बंगाल चुनाव में केंद्र कटघरे में होगा : दीपांकर भट्टाचार्य..

हाल के बिहार चुनावों में देश के सामने भाकपा (माले) एक बड़े और सुदृढ़ राजनितिक समूह के रूप में उभर कर आया है। 19 में से 12 सीटें जीतने वाली इस पार्टी का ज़मीनी आधार कैसा था और कैसे उसने तुम्मनखां भाजपा-जेडीयू गठबंधन को धूल चटाई यह बिहार से बाहर बैठे लोगों को ताज्जुब में डालने वाली बात थी। संसदीय राजनीति की चौपड़ पर हालिया दशकों में कूदी ‘माले’ भविष्य के पश्चिम बंगाल चुनावों में क्या रणनीति बना रही, भाजपा को शत्रु नंबर 1 मानने वाली पार्टी किस प्रकार के भाजपा विरोधी राष्ट्रीय मोर्चे की परिकल्पना कर रही है, साम्प्रदायिकता के प्रश्न सहित भारतीय मुस्लिम समाजों को गोलबंद करने का उसका क्या नजरिया है, इन तमाम सवालों पर पार्टी के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य से वरिष्ठ पत्रकार अनिल शुक्ल की विस्तृत बातचीत।

बिहार की जीत से संतुष्ट हैं या कुछ कमी बेसी रह गई?


पूरी तरह संतुष्ट तो नहीं हो सकते क्योंकि पूरा लक्ष्य था एनडीए सरकार को रोकना और महागठबंधन की पूरी जीत। वह लक्ष्य तो पूरा नहीं हो पाया। हम लोग समझते थे कि पंद्रह सीट जीतना चाहिए लेकिन तीन सीट कम मार्जिन से हम लोग नहीं जीत पाए इसलिए थोड़ा अफ़सोस ज़रूर है लेकिन ओवरऑल रिज़ल्ट्स से बिहार के लिए और पूरे देश के लिए एक मज़बूत विपक्ष उभर कर आया। मुझे लगता हैं कि अपने आप में भी यह एक बड़ी जीत है। सरकार नहीं बदली लेकिन भारतीय जनता पार्टी का जिस तरह से विपक्ष रहित लोकतंत्र या एक दल शासन का जो इरादा है, उस पर बिहार ने एक ज़बरदस्त चोट की है।

आप लोग मानकर चल रहे थे और सरकार बनती हुई दिख रही थी। अगर सरकार बनती तो ‘माले’ उसका हिस्सा होती?


अब तो यह सवाल ‘हाइपोथीटिकल’ बन गया है। हमने सोचा था कि जो एजेंडा बनकर आ रहा था, जो ‘चार्टर’ था, उसे ‘कॉमन मिनिमम प्रोग्राम’ का रूप देना था। उसके इम्प्लीमेंटेशन के लिए, उसकी गारंटी के लिए हमारा जो भी रोल मुनासिब होता हम करते। शायद हम लोग अंदर नहीं रहते लेकिन उस एजेंडे के इम्प्लीमेंटेशन के लिए सरकार की मदद भी करते उस एजेंडे को जारी रखने के लिए जो आन्दोलन है, उसकी गारंटी बनते।


अगर ज़्यादा बड़ा प्रेशर होता, आपकी अपनी रेंक एन्ड फ़ाइल का और सहयोगी दलों का भी, तो क्या शामिल हो सकते थे?


