खुद पर सरकारी नियंत्रण नहीं चाहता इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, काटजू कर सकते हैं मध्यस्थता

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न्यूज चैनलों के लाइसेंस नवीनीकरण के बारे में सरकार की नई नीति सवालों के घेरे में आ गई है। कई मीडिया घरानों, खास कर टीवी चैनलों के अध्यक्षों ने इसकी आलोचना की है। प्रेस काउंसिल के नये अध्यक्ष जस्टिस मार्केण्डेय काटजू ने भी इसे फिलहाल टालने की सलाह दी है।

जस्टिस काटजू ने मीडिया संपादकों और वरिष्ठ संपादकों के साथ अपनी मुलाकात में कहा है कि मीडिया पर ऐसी किसी प्रकार की कार्रवाई आखिरी कदम होना चाहिये और बातचीत से ही समस्या का हल निकालना चाहिए. हालांकि उन्होंने मीडिया की भी तीखी आलोचना भी की और कहा कि वह अपनी जिम्मेदारी बिल्कुल अच्छी तरह से नहीं निभा रहा है।

गौरतलब है कि मीडिया के हमलों और उसके दुरुपयोग की शिकायतों से परेशान सरकार ने न्यूज चैनलों के लाइसेंस नवीनीकरण के लिए नई गाइडलाइन बनाई है जिसमें कई शर्तें रखी गई हैं। जस्टिस काटजू ने मीडिया संपादकों से मुलाकात के बाद ये तो कहा कि सरकार को अपना ये फैसला फिलहाल लागू नहीं करना चाहिए लेकिन उन्होंने कुछ मुद्दों को लेकर मीडिया को कड़ी फटकार भी लगाई और कहा कि अब मीडिया जिम्मेदार नहीं रहा है और खबरों के साथ खिलवाड़ भी किया जाता है। उन्होंने पैसे देकर खबरें छापने तथा दिखाने (पेड न्यूज) का जिक्र करते हुए कहा कि 2009 के लोकसभा चुनावों के दौरान यह एक बड़ा मुद्दा बन गया था। इस पर भी बहस होनी चाहिए। उन्होंने जानकारी दी कि मुख्य सूचना आयुक्त के निर्देश के बाद प्रेस काउंसिल ने इस मामले की रिपोर्ट अपनी वेबसाइट पर डाल दी है, हालांकि इसे प्रेस काउंसिल ने तैयार नहीं किया है।

न्यायमूर्ति काटजू ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1) में प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार के तहत मीडिया की आजादी निहित है, लेकिन कोई भी स्वतंत्रता असीम नहीं होती, उसके साथ कुछ तार्किक प्रतिबंध भी होते हैं। न्यायमूर्ति काटजू ने कहा कि अब वक्त आ गया है कि भारतीय मीडिया अपने अंदर भी झांके, क्योंकि देश में अनेक लोग जिनमें सिर्फ सत्ताधारी ही नहीं बल्कि आम आदमी भी शामिल हैं, कहने लगे हैं कि मीडिया बेहद गैर जिम्मेदार होता जा रहा है उसे रास्ते पर लाने की जरूरत है।

कुछ पत्रकारों ने जस्टिस काटजू की बात से इत्तेफाक रखते हुए मीडिया की मौजूदा स्थिति पर गहरी चिंता जताई। हालांकि दूसरी तरफ कुछ संपादकों ने कहा कि मीडिया के व्यवहार को लेकर शिकायतें तो हैं लेकिन पूरी मीडिया को कठघरे में खड़ा करना ठीक नहीं होगा। जहां गलतियां हैं वहां सुधार की कोशिश जरूर करनी चाहिए। जस्टिस काटजू ने प्रस्ताव रखा है कि अगर सरकार चाहे तो प्रेस काउंसिल मध्यस्थ की भूमिका निभा सकती है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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