सुशासन बनाम जंगलराज..

Desk

पिछले महीने भर से बिहार चुनाव का शोर देश में इस कदर छाया था कि बाकी सारी बातें गैरजरूरी बना दी गईं। और ऐसा क्यों न होता, आखिर देश के प्रधानमंत्री से लेकर केन्द्रीय केबिनेट के कई चेहरे और कई बड़े नेता इसी जुगाड़ में लगे थे कि किसी तरह बिहार में भाजपा की जीत हो जाए और एनडीए की सरकार बन जाए। उनकी यह मेहनत सफल भी हुई। इस बीच देश में कोरोना के मामले बढ़ते रहे, महंगाई बढ़ती रही, किसान अपनी समस्याओं के जवाब के इंतजार में रहे और कई शोषित-पीड़ित लोग इंसाफ की राह देखते रहे।

बिहार चुनाव के पहले हाथरस कांड की चर्चा देश में थी, जिस पर उत्तरप्रदेश पुलिस और सरकार दोनों की कार्यशैली पर सवाल उठे थे। एक लड़की को पहले बुरी तरह प्रताड़ित कर उसका यौन शोषण हुआ, उसे मानसिक-शारीरिक यातनाएं दी गईं और उसे सही समय पर सही इलाज भी मुहैया नहीं कराया गया और जब उसने दम तोड़ दिया तो उसे सम्मान के साथ अंतिम विदाई लेने का हक भी सरकार और प्रशासन ने छीन लिया। इस मामले की तह तक जाने के लिए कई मीडियाकर्मियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनेताओं को तरह-तरह के विरोध और प्रताड़नाओं का सामना करना पड़ा। उस वक्त देश में ऐसा माहौल बन रहा था कि लड़कियों की सुरक्षा पर कम से कम अब जनता के बीच सरकार को आना ही होगा। लेकिन हाथरस की बात भी निर्भया की बात की तरह लोगों की याददाश्त से बड़ी जल्दी मिटाने की कोशिश की गई, इसके लिए कई गैरजरूरी मुद्दे खड़े किए गए। दो-ढाई महीने में फिर चीन, पाकिस्तान, राम मंदिर, कश्मीर चर्चा-परिचर्चा का केंद्र बन गए।

बिहार के चुनाव में भी ये मुद्दे छाए रहे, इनके बरक्स विपक्ष ने बेरोजगारी को मुद्दा बनाने में सफलता पाई, लेकिन भाजपा के लिए शायद जमीनी मुद्दे कोई अहमियत ही नहीं रखते हैं, वो भावनाओं को भुनाने वाली राजनीति करती है। इसलिए बिहार आकर मोदीजी से लेकर योगीजी तक सबने अपने-अपने तरीके से हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का प्रचार किया। बिहार में जंगलराज का जिक्र भी बार-बार हुआ। हालांकि मुजफ्फरपुर के बालिकागृह कांड जैसी वीभत्स घटनाओं के बाद भाजपा की नजर में जंगलराज की क्या परिभाषा है, ये तो वह बेहतर बता सकती है। इस कांड में आरोपी मंजू वर्मा को टिकट देकर नीतीश कुमार ने अपने सुशासन की झलक दिखला दी थी और चुनाव के दौरान इसी सुशासन का एक और भयावह उदाहरण देखने मिला। वैशाली जिले के रसूलपुर गांव में एक लड़की ने अपने साथ होने वाली छेड़खानी पर विरोध दर्ज किया तो उन लड़कों ने लड़की पर केरोसिन छिड़क कर उसे जिंदा जला दिया।

लड़की को पटना के अस्पताल में इलाज के लिए लाया गया, लेकिन 15 दिन बाद उसने दम तोड़ दिया। बीते रविवार जब इस घटना से नाराज ग्रामीणों ने विरोध-प्रदर्शन किया तो पुलिस के दखल के बाद रात को ही लड़की का अंतिम संस्कार कर दिया गया। गौरतलब है कि ये घटना तब घटी, जब बिहार में जनता से जंगलराज और सुशासन के बीच किसी एक को चुनने का आह्वान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कर रहे थे। लेकिन लोग कहीं सचमुच सुशासन के सबूत न मांगने लगे, इस वजह से इस घटना के बारे में पूरे चुनाव के दौरान कोई खबर ही नहीं लगी। सत्ता द्वारा, सत्ता का, सत्ता के लिए, ऐसा निर्लज्ज इस्तेमाल और कहां देखने मिलेगा। 

अब जब ये घटना सामने आ गई तो इसके आरोपी भी पकड़ाई में आ गए, मुमकिन है गरीब गांववालों को, लड़की के परिजनों को कुछेक लाख का मुआवजा देकर शांत भी करा दिया जाएगा। जैसे लोग हाथरस भूल गए, वैसे वैशाली भी भूल जाएंगे। इस भूलने-भुलाने की आदत के दर्जनों प्रकरण देश में मौजूद हैं। लेकिन अब लोगों को सोचना चाहिए कि इस कमजोर याददाश्त से वो कैसे अपने लिए असुरक्षित माहौल बना रही है। जनता को जब-जब नौकरी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पानी, सुरक्षा जैसे मुद्दे याद आते हैं, भाजपा उन्हें याद दिला देती है कि राम मंदिर उसी के शासन में बनेगा, कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा उसी ने छीनने की हिम्मत दिखाई है। पाकिस्तान को घर में घुसकर मारने का साहस मोदी सरकार रखती है। इतने से भी काम न बने तो भाजपा लव जिहाद का मुद्दा ले आती है। जिसमें निशाने पर होते हैं मुस्लिम।

मध्यप्रदेश में अपनी सरकार सुरक्षित करने के बाद अब शिवराज सरकार ने लव जिहाद के खिलाफ कानून बनाने की प्रक्रिया तेज कर दी है। वैसे भाजपा को यह बात याद रखनी चाहिए कि वैशाली की पीड़िता एक मुस्लिम थी और उसे मारने वाले हिंदू। क्या वे इस प्रकरण को भी लव जिहाद के एंगल से देखेंगे। अगर बिहार में कांग्रेस या गैरभाजपाई सरकार होती और मरने वाली लड़की हिंदू, और आरोपी मुस्लिम होते तो अब तक बिहार में भी लव जिहाद का मुद्दा उठ चुका होता। वैसे छेड़खानी या बलात्कार जैसे गंभीर मामलों में पीड़िता की तकलीफ उसकी जाति या धर्म से परे होती है, लेकिन हिंदुस्तान का एक कड़वा सच ये भी है कि अल्पसंख्यक और दलित महिलाओं की पीड़ा, उनकी दुर्दशा सवर्ण तबके से कहीं अधिक है। और इस सबसे बढ़कर सबसे कड़वी सच्चाई ये है कि अब देश में महिलाओं की रक्षा, उनके आत्मसम्मान और स्वतंत्र अस्तित्व का सवाल राजनैतिक लाभ-हानि के नजरिए से समझा जा रहा है, इसलिए उसका कोई स्थायी हल नहीं मिल रहा।

(देशबंधु)

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