जनसरोकारी पत्रकारिता के मजबूत स्तम्भ ललित सुरजन का निधन..

जनसरोकारी पत्रकारिता के मजबूत स्तम्भ ललित सुरजन का निधन..

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पचास साल से अधिक जनसरोकारी हिंदी पत्रकारिता में प्रमुख दस पत्रकारों में शामिल ललित सुरजन जोकि देशबंधु समाचार पत्र समूह के प्रधान संपादक और कवि भी थे, का दिल्ली के एक अस्पताल में ब्रेन हेमरेज होने से निधन हो गया है। इस दुखद निधन की खबर सबसे पहले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एक ट्वीट के ज़रिये दी। जैसे ही ट्विटर पर यह दुःखद ट्वीट आया तो न सिर्फ पत्रकार जगत में बल्कि सोशल मीडिया में भी मातम पसर गया।

भूपेश बघेल ने अपने ट्वीट में लिखा कि “प्रगतिशील विचारक, लेखक, कवि और पत्रकार ललित सुरजन जी के निधन की सूचना ने स्तब्ध कर दिया है। आज छत्तीसगढ़ ने अपना एक सपूत खो दिया।

सांप्रदायिकता और कूपमंडूकता के ख़िलाफ़ देशबंधु के माध्यम से जो लौ मायाराम सुरजन जी ने जलाई थी, उसे ललित भैया ने बखूबी आगे बढ़ाया।

पूरी ज़िंदगी उन्होंने मूल्यों को लेकर कोई समझौता नहीं किया।

मैं ईश्वर से उनकी आत्मा की शांति और शोक संतप्त परिवार को संबल देने की प्रार्थना करता हूं।

ललित भैया को मैं छात्र जीवन से ही जानता था और राजनीति में आने के बाद समय-समय पर मार्गदर्शन लेता रहता था।

वे राजनीति पर पैनी नज़र रखते थे और लोकतंत्र में उनकी गहरी आस्था थी। नेहरू जी के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा मुझे बहुत प्रेरित करती थी।

उनके नेतृत्व में देशबंधु ने दर्जनों ऐसे पत्रकार दिए हैं, जिन पर छत्तीसगढ़ और मप्र दोनों को गर्व हो सकता है।”

ग़ौरतलब है कि ललित सुरजन लम्बे समय से कैंसर जैसी घातक बीमारी से भी पीड़ित थे। सुरजन ने हिंदी पत्रकारिता की लंबी पारी में कई नए पत्रकार तैयार किये।

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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