किसान आंदोलन के किसानी मुद्दों से परे सीखने की बात…

किसान आंदोलन के किसानी मुद्दों से परे सीखने की बात…

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-सुनील कुमार॥

पंजाब से दिल्ली पहुंच रहे किसानों की जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, और जो वीडियो मीडिया में तैर रहे हैं उन्हें लेकर सामाजिक जिम्मेदारी की एक नई शक्ल दिख रही है। आंदोलन कर रहे और पुलिस की रोक को पार करके दिल्ली पहुंचने की कोशिश कर रहे किसानों को पानी की धार की मार से रोका गया, पुलिस ने सडक़ों को कहीं खोद दिया, तो कहीं चट्टानों से सडक़ पाट दी गई। लेकिन ऐसे किसी भी मौके पर पुलिस का जो आम हाल होता है, वह यहां भी था, और किसानों ने अपने खाने के इंतजाम में से पुलिस को खाना खिलाया, उन्हें पानी पिलाया। कुछ किसान नेताओं के ऐसे भाषण के वीडियो भी सामने आए हैं जिनमें वे कह रहे हैं कि पुलिस अगर लाठी से पीटे, गोली चलाए, तो भी पुलिस के खिलाफ कुछ नहीं करना है, उसे हाथ भी नहीं लगाना है।

हिन्दुस्तान के इस आंदोलन में ही नहीं, पूरी दुनिया में हर किस्म की अच्छी और बुरी नौबत पर सिक्ख समुदाय लोगों की मदद में जुट जाता है। म्यांमार से मारकर निकाले गए रोहिंग्या शरणार्थी हों, या अमरीकी लॉकडाउन की वजह से वहां भूखे रहने वाले लोग हों, सिक्ख समुदाय आनन-फानन लंगर शुरू कर देता है, और लोगों को खाना खिलाना धर्म का काम मानकर उसे बढ़ाते चलता है। अभी दो-चार दिन पहले ही अमरीका के न्यूयॉर्क में एक सडक़ का नाम बदलकर पंजाब रखा गया है क्योंकि उस सडक़ पर मौजूद एक गुरूद्वारे में लॉकडाउन के पूरे दौर में हर दिन 10 हजार से अधिक लोगों को खाना खिलाया। हिन्दुस्तान के भीतर भी किसी भी शहर में गुरुद्वारा ऐसी जगह होता है जहां लोगों का धर्म पूछे बिना उन्हें खाना खिलाया जाता है, किसी को मना नहीं किया जाता। जो लोग जरूरतमंद नहीं होते हैं, वैसे लोग भी हिमाचल के मणिकरण जैसे पर्यटनस्थल पर जाने पर खाने के लिए गुरूद्वारे पहुंच जाते हैं। इसलिए आज जब पानी की तोप से मार करती, या लाठी चलाती पुलिस को भी जब बिठाकर सिक्ख समुदाय, किसान खाना खिला रहे हैं, तो यह बाकी लोगों के लिए बहुत कुछ सीखने की मिसाल भी है।

देश के अधिकतर दूसरे धर्मस्थलों पर लोगों के खाने का इंतजाम महज अपने धर्म के लोगों के लिए रहता है। कुछ जगहों पर तो लोगों को कुछ धार्मिक बातें बोलकर इसका सुबूत भी देना पड़ता है, तब उन्हें वहां खाना नसीब होता है, फिर चाहे वे भुगतान करके ही क्यों न खा रहे हों। अधिक धर्मों में इतने संगठित रूप से लोगों की मदद के लिए टूट पडऩे वाले लोग नहीं रहते। ऐसा भी अधिक धर्मों में नहीं होता कि धर्मस्थल पर जो सबसे छोटा काम होता है, उसमें भी उस धर्म के सबसे संपन्न लोग जुट जाते हैं। लोगों का तजुर्बा है कि देश-विदेश से आने वाले अरबपति सिक्ख भी अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में रसोई घर में काम करने लगते हैं, सफाई करने लगते हैं, और तो और वहां आने वाले दर्शनार्थियों के जूते-चप्पल साफ करते फर्श पर बैठे रहते हैं।

एक बार फिर शुरू की बात पर लौटें तो हिन्दुस्तान में किसी भी प्रदर्शन में पुलिस के साथ होने वाले आम टकराव से परे यहां पर लोग जिस तरह पुलिस को खाना परोसकर खिला रहे हैं, उससे उनकी समझदारी भी झलकती है। मौके पर तैनात पुलिस महज प्यादा रहती है, उसे वहां तैनात करने वाली ताकतें दूर बड़े दफ्तरों में बैठी रहती हैं। इसलिए किसी प्रदर्शन को रोकने का फैसला लेना जिस पुलिस के हाथ नहीं रहता, और जो महज ऊपर के हुक्म को मानकर हर किस्म का तनाव झेलती है, उससे टकराना कोई समझदारी नहीं है। यह बात और जगहों पर भी प्रदर्शन करने वालों को समझनी चाहिए कि पुलिस शतरंज की बिसात पर सिर्फ प्यादे सरीखी रहती है जो सबसे पहले नाराजगी झेलती है, लोगों की मार झेलती है, और ऊपर के हुक्म से हिंसा भी करती है। दुनिया में जगह-जगह फौज और पुलिस के सामने प्रदर्शन करने वाले लोग दिखते हैं जो कि सिपाहियों और सैनिकों को फूल भेंट करते हैं। ये तमाम बातें लिखने का मकसद यह है कि सडक़ों पर एक गैरजरूरी टकराव टालना चाहिए, पुलिस को भी हिंसा से बचना चाहिए, और प्रदर्शनकारियों को भी पुलिस को दुश्मन नहीं मानना चाहिए। सिक्खों से सीखने को बहुत कुछ रहता है, दूसरों की मदद करना उनमें सबसे ऊपर है। जो सिपाही या सैनिक उनको रोकने को तैनात हैं, उन्हें भी बिठाकर खिलाना एक बहुत बड़ी सोच है, और इससे सभी को दरियादिली सीखनी चाहिए।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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