जो नहीं हो पाया उसको लेकर अभी चर्चा करके क्या होगा, लेकिन हमें नहीं लगता है कि इसमें कोई ऐसी बाध्यता है कि सरकार में शामिल होकर ही कर सकते हैं। मिसाल के तौर पर जिस समय देवेगौड़ा और आईके गुजराल की सरकार थी, उस समय सीपीआई ने सरकार में हिस्सा लिया। इंद्रजीत गुप्ता इस देश में गृहमंत्री थे चतुरानन्द मिश्र जी कृषि मंत्री रहे लेकिन मेरे ख़याल से उसको बहुत ज़्यादा लोग याद नहीं रख सके जबकि जो यूपीए वन की सरकार थी, और जिस समय लेफ़्ट के पास अच्छी ताक़त थी और उस दौर में, जो थोड़ा एजेंडा बदला। मनरेगा जैसा क़ानून बना, फ़ॉरेस्ट एक्ट, राइट टू इन्फॉर्मेशन एक्ट जैसे ढेर सारे क़ानून बने। हमें लगता है उस दौर में ये जो एजेंडा थोड़ा शिफ़्ट हुआ था, उसमें लेफ़्ट की बड़ी भूमिका थी। लोग उस भूमिका को ज़्यादा याद रखते हैं बनिस्पत इंद्रजीत जी या चतुरानन्द जी के लेफ़्ट के मंत्री होने की। लेफ़्ट के मंत्री बनकर (अब कुछ अलग टाइप के मंत्री हों तो अलग बात है) मेरे ख़याल से लेफ़्ट की ताक़त बढ़ने से, ‘माले’ जैसी पार्टी की ताक़त बढ़ने से जनता की जीत हासिल होती है- बाहर भी और अंदर भी। लोग ये देखना चाहते हैं, उसके लिए जो भी रास्ता ठीक हो।


रिज़ल्ट के बाद आपने बयान दिया था कि कांग्रेस को ज़्यादा सीट दी गईं। अगर पचास परसेंट कांग्रेस को मिलती और पचास परसेंट आपको तो नतीजे अलग होते?


पचास परसेंट तो मैंने नहीं कहा था। मैंने कहा था जैसे मान लीजिये 2015 में 41 सीट पर कांग्रेस लड़ी थी। 41 पर लड़कर एक अच्छा प्रदर्शन था। इस बार जीत का जो प्रतिशत है वह घटकर बहुत नीचे रह गया। उसी एंगिल से हमने सोचा था कि ये जो संख्या है बहुत बड़ी संख्या थी। कांग्रेस की जो तुलना थी, उस स्थिति में, उतने पर वो कॉन्संट्रेट करती तो कांग्रेस के लिए भी फायदेमंद होता और हम लोगों को भी ज़्यादा सीटें मिलतीं। सीपीआई, सीपीएम, आरजेडी- सबके लिए बेहतर होता। जो फ़र्स्ट फ़ेज़ का चुनाव था, उसमें हमारा सबसे बेहतर रहा। हम लोग आठ सीट पर लड़े और सात पर जीत हासिल की। उस फेज़ में अगर हमें 15 सीट या 20 सीट मिलती तो हमारा स्ट्राइक रेट 90 परसेंट होता। उस हिसाब से लड़ पाते और जीत पाते तो आज परिदृश्य कुछ और होता।


आप तो ज़मीनी पार्टी हैं। पहले आप को अंदाज़ नहीं था कि कांग्रेस इतनी ख़राब हालत में है। आपने पहले क्यों नहीं स्टैंड लिया ?


आरजेडी और कांग्रेस के बीच आपसी तय हुआ था सीटों के बारे में। वहाँ उस तरह का कोई ‘कलेटिव डिस्कशन’ और कोई ‘कलेक्टिव निगोसिएशन’ जैसा माहौल नहीं था। अलग-अलग पार्टियों के बीच में बात हुई। हम लोगों की आरजेडी के साथ ही बातचीत हुई। अब आगे चलकर ही सीट शेयरिंग के लिए समीक्षा हो सकती है।


अभी तक इन नतीजों को लेकर आप लोगों ने मिल कर कोई समीक्षा नहीं की है?


