कला और हंसिया की जुगलबंदी

अनिल शुक्ल||

भारत सहित सारी दुनिया में चर्चित पंजाबी के नामचीन गायकों और संगीतकारों ने इन दिनों दिल्ली के सिंघु बॉर्डर पर डेरा जमा लिया है। वहां मौजूद लाखों किसानों की मुश्क़िलों से भरी ज़िंदगी के पक्ष में बने गीतों को वे सब गा रहे हैं। कला और हंसिया की ऐसी जुगलबंदी हमेशा भयावह इतिहास को जन्म देती आई है। ऐसा इतिहास जिसने हर बार राजसिंहासन को डांवाडोल किया है।

क्रान्तिकारी बिरसा मुंडा की खोज का श्रेय देश के मशहूर मानव विज्ञानी (एंथ्रोपॉलॉजिस्ट) कुमार सुरेशसिंह को जाता है। आईएएस के बिहार केडर में चयन के बाद प्रोबेशन पीरियड में श्री सिंह की पहली नियुक्ति एसडीएम खूँटी (अब झारखण्ड) में हुई। डाक बंगले में रुके युवा अधिकारी ने रात में दूर से समवेत स्वर में आते गीतों को सुना। अगले दिन उन्होंने मुंडा जनजाति के अपने चौकीदार से जब पड़ताल की तो पता चला कि ये ‘बिरसा भगवान’ के गीत हैं। सुरेश सिंह ने अपनी कई महीनों की खोज में जो नतीजे हासिल किए वे चौंका देने वाले थे। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध बिरसा मुंडा के नेतृत्व में लड़े गए जनजातियों के युद्ध का समूचा इतिहास इन गीतों में था। उन्होंने इन्हें क्रमवार संकलित करके उस इतिहास को खड़ा किया जिसे अंग्रेज़ इतिहासकारों ने एक-दो लाइनों में निबटा दिया था।

उनकी किताब ‘द डस्ट-स्टॉर्म एंड द हैंगिंग मिस्ट’ दुनिया में बिरसा मुंडा के इतिहास का पहला प्रामाणिक दस्तावेज है। वे सारे गीत न सिर्फ़ इस इतिहास पुस्तक का आधार हैं बल्कि यह भी बताते हैं कि महान संघर्ष के पार्श्व में गीत और संगीत का कैसा अमिट योगदान रहा है। बांग्ला की सुप्रसिद्ध रचनाकार महाश्वेता देवी का ‘साहित्य अकादमी’ से पुरस्कृत उपन्यास ‘आरण्येर अधिकार’ (जंगल के दावेदार) कुमार सुरेशसिंह की इसी पुस्तक पर आधारित और उन्हें समर्पित है।

 हॉवर्ड फ़ास्ट 20वीं सदी के अमेरिका के प्रख्यात यहूदी उपन्यासकार थे। 1951 में प्रकाशित उनका उपन्यास ‘स्पार्टाकस’ रोम साम्राज्य में ईसा से 73 साल पहले हुए ग़ुलाम विद्रोह पर आधारित है जिसका नेतृत्व स्पार्टाकस नामक ग़ुलाम ने किया था। ‘उपन्यास’ में विशाल शिलाखण्डों पर तराशे गए भव्य स्मारकों का उल्लेख है, ग़ुलाम मूर्तिकारों ने विद्रोह युद्ध के दरमियान जिनका निर्माण किया था। स्मारक में उकेरे गए 50 फिट ऊंचे एक ग़ुलाम का ज़िक्र करते हुए रोमन सेनापति क्रैसस अपने दोस्तों से कहता है “वह पैर फैला कर खड़ा था। उसकी ज़ंजीर टूट गई थी और आस-पास ही झूल रही थी। एक बांह में वह बच्चे को उठाए, छाती से चिपकाए हुए था और दूसरे हाथ में एक स्पेनी तलवार थी।…..हाथ के पट्टे  और ज़ंजीर की रगड़ से पैदा हुए ज़ख्म तक उसके पाँव में नख्श कर दिए गए थे।“ एक ऐतिहासिक जंग के समान्तर कला के निर्माण की कहानी है यह ।

टीवी के अपने ‘कॉमेडी शो’ के छिछोरेपन के लिए प्रख्यात कपिल शर्मा ने ‘किसान आंदोलन’ के पक्ष में बड़ा गंभीर बयान दिया है। उन्होंने सरकार के किसान विरोधी रवैये की कस कर भर्त्स्ना की है। बब्बू मान, कँवर ग्रेवाल, हर्फ़ चीमा, हिम्मत संधू, निलजीत दोसांझ, सोनिया मान, गुरलेज़ अख़्तर, हरजीत हरमन…….. ये सब बहुत बड़े नाम हैं। ऐसे नाम जो भारत से निकल कर समूचे यूरोप, कनाडा और अमेरिका के करोड़ों दर्शकों के बीच लोक गीतों और सूफ़ियाना गायकी के पंजाबी झंडे बुलंद करते रहे हैं, आज दिल्ली के बॉर्डर पर जमा हैं। किसानों के मौजूदा संघर्ष को वे अपने गीतों में लिख रहे हैं, गा-बजा रहे हैं। वे नए युग के संगीत का निर्माण कर रहे हैं।

वे स्पार्टाकस और बिरसा युग के कलाकारों की स्मृतियाँ  जीवंत कर रहे हैं।

(लेखक पिछले 40 वर्षों से पत्रकारिता, लेखन  और संस्कृतिकर्म में सक्रिय हैं।)

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