किसानों से क्यों घबराती है सरकार

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देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी छह साल पहले जब सत्ता में आए थे, तो उनकी बहादुरी को स्थापित करने के लिए 56 इंच का सीना वाली पंक्ति काफी चर्चित हो गई थी। लेकिन जब ये बहादुर सरकार अपने ही किसानों के साथ दुश्मनों जैसा सुलूक करती है, तो समझ में आ जाता है कि सरकार की सारी दिलेरी केवल हवा-हवाई बातें हैं। असल में सरकार भीतर से बेहद डरपोक है, इसलिए निहत्थे किसानों का सामना करने से घबराती है। इसलिए नए कृषि कानूनों से नाराज किसान, जब आंदोलन के लिए संगठित होकर दिल्ली आने लगे तो सरकार ने पहले उन्हें सीमा पर ही रोक दिया। लेकिन किसान फिर भी रुकने तैयार नहीं हुए तो उन पर आंसू गैस के गोले छोड़े गए, उन पर कड़कड़ाती सर्दी में पानी की बौछार की गई, ताकि वे डरें और वापस लौट जाएं। 

किसानों के खिलाफ पुलिस का इस्तेमाल सरकार ने इस तरह किया, मानो वो इस देश के नागरिक नहीं हैं, देश के दुश्मन हैं। किसानों को रोकने के लिए बनी-बनाई सड़कों को खोद दिया गया। इससे मध्यकाल के वो राजा-महाराजा याद आ गए, जो दुश्मनों को रोकने के लिए अपने किलों के चारों ओर गड्ढे खुदवा देते थे। वैसे सरकार के तमाम हथकंडों के बावजूद किसान पीछे हटने तैयार नहीं हुए, तो आखिरकार उन्हें दिल्ली आने की इजाजत मिल गई, लेकिन उसमें भी कुछ शर्तें रख दी गईं। गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि 3 दिसंबर को बातचीत का न्योता दिया गया है, अगर किसान उससे पहले वार्ता करना चाहते हैं तो उन्हें दिल्ली-हरियाणा सीमा छोड़कर बुराड़ी के निरंकारी ग्राउंड पर जाना होगा। लेकिन किसान इसके लिए तैयार नहीं हैं। 

उनका कहना है कि अगर विरोध-प्रदर्शन के लिए रामलीला मैदान तय है, तो वे दूसरी जगह क्यों जाएं। किसानों से इस तरह शर्तों के साथ बात करना, यह दिखाता है कि मोदी सरकार का रवैया किसानों के लिए कितना असंवेदनशील है। वैसे दुनिया में शायद ही कोई दूसरा लोकतांत्रिक देश होगा, जहां किसानों के साथ इस तरह का व्यवहार किया गया। अमेरिका में तो उपराष्ट्रपति का चुनाव जीतीं कमला हैरिस ने हाल ही में एक ट्वीट कर देश के किसानों को शुक्रिया कहा, जिनकी मेहनत की वजह से खाद्यान्न लोगों तक पहुंचता रहा। जबकि उसी वक्त भारत में राजधानी दिल्ली में किसानों पर न केवल सरकार का अत्याचार हो रहा था, बल्कि सरकार समर्थक कई लोग किसानों को गुंडे बता रहे थे। 

ये साबित करने की कोशिश कर रहे थे कि विपक्षी पार्टियों के उकसावे पर किसान आंदोलन करने पहुंचे हैं। नए कृषि कानूनों को सरकार कृषि सुधारों के लिए अहम बता रही है। लेकिन देश के किसान इसके खिलाफ हैं। पीएम मोदी भरोसा दिला रहे हैं कि एमएसपी की व्यवस्था जारी रहेगी, लेकिन ये भरोसा वो कानून में लिखित तौर पर नहीं दे रहे हैं, इसलिए किसान अब सरकार पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं। पिछले दो महीने से पंजाब में अपनी आवाज बुलंद करते किसान दिल्ली पहुंच चुके हैं और उनका साथ देने हजारों किसान सामने आए हैं। 

दिल्ली की सीमा पर लगातार चार दिन से आंदोलनरत किसान जमा हैं और सरकार अब भी बतकही से आगे नहीं बढ़ पाई है। मोदीजी ने मन की बात कार्यक्रम के नाम को फिर चरितार्थ करते हुए अपने ही मन की बात देश पर फिर से थोपी। उन्होंने कृषि कानूनों पर कहा कि इन सुधारों से न सिर्फ किसानों के अनेक बन्धन समाप्त हुये हैं, बल्कि उन्हें नये अधिकार भी मिले हैं, नये अवसर भी मिले हैं। भ्रम और अफवाहों से दूर, कानून की सही जानकारी लोगों को होनी चाहिए। अब सरकार से सवाल होना चाहिए कि सही जानकारी पहुंचाने का जिम्मा किसका है। अगर सरकार को ये लगता है कि देश के हजारों किसान एक साथ किसी भ्रम का शिकार हुए हैं या उन्हें अफवाहों ने बरगलाया है, तो सरकार ने इस भ्रम को दूर करने के लिए क्या किया। दो महीने से अधिक समय से किसान नए कानूनों के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं, लेकिन अब तक सरकार उनके साथ आमने-सामने बात नहीं कर सकी। नए कानून बनाने से पहले भी उन्हें भरोसे में नहीं लिया गया। बीते छह सालों में कई बार किसानों को मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ सड़कों पर उतरना पड़ा है। 

भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव के लिए अध्यादेश के खिलाफ किसान सड़क पर उतरे। कावेरी प्रबंधन बोर्ड के गठन की मांग को लेकर तमिलनाडु के किसानों ने कई दिनों तक प्रदर्शन किया। उत्तरप्रदेश के किसान गन्ने की कीमत को लेकर आंदोलित हुए। महाराष्ट्र के किसानों ने कर्जमाफी, एमएसपी को लेकर प्रदर्शन किया। आत्महत्या कर चुके किसानों की पत्नियां और मासूम बच्चे भी इन प्रदर्शनों में शामिल हुए। कभी तपती गर्मी में, कभी कड़कड़ाती सर्दी में किसान सारी तकलीफें सहते हुए अपनी मांगों को लेकर मोदी सरकार के सामने गुहार लगाते रहे हैं, लेकिन सरकार ने बार-बार यही दिखलाया है कि जय जवान-जय किसान जैसे नारे अब उसके लिए चुनावी जुमलों से अधिक मायने नहीं रखते। इसलिए अपनी गलत नीतियों का खामियाजा भुगतने के लिए सीमा पर जवानों को आगे किया जा रहा है और देश का पेट भरने वाले किसानों पर आंसू गैस के गोले बरसाए जा रहे हैं। सत्ता की मदहोशी में यह एहसान फरामोशी देश पर बहुत भारी पड़ सकती है।

(देशबन्धु)

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