गाय-मंत्रीमंडल और लवजिहाद विरोधी कानून..

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-सुनील कुमार॥
मध्यप्रदेश में उपचुनाव में दो तिहाई सीटें जीतकर अपनी सरकार बचाने के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आधा दर्जन मंत्रालयों को मिलाकर एक गाय-मंत्रिमंडल बनाया है। पशुपालन, वन, पंचायत, ग्रामीण विकास, गृह, और किसान कल्याण विभागों का गाय के मुद्दे से कुछ न कुछ लेना-देना रहता है, इसलिए इनको मिलाकर एक काऊ-कैबिनेट बना दी गई है ताकि मध्यप्रदेश में गायों की रक्षा हो सके।

पिछले बरसों में देश के अलग-अलग राज्यों ने गोवंश को बचाने की लुभावनी नीति बनाते हुए ऐसे कड़े कानून बनाए कि लोगों के लिए जानवर खरीदकर लाना-ले-जाना, बूढ़े और अनुत्पादक हो चुके जानवरों को बेचना नामुमकिन सा हो गया है। अगर सरकारी विभागों की निगरानी से किसी तरह लोग बच भी निकलते हैं, तो सडक़ों पर गौरक्षक नाम के हिंसक और हथियारबंद जत्थे मौके पर ही भीड़त्या के लिए तैयार रहते हैं। कुल मिलाकर भारत के किसानों से, दूध उत्पादकों से जानवरों का जो रिश्ता था उसे खतरे का एक सामान बना दिया गया है। अब मध्यप्रदेश की सरकार दूसरे राज्यों से गौरक्षा के मामले में आगे बढ़ते हुए एक गाय-मंत्रिमंडल बना रही है। इस प्रदेश में लड़कियों और दलितों को अगर हिफाजत से जीना है, तो उन्हें भी ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह उन्हें गाय बना दे।

हिन्दुस्तान चुनाव जीतने में मदद करने वाले भावनात्मक और लुभावने मुद्दों से घिरते चल रहा है। अभी 20 बरस पहले तक मध्यप्रदेश का हिस्सा रहे छत्तीसगढ़ में भी गाय से जुड़े कुछ फैसले किए गए हैं, लेकिन वे ग्रामीण विकास और रोजगार से जुड़े हुए अधिक हैं, यह एक अलग बात है कि आरएसएस ने जाकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की तारीफ की है कि गाय की रक्षा के लिए उन्होंने जो फैसले लिए हैं, उनके लिए संघ आभार और अभिनंदन करता है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार ने अपनी परंपरागत लीक से हटकर धर्म और हिन्दुओं से जुड़ी हुई गाय को लेकर काफी कुछ किया है। राम के वनवास के दौरान उनके छत्तीसगढ़ से भी गुजरने की जो प्रचलित कहानी है, उसके मुताबिक भूपेश सरकार राम वन गमन पथ को पर्यटन के मुताबिक विकसित कर रही है। गाय का गोबर खरीद रही है, गाय और दूसरे दुधारू पशुओं को गांवों में गौठान बनाकर रखने की एक मौलिक और महत्वाकांक्षी योजना पर काम बहुत बढ़ चुका है। अब देखना यह है कि हिन्दुओं के इन भावनात्मक मुद्दों पर सरकार की जो रकम खर्च हो रही है, क्या उसका कोई उत्पादक इस्तेमाल भी हो रहा है, या यह सरकारी खर्च पर चलने वाली एक लुभावनी योजना ही रह जाएगी?

