हिन्दुस्तान को सभ्य होते लगेंगी कई सदियां, तब तक भारी जुर्माना-सजा..

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-सुनील कुमार॥

सुप्रीम कोर्ट ने कोरोना पर एक सुनवाई करते हुए कहा कि जो लोग सार्वजनिक जगहों पर मास्क नहीं पहन रहे हैं, वे हर किसी के जीने के अधिकार का उल्लंघन कर रहे हैं। अदालत ने सभी राज्यों को लोगों को मास्क पहनाने और सामाजिक दूरी बनाने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने अफसोस जाहिर किया कि लोग मास्क नहीं पहन रहे हैं, सामाजिक दूरी नहीं रख रहे हैं, और प्रशासन भी इससे जुड़े नियमों को लागू करने के प्रति उदासीन हैं।


हिन्दुस्तान में अपनी मनमर्जी से गलत काम करके दूसरों की जिंदगी खतरे में डालने का यह कोई नया मामला नहीं है। कोरोना का खतरा तो नया है, लेकिन लोग तो पुराने हैं। ये वही लोग हैं जो दारू पीकर गाड़ी चलाते हैं, जो बिना हेडलाईट और बैकलाईट के गाड़ी चलाते हैं, जिनकी गाडिय़ों की फिटनेस सही नहीं रहती, बस और ट्रक चलवाने वाले मालिक अपने ड्राइवरों की आंखों की जांच नहीं करवाते। लोग दोपहियों पर चार-चार लोग सवार होकर और सामान भी लादकर चलते हैं जिससे कि सडक़ दुर्घटनाओं का खतरा बने रहता है। लोग दुपहिया चलाते हुए भी एक हाथ से मोबाइल थामे रहते हैं, बात करते रहते हैं, और स्क्रीन पर सर्च भी करते रहते हैं, ये लोग खुद तो खतरे में रहते ही हैं, औरों के लिए भी ये खतरा रहते हैं। लेकिन शायद ही किसी पुलिस, प्रशासन की दिलचस्पी इन पर कार्रवाई करने में हो।


हम अपने आसपास देखते हैं तो लोग बिना हेलमेट लापरवाही से गाड़ी चलाते हैं, बड़ी मोटरसाइकिलों के साइलेंसर फाडक़र रखते हैं, और लोगों का जीना हराम करते हैं। गाडिय़ों के ऊपर अंधाधुंध लाईट लगा लेते हैं, और सायरन भी लगा लेते हैं, इनसे भी सडक़ पर दूसरों की जिंदगी खतरे में पड़ती है। बड़ी-बड़ी गाडिय़ां इतनी ओवरलोड चलती हैं कि खुद सरकारी सडक़ निर्माण विभाग सडक़ों के जल्द खत्म हो जाने पर ऐसी ओवरलोड गाडिय़ों को जिम्मेदार बताते हैं। इन सबसे लोग अपनी कमाई बढ़ाते हैं, लापरवाही से काम करते हैं, और दूसरों की जिंदगी खतरे में डालते हैं।


