है, और वह कम्प्यूटरों पर आ रहा है, तब तो संसद के लिए जगह कम लगनी चाहिए थी। सुप्रीम कोर्ट में नए संसद भवन के खिलाफ यह तर्क भी सामने आया है कि संसद भवन और आसपास की इमारतों का विकल्प तैयार करने के लिए सरकार उस इलाके पर 20 हजार करोड़ रूपए खर्च करने जा रही है। अभी भूमिपूजन के मौके पर प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा जारी सूचना में सरकार ने यह कहा है कि नया संसद भवन आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण का एक हिस्सा रहेगा। इसी बयान में बताया गया है कि लोकसभा अपने मौजूदा आकार से तीन गुना बड़ी रहेगी, और राज्यसभा भी पर्याप्त बड़ी रहेगी। यह भी कहा गया है कि सदस्यों के लिए बैठने का और अधिक आरामदेह इंतजाम रहेगा।


अब सवाल यह है कि सांसदों को और कितने आराम की जरूरत है? जब देश में आराम-हराम हो की नौबत है, जब हर हिस्से में तरह-तरह की नकारात्मक बातें हो रही हैं, तो उनकी चर्चा करने के लिए सांसदों को और कितना आराम चाहिए? दिल्ली में जानकार विशेषज्ञों ने सुप्रीम कोर्ट में इस बात पर आपत्ति की है कि नया भवन 900 से 1000 लोकसभा सदस्यों का अनुमान लगाकर बनाया जा रहा है जो आज से करीब दोगुने का है। अदालत में यह कहा गया है कि लोकसभा सीटों के पुनर्गठन की अगली बैठक ही 2031 में होनी है, और उसमें आज की 543 सीटों को बढ़ाने पर विचार होगा। उस पुनर्गठन आयोग से परे सीटें बढ़ाने का फैसला और कोई नहीं ले सकते। ऐसे में आज सरकार एक अनुमान लगाकर लोकसभा के आकार को तीन गुना और सीटों को करीब दो गुना करने जा रही है जो कि बेवक्त की बात है।
हमारा बहुत साफ मानना है कि हिन्दुस्तान के सारे राष्ट्रीय आर्थिक आंकड़ों से परे हकीकत यह है कि यह एक बहुत गरीब देश है। इसमें एक फीसदी ऐसे रईस हैं जिनके पास देश की 58 फीसदी दौलत है। उनसे परे भी गरीबों और मध्यमवर्गीयों के बीच बहुत बड़ा फासला है। इसलिए इस देश को किफायत की जरूरत है न कि ऐसी आत्मनिर्भरता की जिसका इस्तेमाल अगले सौ-दो सौ बरस भी शायद न हो सके। जब देश की जनता पूरी जिंदगी रेलगाडिय़ों में फर्श पर बैठकर या पखाने में घुसकर सफर करने को मजबूर है, तब लोकसभा में जरूरत पडऩे पर मौजूदा भवन की ही क्षमता कुछ बढ़ाई जा सकती है। गरीब देश की अमीर संसद का यह प्रदर्शन हिंसक और अश्लील है।

About Post Author

admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleepy
Sleepy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %
Facebook Comments

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Visit Us On TwitterVisit Us On FacebookVisit Us On YoutubeVisit Us On LinkedinCheck Our FeedVisit Us On Instagram