नहीं। अभी तो हम लोगों के बीच दो बाते हुईं हैं। एक तो कई सीटें, जहाँ बहुत कम मार्जिन से हम लोग हारे हैं (आरजेडी के लोग भी हारे हैं, पूरे महागठबंधन के लोग हारे हैं) करीब 12 ऐसी सीटें हैं। उन सीटों पर हम लोगों ने ‘रीकाउंटिंग’ की मांग की थी लेकिन वह मानी नहीं गई। अभी हम लोगों का ज़ोर है कि काउंटिंग का सीटीवी का फुटेज हमें उपलब्ध करवाया जाय ताकि हम उसे ‘क्लोज़ एक्ज़ामिन’ कर सके। अगर लगे कि इसमें कहीं किसी क़िस्म की अनियमतता बरती गई है तो उस पर आगे के बारे में हम लोग सोच सकें।
दूसरा, बिहार में अभी एक मज़बूत विपक्ष के रूप में भूमिका निभानी है। अभी आपने देखा कि किस तरह नितीश जी ने, मोदी जी ने मेवालाल चौधरी को मंत्री के रूप में थोपने की कोशिश की। जिस तरह से महागठबंधन द्वारा तगड़ा विरोध हुआ, मीडिया से लेकर,जनता तक, सभी ने हमें सपोर्ट किया। तीन दिन के भीतर उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा। यह एक ज़बरदस्त मिसाल है कि अगर मज़बूत विपक्ष हो और जनता जागरूक हों, सड़क पर हो, तो क्या नहीं किया जा सकता है।
अभी बिहार में मंगल पांडे को फिर से स्वास्थ्य मंत्री बना दिया गया है, जबकि ‘चमकी’ बुखार से लेकर पूरे कोविड 19 तक वह एक निकम्मे मंत्री साबित हुए हैं। ऐसे ही गया ज़िले में, दूसरा ‘हाथरस काण्ड’ हुआ लेकिन इसे दबाकर रखा गया ताकि चुनाव में इसका असर न पड़े। अब इस लड़की और उसके परिवार को इन्साफ मिले, इसे लेकर बिहार में बड़ी आवाज़ बुलंद हो रही है।


ये जो मार्जिनल विक्ट्री हुई हैं सत्ता दल की और जिन पर आप लोगों का जीत का दावा है, उन सीटों को लेकर कोर्ट में जाने का कोई प्लान भी है?


इसीलिये हम लोगों ने माँगा है सीटीवी का फुटेज। वह हमारा अधिकार है। उसे देख कर हम लोग तय करेंगे कि किस तरह आगे बढ़ें। कोर्ट में भी जाने का एक प्रावधान है।


चुनाव आयोग क्या कह रहा है फुटेज देने के बारे में ?


हम लोगों ने तो आरओ से माँगी है। आपको पता है कि गुजरात में सीटीवी फुटेज को आधार बनाकर दो पिटीशन दायर हुए थे। हमें उम्मीद है कि यहाँ भी मिलना चाहिए। दो चार दिन में रिस्पॉन्स नहीं आया तो आगे के बारे में सोचेंगे।


एक बार फिर से कांग्रेस की बात करें। अब रिज़ल्ट्स के बाद कांग्रेस को कैसे देखते हैं ?


हम समझते हैं कि कांग्रेस पार्टी खुद भी सोचेगी। कांग्रेस अभी भी देश में विपक्ष की एक बड़ी पार्टी है। इसलिए कांग्रेस की जो भूमिका बननी चाहिए इस दौर में, वह इस भूमिका को निभाए। हम तो यही सोचेंगे।


क्या आप राष्ट्रीय स्तर पर भविष्य के साथी के रूप में कांग्रेस को देखते हैं?