दुनिया में जो सभ्य और विकसित लोकतंत्र हैं वे दूसरों के अधिकार और अपनी जिम्मेदारी का ख्याल रखने वाले नागरिकों वाले देश रहते हैं। हिन्दुस्तान में लोग अपने बेजा हक को बर्दाश्त करने और ढोने की दूसरों की जिम्मेदारी के सिद्धांत पर काम करते हैं, और दूसरों की जिंदगी खतरे में डालते हैं। आज सडक़ों पर लगातार सरकारी विभागों और म्युनिसिपलों की महिला कर्मचारी बिना मास्क वाले लोगों को रोक-रोककर हिदायत देते दिखती हैं। लापरवाह लोगों से सौ रूपए का जुर्माना लेकर उन्हें छोड़ दिया जाता है। अगर लोगों को जिम्मेदारी सिखानी है तो हिन्दुस्तान ऐसी सौ रूपए जुर्माने की पेनेसिलिन के असर से ऊपर उठ चुका है। अब यहां नई पीढ़ी की एंटीबायोटिक की शक्ल में ऐसा जुर्माना लगाना पड़ेगा कि बिना मास्क वाले लोगों पर बिना हेलमेट का जुर्माना भी लगे, उनकी गाड़ी की फिटनेस की जांच भी हो जाए, नंबर प्लेट गलत हो तो उसका जुर्माना भी हो जाए, प्रदूषण सर्टिफिकेट न हो तो उसका जुर्माना भी हो जाए। जब तक एक-एक बिना मास्क वाले पर कुछ हजार रूपए का जुर्माना नहीं होगा, तब तक नालायक लोग अपने अलावा दूसरों की जिंदगी भी खतरे में डालते ही रहेंगे। बेअसर कार्रवाई की औपचारिकता पूरी करने के लिए सडक़ों पर जूनियर सरकारी कर्मचारी महिलाओं को खतरे में डालना बेकार है। जब लोगों को सौ रूपए जुर्माने से तकलीफ नहीं हो रही है, तो जुर्माना इतना बढ़ाया जाए कि दो-चार दिन उसकी खबरें पढक़र ही बाकी लोग मास्क लगाने को सस्ता मानकर चलें। जब तक मास्क लगाना सस्ता नहीं पड़ेगा, तब तक लोग मास्क नहीं लगाएंगे। जब मास्क न लगाना हजारों रूपए का जुर्माना लगवा देगा, तभी लोग दूसरों की जिंदगी की फिक्र करेंगे। हिन्दुस्तान जैसा गैरजिम्मेदार देश कम ही होगा जहां लोग अपनी लापरवाही से दूसरों की मौत की परवाह भी नहीं करते।


किसी देश को आर्थिक रूप से विकसित होने में हो सकता है कि एक सदी लगे, लेकिन उस देश को सभ्य होने में कई सदियां लग सकती हैं, और हो सकता है कि कई सदियों के बाद भी हिन्दुस्तान जैसा असभ्य देश सभ्यता न सीख पाए। आज कोरोना जैसी महामारी से देश में लाखों बेकसूरों की मौत हो रही है, और सरकारों पर अंधाधुंध खर्च का बोझ पड़ रहा है जिससे कि कुल मिलाकर जनकल्याण की योजनाओं में ही कटौती होगी। लेकिन हिन्दुस्तानी हैं कि आज भी चारों तरफ थूकते घूम रहे हैं, मानो इस देश में थूक ही राष्ट्रीय पदार्थ हो। इससे कोरोना जैसी महामारी के फैलने का बड़ा खतरा है, और आज देश में यह बीमारी जितनी फैली है उसमें भारत के इस राष्ट्रीय पदार्थ का भी योगदान जरूर होगा। अब सवाल यह है कि जब लोग जुर्म के दर्जे के लापरवाह हों, गैरजिम्मेदार हों, दूसरों की जिंदगी के प्रति बेपरवाह हों, तो सरकारी या अदालती आदेश किस हद तक लागू किया जा सकता है? दिक्कत यह है कि हादसे हों, या महामारी, इनसे होने वाला नुकसान दूसरों को अधिक होता है, गैरजिम्मेदारों को कम। एक-एक गैरजिम्मेदार कई बेकसूर लोगों को बीमारी भी कर सकते हैं, और सडक़ हादसों में मार भी सकते हैं।


हमारा साफ मानना है कि जनता से इस किस्म की रियायत करने वाले प्रशासन को इस रियायत को देने का कोई हक नहीं है। महामारी कानून के तहत जो कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए वह अगर हर शहर में दस-बीस लोगों पर हो जाए, उनकी गिरफ्तारी हो जाए, उन पर मोटा जुर्माना हो जाए, और उनके मामले खबरों में प्रमुखता से आ जाएं, तो बाकी हिन्दुस्तानियों पर ऐसी मार का असर हो सकता है। कुछ लोगों पर यह बोझ अधिक बड़ा होगा, लेकिन वे बेकसूर तो होंगे नहीं, वे भी बिना मास्क के लापरवाह लोग होंगे जिनकी और तमाम किस्म की जांच करके गाड़ी सहित अधिक से अधिक जुर्माना ठोकना चाहिए। इससे कम में इस देश के लोग नहीं सुधरेंगे। इनका बस चलेगा तो तम्बाकू खाकर सोने की चिडिय़ा पर भी इतना थूक देंगे कि वह पीक के रंग की हो जाए।

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