कांग्रेस आत्मचिंतन क्यों नहीं करना चाहती.?

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बिहार चुनाव में महागठबंधन को मिली शिकस्त के बाद कांग्रेस में फिर से अंतर्विरोध उभरने लगे हैं। महागठबंधन बहुत कम अंतर से पराजित हुई है, अगर इसे जीत मिलती तो निश्चित तौर पर इसका सेहरा तेजस्वी यादव के माथे सजता और इसमें राजद के साथ-साथ वामदलों की सफलता भी रेखांकित होती, लेकिन कांग्रेस के प्रदर्शन पर तब भी प्रश्नचिह्न लगता।

राजद और महागठबंधन के दूसरे साथियों पर काफी दबाव बनाकर कांग्रेस ने 70 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन केवल 19 पर जीत हासिल की। पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी तो शायद स्वास्थ्य कारणों से प्रचार के लिए नहीं आ पाईं, प्रियंका गांधी भी बिहार चुनाव से दूर ही रहीं और ऐसा लगा मानो राहुल गांधी ने अकेले कांग्रेस की ओर से प्रचार का मोर्चा संभाला है। 70 सीटों के लिए उन्होंने 10 से भी कम रैलियां कीं, जबकि भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 12 रैलियां कीं और भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा ने 22 रैलियां की। भाजपा के कई बड़े नेता, केन्द्रीय मंत्री भी रैलियां करते नजर आए। जबकि कांग्रेस की ओर से प्रचार, जनसभाओं और जनसंवाद में उत्साह की कमी दिखी। भाजपा की और प्रधानमंत्री मोदी के प्रचारतंत्र पर खर्च होने वाली राशि, उनकी प्रचारप्रियता की आलोचना हो सकती है, लेकिन इस बात से कैसे इन्कार किया जा सकता है कि भाजपा हर चुनाव को इसी मकसद से लड़ती है कि किसी भी तरह उसे जीत हासिल करनी है।

जबकि कांग्रेस में बीते कई सालों से यह जुझारूपन गायब नजर आ रहा है। तेजस्वी यादव ने रिकार्ड जनसभाएं कीं, वामदलों की ओर से भी कन्हैया कुमार जैसे नेताओं ने अच्छे से जनता को जोड़ा। भीड़ तो राहुल गांधी की सभाओं में भी उमड़ी, लेकिन वे अकेले शायद जनता को ये विश्वास दिलाने में असफल रहे कि कांग्रेस और उसके साथी एनडीए का अच्छा विकल्प हो सकते हैं। सीमांचल में कांग्रेस को करारी हार मिली, जबकि यहां उसके मतदाताओं की संख्या अधिक थी। यहां असद्दुदीन ओवैसी ने अपनी नींव बनानी शुरु कर दी और कांग्रेस शायद इस बात को जानबूझ कर नजरंदाज करती रही। ओवैसी को भाजपा की बी टीम कहने से न उन्हें फर्क पड़ा, न भाजपा को और न शायद मतदाताओं को। इसलिए कांग्रेस के कई प्रत्याशी यहां हार गए।

कांग्रेस के इस कमजोर प्रदर्शन से हताश होकर भारतीय किसान कांग्रेस के राष्ट्रीय संयोजक और बिहार प्रभारी राजकुमार शर्मा के नेतृत्व में पार्टी के बिहार मुख्यालय सदाकत आश्रम में ‘कांग्रेस बचाओ दलाल भगाओ’ महाधरना आयोजन किया गया। इस महाधरना के माध्यम से पूर्व विधायकों से लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं तक ने कांग्रेस बिहार प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल, सांसद अखिलेश प्रसाद सिंह, पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा, पार्टी नेता सदानंद सिंह समेत स्क्रीनिंग कमेटी के अध्यक्ष अविनाश पांडे पर टिकट वितरण में धांधली और दलाली करने का गंभीर आरोप लगाया है। वहीं राजद के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने भी बयान दिया कि कांग्रेस महागठबंधन के लिए बोझ बन गई थी। जब बिहार चुनाव थे, तब राहुल शिमला में पिकनिक मना रहे थे। उनके इस बयान से हालांकि राजद ने खुद को अलग कर लिया है और कांग्रेस ने भी इस बयान पर ऐतराज जताया है। 

लेकिन ये वक्त राहुल गांधी के लिए रक्षात्मक रुख अख्तियार करने से ज्यादा आत्मविश्लेषण का है। राहुल गांधी सार्वजनिक जीवन में हैं, तो उन्हें इस तरह की टीका-टिप्पणियां मिलती ही रहेंगी, लेकिन उन पर सवाल-जवाब करने से अधिक कांग्रेस नेतृत्व को और तमाम वरिष्ठ नेताओं को ये विचार करना चाहिए कि आखिर कांग्रेस राज्य दर राज्य हारती क्यों जा रही है।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने भी एक साक्षात्कार में खुलकर कहा कि पार्टी को स्वीकार करना होगा कि हम कमजोर हो रहे हैं। आत्मचिंतन का वक्त खत्म हो चुका है। हम उत्तर जानते हैं। कांग्रेस में इतना साहस और इच्छा होनी चाहिए कि सच्चाई को स्वीकार करे। गौरतलब है कि सिब्बल पार्टी के उन 23 नेताओं में से एक हैं, जिन्होंने अगस्त में पार्टी नेतृत्व को विरोध पत्र लिखा था। इसको लेकर पार्टी के भीतर काफी घमासान मचा था। हालांकि इसके बावजूद कांग्रेस में कोई बदलाव नहीं दिखा, बल्कि पत्र लिखने वाले नेताओं का कद कम कर दिया गया। अब देखना ये है कि बिहार में कांग्रेस के बड़े नेताओं पर टिकट वितरण में धांधली का जो आरोप लगा है, उस पर क्या पार्टी कोई कार्रवाई करेगी।

बिहार के साथ-साथ गुजरात, उत्तरप्रदेश, यहां तक कि मध्यप्रदेश में भी कांग्रेस को निराश होना पड़ा। जबकि मध्यप्रदेश में दावे यही किए जा रहे थे कि जनता गद्दारों यानी कांग्रेस छोड़कर भाजपा गए विधायकों का साथ नहीं देगी और कांग्रेस को ही जिताएगी। ये दावे राज्य इकाई ने किस आधार पर किए थे, क्या राष्ट्रीय नेतृत्व इस बारे में कोई पूछताछ करेगा या मध्यप्रदेश को वहां के तथाकथित क्षत्रपों के भरोसे छोड़ दिया जाएगा, जो अपने बयानों से आए दिन पार्टी को नुकसान पहुंचाते रहते हैं। कुछ बड़े नेताओं की उच्छृंखलता को नजरंदाज करने का ही नतीजा था कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई, और राजस्थान में बड़ी मुश्किल से सरकार बचा पाई।

पंजाब में भी संगठन के भीतर नाराजगी के सुर उठने लगे हैं और अन्य राज्यों में भी कांग्रेस संगठन के भीतर एकजुटता का अभाव देखा जा रहा है। ये स्थिति संगठन के समर्पित कार्यकर्ताओं के लिए बिल्कुल मुफीद नहीं है। कांग्रेस कुछ लोगों की पार्टी बन कर रह जाएगी तो जनता तक अपनी पैठ कैसे बना पाएगी। जिस तरह आजादी के आंदोलन में गांधीजी ने कांग्रेस को जनसामान्य से जोड़ने की मुहिम चलाई थी, कुछ वैसी ही जरूरत आज भी है। सवाल यही है कि ये बीड़ा कौन उठाएगा?

(देशबंधु)

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