अभी अखिल भारतीय स्तर पर तो ऐसा कोई सिंगल मोर्चा उभर कर आया नहीं है। अगर बिहार को लें तो वह एक तरह का ख़ाका है। जिस तरह का गठबंधन बिहार में बना है, अगर यह गठबंधन आगे बढ़ता है (एक संभावना के तौर पर मैं इसे देखता हूँ) तो लेफ़्ट की ताकतें, समाजवादी विचारधारा की ताकतें और कांग्रेस। एक प्रकार से कहें तो आज़ादी के आंदोलन तमाम धाराएं, आज उन धाराओं के बीच में एक संवाद, उनके नज़दीक आने की एक प्रक्रिया शुरू हुई है। आरएसएस, वो धारा जो आज़ादी के आंदोलन में बिलकुल ग़ायब थी, न सिर्फ़ ग़ायब थी बल्कि आज़ादी के आंदोलन के ख़िलाफ़ खड़ी थी, उसके साथ जो वैचारिक संघर्ष रहा, वह अब फिर दिखाई पड़ रहा है देश में।


पिछले कई दशकों में साम्प्रदायिकता की बड़ी घटनाओं के साथ कांग्रेस का नाम जुड़ा रहा है। 80 का पंजाब, कश्मीर, दिल्ली के सिख विरोधी दंगे, बाबरी मस्जिद का ताला खोलना, शाहबानों पर उलट-पुलट और अब राहुल गाँधी और दूसरे कोंग्रेसियों का तथाकथित ‘सॉफ्ट हिन्दु इज़्म’? बीजेपी और इनमें कैसे फ़र्क़ देख रहे हैं आप ?


अब सॉफ़्ट और हार्ड में (जैसा अभी आपने शब्द इस्तेमाल किया ) फ़र्क़ तो है ही। भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ सम्पूर्णता में, समग्रता में, निर्णायक लड़ाई होनी चाहिए। सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, वैचारिक धरातल पर। उसमें कांग्रेस की जो भी भूमिका बन सकती है बने। उस पर निर्भर करने की बात तो कोई नहीं कर रहा है।


कम्युनिस्ट आंदोलन का इतिहास है-शत्रु नम्बर एक और शत्रु नम्बर दो ढूंढते रहने का। आपको नहीं लगता है कि इस सोच ने वामपंथी-जनतांत्रिक आंदोलन को काफी नुकसान पहुँचाया है?


किसी पुराने दौर से आज के दौर की तुलना ठीक नहीं है। आज जैसा दौर आया है, भारतीय जनता पार्टी का जैसा दबदबा बन रहा है, उसकी विचार धारा हमारे देश में लोकतंत्र के लिए, संविधान के लिए ज़बरदस्त खतरा है। एक बहुत बड़ी आपदा हैे- आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक। हम बदलाव और सामाजिक परिवर्तन की पार्टी हैं लेकिन हमें आपदा प्रबंधन के बारे में भी तो सोचना पड़ेगा। ये जो हम आपदा का सामना कर रहे हैं उसे रोकने में हम क्या भूमिका निभा सकते हैं, यह भी सोचना पड़ेगा ? आज की तारीख में बीजीपी के साथ किसी और पार्टी की तुलना नहीं हो सकती। यह एक नम्बर की टारगेट है और बनी रहेगी जब तक हमारे इस लोकतंत्र में सांस लेने की जगह न बने। यह तमिलनाडु जैसे उन राज्यों में भी टारगेट नम्बर वन है जहाँ अभी यह विधानसभाओं में बड़ी ताकत नहीं है लेकिन उसका वैचारिक दबाव, केंद्र की उसकी सरकार का दबाव, आप महसूस कर सकते हैं। जिन्हें लोकतन्त्र चाहिए, जिन्हें संविधान चाहिए, उनके सामने बहस की कोई गुंजायश नहीं है कि बीजेपी दुश्मन नंबर एक है या नहीं।


बंगाल के चुनाव की आप लोगों की गठबंधन की क्या परिकल्पना है?


