किसान आन्दोलन का दायरा बढ़ रहा है

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सरकार के नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का आंदोलन लगातार आठवें दिन भी जारी है। किसानों ने तय कर रखा है कि पेशेवर राजनेताओं को आन्दोलन को हाइजैक नहीं करने देंगे। लेकिन कुछ राजनीतिक पार्टियां आंदोलन का समर्थन कर रही हैं । आज जो खबर आई है वह निश्चित रूप से सरकार की चिंता बढ़ा देगी ।

देश के सबसे बुज़ुर्ग राजनेता और शिरोमणि अकाली दल के सर्वेसर्वा प्रकाश सिंह बादल ने पद्म विभूषण सम्मान को लौटा कर अपना विरोध दर्ज कर दिया है। प्रकाश सिंह बादल के बेटे सुखबीर बादल की पत्नी हरसिमरत कौर बादल ने भी किसान क़ानून वाला बिल पास होने के बाद मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। उस वकत राजनीतिक विश्लेषक उनके इस्तीफे को एक राजनीतिक स्टंट मान रहे थे और बताया जा रहा था कि किसानों के आन्दोलन की आग ठंडी होने पर वे इस्तीफा वापस लेकर एनडीए सरकार में फिर मंत्री बन जायेंगी लेकिन लगता है कि अब बात आगे बढ़ गयी है । प्रकाश सिंह बादल का विरोध दर्ज करना मोदी सरकार के लिए बड़ी बात होगी।

सीनियर बादल सिखों के बहुत बड़े वर्ग के सम्माननीय नेता हैं और बहुत दिनों से पंजाब के साथ देश की राजनीति में भी अहम् भूमिका निभाते रहे हैं । बीजेपी के संस्थापकों अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवानी से उनके बहुत ही अच्छे सम्बन्ध रहे हैं । उनके साथ के कारण ही पंजाब में बीजेपी अभी तक सरकार का हिस्सा रहती रही है ।

प्रकाश सिंह बादल की तरफ से किसान आंदोलन का समर्थन और कृषि कानूनों का विरोध बड़ी बात है । सबको मालूम है कि केंद्र सरकार इस घटना को गंभीरता से लेगी । उनका अवार्ड वापसी का फैसला एक बड़ा फैसला है जिसने साबित कर दिया है कि पंजाब की तीनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियां, कांग्रेस, अकाली दल और आम आदमी पार्टी अब केंद्र सरकार की किसान नीति के खिलाफ लामबंद हो गयी हैं और केंद्र सरकार को अब अपनी जिद पर अड़े रहने का कोई औचित्य नहीं है । अब लगभग यह तय हो गया है कि देश में किसान कानूनों के खिलाफ उठ रहे तूफ़ान के मद्देनज़र केंद्र सरकार को किसान बिलों में कुछ न कुछ बदलाव करना पडेगा ।

इस बीच किसान आन्दोलन से होने वाले राजनीतिक नुकसान को संभालने की ज़िम्मेदारी कृषिमंत्री नरेंद्र सिंह तोमर संभाल रहे हैं और उनके मुख्य सहयोगी की भूमिका में मुंबई शहर के नेता और पार्टी के एक पूर्व खजांची के बेटे, केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल हैं । नेपथ्य में अमित शाह हैं जिनके दिशा निर्देश में सरकार की प्रतिक्रिया डिजाइन की जा रही है ।

प्रकाश सिंह बादल को भी सत्ता की राजनीति का मौसम वैज्ञानिक कहा जाता है । वे लगभग हमेशा से ही सत्ता के केंद्र में रहने वाली पार्टी के साथ पाए जाते हैं । उन्होंने अपना पद्मविभूषण सम्मान वापस करते हुए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को तीन पन्ने की चिटठी लिखी है उससे साफ़ है कि वे पंजाब के किसानों के साथ अपने को विधिवत स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं ।

चिटठी में उन्होंने कृषि कानूनों का विरोध किया है, किसानों पर हुई पुलिस की कार्रवाई की निंदा की है और उन पर ठण्ड के महीने में पानी की बौछार आदि डालने के काम को अमानवीय बताया है । चिटठी में उन्होंने लिखा है कि, मैं जो भी हूं किसानों की वजह से हूं।

खबर है कि कृषि कानूनों के सवाल पर जारी गतिरोध के बीच पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने गुरुवार को गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने गृह मंत्री से नए कृषि कानूनों के खिलाफ जारी किसानों के प्रदर्शन को समाप्त करने के लिए जल्द समाधान निकालने का आग्रह किया । उन्होंने गृह मंत्री के साथ बैठक में अपना विरोध दोहराया और उनसे इस मुद्दे को हल करने का अनुरोध किया।

अमरिंदर सिंह ने कहा कि यह तीनों क़ानून पंजाब की अर्थव्यवस्था को बहुत नुक्सान पंहुचायेंगे । साथ ही साथ यह राष्ट्र की सुरक्षा को प्रभावित करता है। उनकी सरकार ने विधान सभा में बाकायदा केंद्र के नए कृषि कानूनों के खिलाफ विधेयक भी पारित किया है ।

इस आन्दोलन में जो किसान मारे गए थे उनके परिवारों को पंजाब सरकार ने पांच लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा भी की है । अमित शाह से उनकी बात का केंद्र सरकार पर क्या असर पड़ा यह तो मालूम नहीं है लेकिन यह तय है की कृषिमंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और किसान नेताओं के बीच चल रही बातचीत पर उसक कुछ असर ज़रूरे पड़ेगा ।

इस बीच टीवी मीडिया का रुख बहुत ही गैर ज़िम्मेदार है, वह किसानों की समस्याओं को सही तरीके से पेश न करके बीजेपी के भोंपू की तरह काम कर रहा है । टीवी चैनलों को किसानों के आन्दोलन में केवल वही बात खबर लायक लगती है जिसके कारण अब शहरों में सब्जी और दूध की किल्लत हो जायेगी या कीमतें बढ़ जायेंगीं । उसको पैदा करने वाले किसान पर क्या गुज़र रही है, यह बात एकाध चैनलों को छोड़कर कहीं भी चर्चा का विषय नहीं बन रही है।

सरकारी अफसर, मंत्री , सत्ताधारी पार्टियों के नेता जब न्यूनतम समर्थन मूल्य की बात करते हैं तो उनकी शब्दावली बहुत ही तकलीफदेह होती है । उनकी बात इस तर्ज पर होती है कि हमने किसानों को बहुत अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य दे दिया है ।

कई बार तो ऐसे लगता है जैसे किसी अनाथ को या भिखारी को कुछ देने की बात की जा रही हो। यह किसान का अपमान है उम्मीद की जानी चाहिए कि दिल्ली के चारों तरफ चल रहे आन्दोलन से मीडिया भी कुछ सबक लेगा और ज़िम्मेदारी का आचरण करेगा।

(देशबंधु)

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