आज हिन्दुस्तान में हिन्दू-मुस्लिम प्रेमियों के बीच गिनी-चुनी शादियां होती हैं। अगर परिवार और समाज बवाल न करें, राजनीतिक दल मुद्दा न बनाएं, तो ऐसे कोई सुबूत नहीं हैं कि अंतरधार्मिक शादियों से किसी एक धर्म का नुकसान हो रहा है, या किसी दूसरे धर्म की आबादी बढ़ रही है। लेकिन इसे लवजेहाद का जुबानी तमगा देकर एक के बाद दूसरा भाजपाशासित राज्य इसके खिलाफ कानून बनाने की बात कर रहा है। अभी हमें ऐसे किसी कानून की संवैधानिकता समझ नहीं पड़ी है क्योंकि भारत का संविधान बालिग लोगों को मर्जी से शादी की छूट देता है, और उन्हें कानूनी संरक्षण देता है। ऐसे में अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच किसी शादी को लेकर कैसे कोई कानून बन सकता है, यह समझ से थोड़ा परे है। और फिर यह भी हो सकता है कि सरकारें ऐसे किसी कानून की संवैधानिकता की कमजोरी जानते हुए इस पर आगे बढ़ रही है क्योंकि यह बहुसंख्यक समुदाय को खतरा बताकर हिफाजत देने का एक लुभावना काम हो सकता है। जो भाजपा-सरकारें अपने प्रदेशों की हिन्दू लड़कियों को मुस्लिम लडक़ों से शादी करने से रोकना और बचाना चाहती हैं, वे सरकारें अपने प्रदेशों में हिन्दुओं के हाथों हिन्दू लड़कियों, और दूसरे धर्मों की लड़कियों पर बलात्कार रोकने के लिए पर्याप्त कार्रवाई नहीं कर रही हैं। बहुत से मामलों में तो भाजपा के सांसद और विधायक बलात्कारियों का साथ देते खड़े दिखते हैं। अब सवाल यह है कि लड़कियों को बलात्कार से बचाना प्राथमिकता नहीं है, बल्कि लड़कियों को अपनी मर्जी से शादी करने देने से रोकना राज्य सरकारों की बड़ी प्राथमिकता बन गई है। खुद भाजपा के बड़े-बड़े नेता ऐसे हैं जिन्होंने खुद ने, या परिवार के लोगों ने दूसरे धर्मों में शादियां की हैं, बहुत सी शादियां मुस्लिम युवकों से हिन्दू युवतियों की भी हुई हैं। लेकिन एक सामाजिक खतरा बताते हुए, एक धार्मिक मुद्दा बनाते हुए लवजेहाद नाम के एक शब्द को गढक़र हिन्दू वोटरों के बीच अपनी पैठ बढ़ाई जा रही है। जब कभी किसी अदालत में कुछ कहने की बात आती है, या इन्हीं सरकारों से कोई सूचना के अधिकार में पूछते हैं, तो सरकार का जवाब होता है कि उसके रिकॉर्ड में लवजेहाद नाम का कोई शब्द नहीं है। लेकिन अब कानून बनाकर इसके खिलाफ कुछ करने की मुनादी बहुत से भाजपा राज्यों ने कर दी है।

हम इन दो मुद्दों को एक साथ इसलिए उठा रहे हैं कि गाय का मामला, और हिन्दू लड़कियों का मुस्लिमों से शादी का मामला, ये दोनों ही मामले सरकारों के लोक-लुभावने धार्मिक मुद्दों को कानूनी जामा पहनाने की एक कोशिश अधिक दिख रही है, अपने प्रदेशों में जलते-सुलगते असल मुद्दों से निपटने की कोशिश नहीं दिख रही है। लेकिन जब तक हिन्दुस्तान के वोटरों का एक बड़ा तबका ऐसे ही भावनात्मक मुद्दों पर सरकारें बना रहा है, चतुर पार्टियों को इसी एजेंडा को आगे बढ़ाने में समझदारी दिख रही है।

फिलहाल मध्यप्रदेश में गाय-मंत्रिमंडल बनने के बाद यह उम्मीद की जानी चाहिए कि वहां के घूरों पर जिंदा गाय को अब बेहतर क्वालिटी का पॉलीथीन खाने मिलेगा ताकि उसके पेट में जमा होने वाले पॉलीथीन की घटिया क्वालिटी से उसे नुकसान होना बंद हो सके।

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