बिहार और बंगाल में कुछ समानता भी है, कुछ फ़र्क़ भी है। मोटे तौर पर जिन हालातों में बिहार में चुनाव हुए, लगभग वैसे ही हालात बंगाल में भी रहेंगे। कोरोना का असर, लॉक डाउन की मार, मुद्दे भी काफी मिलते जुलते हैं। हमारी प्राथमिकता रहेगी कि जैसे बिहार में पच्चीस सूत्रीय चार्टर बन के आया था, वैसा ही यहाँ भी बने। चुनाव के लिए ‘पीपल्स चार्टर’ बने। भाजपा की कोशिश रहती है, जैसा कि बिहार में हमने देखा, कि राज्य के चुनाव में मोदी जी, केंद्र सरकार और उसकी नीतियां-ये सब विमर्श से बाहर रहे। हमारी कोशिश होगी कि बंगाल के चुनाव में केंद्र सरकार और उसकी नीतियों को भी कटघरे में खड़ा किया जाय। जिन नीतियों के ख़िलाफ़ अभी 26 तारीख को देशव्यापी हड़ताल हो रही है उन नीतियों को, किसान जो इतने बड़े- बड़े प्रदर्शन कर रहे हैं उन नीतियों को , नई शिक्षा नीतियों को जिसके ख़िलाफ़ छात्रों-नौजवानों का आंदोलन चल रहा है, रोज़गार का सवाल । इन सभी सवालों को चुनाव का केंद्रीय विषय बनाया जाय ताकि चुनाव एकांगी न हो।


अभी अपने बताया कि बिहार में सीटों के तालमेल को लेकर आपसे पूछा नहीं गया। बंगाल में तालमेल कैसे होगा? बड़ा भाई कौन होगा, सीपीएम या आप लोग?


अभी हमें नहीं पता कि सीपीएम और कांग्रेस के बीच बातचीत कहाँ तक पहुंची हैं। हम देखेंगे कि लेफ़्ट के बीच में जो बातचीत हो उसमें सीटों के तालमेल से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है कि चुनाव एकांगी न रहने दिया जाय। हमें सबसे पहले यह देखना होगा की बंगाल में जो कांग्रेस-लेफ़्ट का गठबंधन होगा, वह इस रणनीति के साथ है या नहीं। अगर इस रणनीति के साथ हैं तो तालमेल की गुंजायश बनेगी और नहीं हैं तो अलग से देखना होगा।


बंगाल की जो पोलिटिकल एम्बिएंस है, 2011 में जब वोटर ने सीपीएम. सीपीआई को बेदख़ल किया था, आपको क्यों लगता है कि इन 9 सालों में उन्होंने ऐसी क्या राजनीतिक पहल कर डाली है कि लोग बीजेपी के बजाय उनको स्वीकार कर लेंगे और उनके साथ आपको ?


लोगों का अपना तजुर्बा होता है। बिहार में हमने देखा कि सन 2014 के बाद 19 में लोगों के सोचने में फ़र्क़ आया। सन 14 में जो नौजवान मोदी-मोदी करते थे, इस बार हमने देखा कि जैसे ही बीजेपी वाले मोदी जी का वीडियो अपलोड करते हैं, वही नौजवान ‘डिस्लाइक’ का बटन दबा देते। हालात बदले हैं। उन्होंने महसूस किया कि रोज़गार का जो सवाल है, मोदी सरकार इसकी दुश्मन है। मोदी सरकार निजीकरण की सरकार है। जितना निजीकरण आगे बढ़ेगा उतना ही उनका भी नुकसान होगा। अब निजी शिक्षा जितनी महंगी होगी उतना ही उनकी मुश्किलें बढ़ेंगी। उसी तरह निजी चिकित्सा, कोविड ने उसका दर्द बता दिया है । जो सवाल कल तक महत्वपूर्ण नहीं थे आज बन गए हैं। 2014 के चुनाव में, यहाँ तक कि 2019 के चुनाव में जो प्रवासी मज़दूर अपने घर फ़ोन करके कहते थे कि मोदी जी को एक मौक़ा ज़रूर देना, विकास करेंगे, लॉक डाउन के बाद वही मज़दूर कहते हैं कि इनको सबक़ ज़रूर सिखाना । ये सारे सवाल बंगाल में भी है और बंगाल में लेफ़्ट अभी भी एक मज़बूत ताकत है और लोगों को भरोसा है लेफ़्ट पर।


