लीडरशिप के अकेलेपन पर चर्चा अहमद पटेल के गुजरने के बहाने…

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-सुनील कुमार॥

लंबे समय से कांग्रेस अध्यक्ष के राजनीतिक सलाहकार रहे, और अभी हाल ही में पार्टी के कोषाध्यक्ष बनाए गए अहमद पटेल के गुजरने पर कुछ लोगों ने यह भी लिखा कि अब पार्टी लीडरशिप और नेताओं-कार्यकर्ताओं के बीच की आखिरी कड़ी खत्म हो गई। अहमद पटेल प्रधानमंत्री राजीव गांधी के वक्त से उनके परिवार के सबसे भरोसेमंद लोगों में से एक थे, और बाद के बरसों में आतंकी हमले में राजीव की शहादत के बाद सोनिया परिवार उन पर और अधिक निर्भर हो गया था। अहमद पटेल की कई खूबियां गिनाई जा रही हैं जिनमें सबसे अधिक जोर पार्टी और मुखिया-परिवार के प्रति वफादारी पर दिया जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि वे नेताओं-कार्यकर्ताओं के लिए हमेशा मौजूद रहते थे, वे सोनिया गांधी के लिए आंख-कान की तरह काम करते थे।

अहमद पटेल पर यहां लिखना बिल्कुल भी मकसद नहीं है क्योंकि हम श्रद्धांजलि लेखन पर भरोसा नहीं करते। लेकिन एक बड़े संगठन की लीडरशिप के आंख-कान की तरह काम करने वाले एक आदमी की गिनाई जा रहीं तमाम खूबियों के बावजूद यह नौबत क्यों आ रही है कि ऐसा कहा जा रहा है कि यह परिवार जमीन से कट गया है? हम कांग्रेस के भीतर की उस गुटबाजी पर भी जाना नहीं चाहते जिसके तहत सोनिया के पसंदीदा अहमद पटेल को राहुल-प्रियंका द्वारा नापसंद करने की चर्चा होती है। हर लीडर की अपनी पसंद-नापसंद होती है लेकिन अगर अहमद पटेल इतने ही काबिल नेता थे तो उन्होंने इतने बरसों में सोनिया गांधी की लीडरशिप के किसी काबिल विकल्प के लिए कोशिश क्यों नहीं की थी? आज वे इसका जवाब देने के लिए तो नहीं हैं, और हो सकता है कि उन्होंने अपने बस चलते ऐसी कोशिश की भी हो, और नाकामयाब रहे हों। सवाल यह उठता है कि दशकों से कांग्रेस पार्टी में एक सबसे महत्वपूर्ण नेता बने हुए, और दस बरस से अधिक से सोनिया गांधी के सबसे करीबी पार्टी पदाधिकारी रहते हुए भी वे पार्टी को इस तरह तैयार नहीं कर पाए कि वह इस कुनबे के बिना खड़ी हो सके। तो फिर उनकी यह वफादारी पार्टी के लिए थी, या कुनबे के लिए?

इस परिवार को ही पार्टी मान लेना ठीक उसी तरह गलत होगा जिस तरह आज की मोदी सरकार को ही देश मान लेने की गलती की जा रही है। मोदी सरकार से असहमत लोगों को देशद्रोही और गद्दार करार दिया जा रहा है। एक सरकार से असहमत रहते हुए भी देश के प्रति वफादार रहा जा सकता है, लेकिन भक्तिभाव के बीच ऐसी असहमति की गुंजाइश नहीं छोड़ी जाती। कुछ वैसा ही आज कांग्रेस पार्टी के साथ हो रहा है, कांग्रेस में मुद्दों पर चर्चा करने पर उसे पार्टी से गद्दारी करार दिया जा रहा है। और बीमारी के इस आखिरी महीने के पहले तक तो अहमद पटेल पार्टी के बहुत से मामले तय करने वाले रहते थे। ऐसे में यह कैसे माना जाए कि उन्होंने हमेशा कांग्रेस के ही भले का सोचा। जब एक नौबत ऐसी आ रही है कि कांग्रेस पार्टी का सोचना, और सोनिया परिवार का सोचना दो अलग-अलग मुद्दे बन गए हैं, और इस मामले में हितों का टकराव साफ दिख रहा है, तो ऐसे में अहमद पटेल सरीखी जगह पर बैठे हुए लोगों ने अगर पार्टी को वक्त पर सम्हालने का काम नहीं किया, तो फिर उनकी कामयाबी क्या रही?