सीपीएम, सीपीआई ने बंगाल, केरल और त्रिपुरा में अपने शासन के दौरान भूमिहीन किसान और कृषि मज़दूरों की राहत के लिए कोई सॉलिड काम नहीं किया है?


हाँ उतना नहीं किया है जितना उम्मीद थी लेकिन कुछ तो किया है। भूमि सुधार के लिए, ग्रामीण मज़दूरों के लिए जिन सरकारों ने किया है उनमें सबसे पहले वाम सरकारों पर ही चर्चा होगी। हाँ मानता हूँ कि जितना करना चाहिए था, उतना नहीं किया। भूमि सुधार तभी हो सकता है जब जनता संगठित हो। उसमें आप किसी एक सरकार को ही ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकते।


नैनो के लिए टाटा को ज़मीन देना जिसके चलते उनकी ‘प्रो पूअर’ वाली सारी इमेज छिन्न भिन्न हुई और ममता राजनीति में ऊपर आ गयीं ?


हाँ वह एक गलत फैसला था। हम लोगों ने खुद इसका पुरज़ोर विरोध किया था। नंदीग्राम और सिंगूर की अधिग्रहण की करवाई, यह वाममोर्चा सरकार की भारी गलती थी। लोग लेकिन एक घटना या एक दौर से हमेशा नहीं देखते, किसानों के प्रति, गरीबों के प्रति जो प्रतिबद्धता रही है लेफ्ट फ्रंट की, वह एक रेकॉर्ड है। आज भी लोग उन पर भरोसा करेंगे।


जब आप लोग इतनी ज़मीनी लड़ाइयों से जुड़े हैं तो साम्प्रदायिता के सवाल पर, दूसरे बेसिक सवालों पर, चुनाव लड़ने के सवाल पर , सीपीआईएमएल क्यों नहीं नेतृत्व की कमान संभालने की पहल करती है? क्यों हमेशा पीछे-पीछे, कभी आरजेडी तो कभी सीपीएम?


नहीं, जितना संभव होता है उतना करते हैं। इसीलिये आज हम यहाँ हैं। हमने इन तमाम सवालों पर, जहां हमारी पहलकदमी संभव है, हमलोग लेते रहे हैं। बढ़ाएंगे इसको।


मुस्लिम समाजों के जो अंदरूनी सवाल हैं, ‘माले’ उसे कैसे लेती है ?


इस समय जबकि संविधान और लोकतंत्र ख़तरे में है, जो अल्पसंख्यक हैं, कहीं धर्म के आधार पर, कही भाषा के आधार पर उनके लिए असुरक्षा बढ़ गयी है। जो अल्पसंख्यक हैं उन पर जो दबाव बढ़ाया जा रहा है उसे कम किया जाए। समानता क़ानून आंदोलन में जिस तरह से मुस्लिम लोगों ने भाग लिया और उनकी महिलाओं ने जिस तरह से बढ़ चढ़ कर हिस्से दारी निभाई वह शानदार है। हमारा काम यह है कि हम देखें कि जो लोग आंदोलन में भाग ले रहे हैं, उन्हें वीक्टिमाइज़ न किया जाए।


यह तो एक मुद्दा है, मैं जो बात कह रहा हूँ वह उनके भीतर के अंतर्विरोध की हैं (उनके जातीय और वर्गगत भेद ) उन्हें लेकर। उनके बीच में भी अशरफ़ (अभिजात्य), अज़लाफ (पिछड़े) और अरज़ाल (दलित) हैं। आंदोलनों में भी अशरफ़ के मुक़ाबले अज़लफ और अरज़ाल की बड़ी हिस्सेदारी थी। उन्हें सीपीआईएमएल जैसा राजनैतिक संगठन कैसे लेता है?