जिस तरह मोतीलाल वोरा की बढ़ती उम्र के बाद कोषाध्यक्ष का जिम्मा अहमद पटेल को दिया गया, वह तो एक जायज बात थी। लेकिन इस बात को पिछले डेढ़ दिन में दर्जनों लोगों ने लिखा है कि किस तरह अहमद पटेल के देश के प्रमुख कारोबारी घरानों से अच्छे निजी तालुकात थे। ऐसे में जाहिर है कि इन कारोबारी घरानों से अहमद पटेल के संबंध चुनावी चंदे से जुड़े हुए थे, और कोषाध्यक्ष न रहते हुए भी वे कोष के इंतजाम में लगे रहते थे। ऐसी जनचर्चा भी रहती थी कि महज छोटा चंदा ही मोतीलाल वोरा के बहीखाते तक जाता था, और तमाम बड़े चंदे अहमद पटेल देखते थे। यह पूरा सिलसिला पार्टी के भीतर उनकी ताकत का एक सुबूत था, लेकिन इस ताकत के चलते हुए भी कांग्रेस हाईकमान और पार्टी के ही बड़े-बड़े नेताओं के बीच जो संवादहीनता, और जो संपर्कहीनता बनी थी, उसकी जिम्मेदारी भी तो अहमद पटेल सरीखे ताकतवर लोगों पर आती थी। और लगातार इतने बरस सोनिया गांधी के इर्द-गिर्द सबसे ताकतवर रहने वाले पार्टी नेता ने भी अगर संपर्क और संवाद बनाए रखने का जिम्मा पूरा नहीं किया, तो फिर क्या किया?

अहमद पटेल का मामला यह मिसाल सामने रखता है कि पार्टी की लीडरशिप को अपने-आपको गिने-चुने लोगों से होते हुए ही उपलब्ध रहने की गलती नहीं करनी चाहिए। और यह बात सिर्फ कांग्रेस लीडरशिप को लेकर नहीं है, दूसरी बहुत सी पार्टियों के साथ ऐसी ही दिक्कत हो सकती है, और पार्टियों से परे सरकारों के साथ भी ऐसी दिक्कत हो सकती है, अगर उनके मुखिया बाकी लोगों से संपर्क के लिए अपने कुछ सहयोगियों पर पूरी तरह निर्भर हो जाते हैं। भारत के देश-प्रदेश के इतिहास में ऐसे बहुत से शासनप्रमुख हुए हैं जो कि सत्ता में आने के बाद जड़ों से कट गए। कुछ उन्होंने खुद अपने आसपास के गिने-चुने लोगों को पूरा जिम्मा दे दिया, और फिर यह जिम्मा पाकर उन लोगों ने मुखिया को अपने घेरे में इस तरह समेट लिया कि मुखिया का बाकी सहयोगियों से भी जीवंत संपर्क खत्म हो गया। यह कुछ उसी किस्म का रहा जिस तरह जमीन के भीतर दबाई जाने वाली बिजली की केबल किसी खुदाई के दौरान कुदाली की मार से कट न जाए इसलिए बिजली के तारों के ऊपर मैटल का एक जाल गूंथकर उसे आर्मर्ड केबल बना दिया जाता है। सत्ता चाहे वह पार्टी की हो, या सरकार की, मुखिया के इर्द-गिर्द जब इनसुलेशन बढ़ते-बढ़ते फौलादी हो जाता है, एक आर्मर्ड केबल की तरह हो जाता है, तो मुखिया की उंगलियां अपनी ही सरकार या अपने ही संगठन की नब्ज पर से हट जाती हैं। आज अगर कांग्रेस हाईकमान लोगों की पहुंच के बाहर माना जाता है, ऐसा माना जाता है कि उनसे वे ही लोग मिल सकते हैं जिनसे वे लोग मिलना चाहते हैं, तो यह एक मुखिया की हिफाजत नहीं है, यह एक मुखिया को जड़़ों से दूर कर देना है।

अहमद पटेल की सज्जनता और उनके अच्छे बर्ताव की बड़ी तारीफ हो रही है, लेकिन जिस तरह वे बाकी तमाम पार्टी के लिए इतने बरस तक जैसे एक बैरियर बने हुए थे, आज उनके हटने से लोगों का यह लिखना जायज है कि कांग्रेस हाईकमान की पार्टी नेताओं-कार्यकर्ताओं से संपर्क की आखिरी कड़ी टूट गई।

लीडरशिप के साथ एक दिक्कत यह रहती है कि पहाड़ की चोटी पर जगह बहुत कम रहती है, और लीडर अपने इर्द-गिर्द के बहुत छोटे दायरे के बहुत गिने-चुने लोगों पर निर्भर हो जाने की चूक करते हैं। यह चूक लीडरशिप की जरूरत वाली किसी भी जगह पर हो सकती है, अमूमन हो जाती है। कांग्रेस के कामकाज में ऐसी एक कड़ी का खत्म हो जाना इस संगठन के एक व्यक्ति पर इस बुरी तरह आश्रित रहने का एक सुबूत भी है। किसी भी समझदार और दूरदर्शी संगठन, या सरकार को अपने लीडर को आर्मर्ड केबल की तरह घेरकर नहीं रखना चाहिए, उसे अधिक लोगों की राय सुनने का मौका देना चाहिए ताकि संभावनाएं अनसुनी न रह जाएं, और सहयोगियों और सलाहकारों की नापसंदगी और उनके पूर्वाग्रह अपने लीडर को घेरकर न रख लें। आज यहां लिखने का मकसद कांग्रेस के संगठन की फिक्र करना नहीं है, उसके लिए उसके पास बहुत से ऐसे लोग हैं जिनकी आज अपनी ही पार्टी की लीडरशिप तक कोई पहुंच नहीं है, हमारे लिखने का मकसद बाकी लोगों को अपने-अपने घर ठीक रखने के लिए सचेत करना है।
-सुनील कुमार

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