देखिये जैसा कि आपने कहा, कम्यूनिटी के जो अपने अंतर्विरोध हैं, उन्हें कम्यूनिटी के लोग स्वयं हल करेंगे। हमने उस आंदोलन को उस नज़र से नहीं देखा था। हमें नहीं पता कि उस कम्यूनिटी के किस हिस्से का कितना प्रतिनिधित्व उसमें हो रहा है। हमारा ज़्यादा काम किसी भी कम्यूनिटी में जो सबसे ज़्यादा दबे कुचले हैं, उन्हीं के बीच में है। हम लोगों का जब काम बढ़ेगा, हमारी सीटें बढ़ेंगी तो हाशिये पर जो लोग हैं उनके सामने ज़्यादा स्पेस होगा।


ओवैसी को आप कैसे देखते हैं? क्या वह भविष्य में आपके साथी बन सकते हैं?


अभी भविष्य के बारे में तो कहना मुश्किल है, लेकिन हम उन लोगों में नहीं जो ये सवाल उठाएं कि ओवैसी साहब इतने चुनाव क्यों लड़ रहे हैं? और लोग क्यों उन्हें वोट दे रहे हैं ? हमें लगता है कि यह उनका लोकतान्त्रिक अधिकार है। हैदराबाद की पार्टी है लेकिन अब पूरे देश में फैलना चाहती है। हमने ये अंदाज़ा लगाने की कोशिश की कि लोग उन्हें वोट क्यों कर रहे हैं ? हमें तो ये समझ में आया कि कम्यूनिटी के जो बहुत सारे सवाल हैं, (हालाँकि वह उस तरह से कम्यूनिटी के सवाल नहीं हैं, वह सवाल संविधान के हैं) डेमोक्रेसी जिस तरह से खतरे में जा रही है, उससे जुड़े सवाल हैं ये। फिर भी ये मुसलमानों से जुड़ा समझा जाता है। उन्हें लगा कि ये जो गैर भाजपा, ग़ैर लेफ़्ट पार्टिया हैं, वे वोट तो लेना चाहती हैं लेकिन सवालों पर खामोश हो जाती हैं। कफील ख़ान की गिरफ्तारी हो जाय तो, उमर ख़ान की गिरफ़्तारी हो जाय, तो इन सारे सवालों पर चुप्पी सी दिखती है। हमें लगता है कि इस चुप्पी को तोडना बहुत ज़रूरी है। मैं आपको तीसरे चरण के चुनाव के 2 उदाहरण देता हूँ। ओवैसी फेक्टर के बावजूद, ज़िले में महागठबंधन को एक ही सीट मिली- माले को। मुस्लिम बहुल इस क्षेत्र में, यहाँ ओवैसी के केंडिडेट भी थे, उसे सिर्फ़ 8000 वोट मिले। क्योंकि उन्हें पता है कि ओवैसी की पार्टी से ज़्यादा मुखर है ‘माले’। अगर ओवैसी से माले की तुलना होगी तो लोग जानते है कि वह ज़्यादा कंसिस्टेंट है। वहां हमने 2 सीटें जीती।


बंगाल में ओवैसी आपके फ़्रंट का हिस्सा बन सकते हैं ?


देखिये अभी तो हमीं किसी फ़्रंट का हिस्सा नहीं हैं। बंगाल की अभी क्या स्थिति बनेगी, हमको नहीं पता। ओवैसी यहाँ आकर कितनी सीटों पर लड़ना चाहेंगे, क्या करेंगे, हमें कुछ नहीं पता।
(‘सत्य हिंदी डॉट कॉम’ से साभार )


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