बिहार, और बाकी देश के नतीजों के बाद भी अब भी कांग्रेस चैन से.?

बिहार, और बाकी देश के नतीजों के बाद भी अब भी कांग्रेस चैन से.?

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-सुनील कुमार॥
कांग्रेस पार्टी के सामने बिहार के चुनावी नतीजों से परे भी एक चुनौती है। बिहार में वह सत्तारूढ़ नहीं थी, सत्तारूढ़ गठबंधन में भी नहीं थी, और वह साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर समान सोच रखने वाली आरजेडी और वामपंथी दलों के साथ एक गठबंधन में भी जो कि सत्ता से दस कदम ही दूर रह गया। और यह बात आंकड़ों से लेकर तर्कों तक से साबित होती है कि कांग्रेस की बिहार विधानसभा चुनाव में बुरी शिकस्त के चलते ही महागठबंधन की सरकार नहीं बन पाई। कांग्रेस ने 70 सीटें हासिल करके उम्मीदवार खड़े किए थे, और उनमें से कुल 19 जीत पाए। जबकि कुल 29 सीटों पर लडऩे वाले वामपंथी उम्मीदवारों ने 16 सीटें हासिल की। महागठबंधन की अगुवा पार्टी, आरजेडी के एक नेता शिवानंद तिवारी ने कांग्रेस को महागठबंधन पर बोझ बताते हुए कहा कि उसने प्रत्याशी तो 70 उतारे थे, लेकिन इतनी भी रैलियां चुनाव प्रचार के दौरान नहीं कीं। राहुल गांधी महज तीन दिनों के लिए प्रचार में आए, और प्रियंका गांधी नहीं आईं। शिवानंद तिवारी ने कहा कि जब चुनाव प्रचार अपने चरम पर था तब राहुल गांधी शिमला में प्रियंका के घर पर पिकनिक कर रहे थे, पार्टी को क्या ऐसे चलाया जाता है?

यह बात सही है कि बिहार चुनाव प्रचार की खबरों के बीच जब यह खबर आई थी कि राहुल गांधी शिमला में छुट्टी मना रहे हैं, तो वह बड़ी हैरानी की बात थी। बिहार में उसके 70 उम्मीदवार लड़ रहे थे, और बाकी देश में जगह-जगह उपचुनावों में कांग्रेस उम्मीदवार थे, लेकिन राहुल किसी और प्रदेश में नहीं गए थे। वे महज बिहार प्रचार में शामिल हुए थे, और जैसा कि शिवानंद तिवारी ने कहा है कि वे तीन दिनों के प्रचार पर पहुंचे थे। बिहार के नतीजे आए ही थे कि खबरों में बने हुए अमरीका से राहुल गांधी के बारे में एक खबर आई। पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की एक किताब छपकर आ रही है जिसमें उन्होंने राहुल से अपनी मुलाकात और अपने तजुर्बे के बारे में लिखा है- राहुल गांधी में एक तरह की घबराहट और अपरिपक्वता नजर आते हैं, जैसे किसी छात्र ने अपने शिक्षक को प्रभावित करने के लिए खूब पढ़ाई तो की हो लेकिन उस विषय की पूरी योग्यता उसके पास न हो। ओबामा ने राहुल गांधी को नर्वस बताया था और जुनून की कमी बताई थी।

ओबामा की ऐसी कोई निजी वजह नहीं है कि वे भारत की कांग्रेस पार्टी या उसके भविष्य के नेता राहुल गांधी पर कोई अवांछित हमला करें। उन्होंने बस अपने विचार सामने रख दिए। लेकिन ओबामा से परे खुद राहुल की पार्टी के एक बड़े नेता, यूपीए सरकार में पूरे दस बरस मंत्री रहने वाले कपिल सिब्बल ने कल एक अंग्रेजी अखबार, इंडियन एक्सप्रेस, को दिए गए इंटरव्यू में बिहार के चुनावी नतीजों के साथ-साथ देश भर में हुए उपचुनावों के नतीजों की बात की, और कांग्रेस पार्टी में इस पर आत्मविश्लेषण की जरूरत बताई। लोगों को याद है कि सिब्बल उन 23 कांग्रेस नेताओं में थे जिन्होंने अगस्त में पार्टी लीडरशिप को पार्टी के तौर-तरीके बदलने के लिए एक चिट्ठी लिखी थी। उस चिट्ठी को भी गिनाते हुए सिब्बल ने कहा कि पार्टी के पास अब आत्मचिंतन का भी समय खत्म हो गया है। उन्होंने कहा कि जिन राज्यों में कांग्रेस सत्तारूढ़ पार्टी का विकल्प है, वहां भी जनता ने कांग्रेस के प्रति विश्वास नहीं जताया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस में इतना साहस और इच्छा होने चाहिए कि सच्चाई को स्वीकार करें। उन्होंने यह भी कहा कि इतने लोगों ने जो चिट्ठी लिखी थी, पार्टी के भीतर तब से अब तक उस पर कोई चर्चा नहीं हुई और पार्टी लीडरशिप की ओर से किसी चर्चा की कोशिश होते भी नहीं दिख रही है।

हम शिवानंद तिवारी या बराक ओबामा की कही बातों को अनदेखा करते हुए भी यह लिखना चाहेंगे कि बिहार चुनाव प्रचार के बीच जब राहुल के शिमला जाने की बात आई, तो हमें हैरानी हुई थी कि कुल 14 दिन चलने वाले चुनाव प्रचार में भी अगर राहुल गांधी अपने उम्मीदवारों पर मेहनत नहीं कर रहे हैं, तो वे जाहिर तौर पर और निश्चित रूप से गठबंधन के साथ भी ज्यादती कर रहे हैं जिसने कांग्रेस को अनुपातहीन ढंग से अधिक, 70 सीटें दी थीं। सीटें पाने के लिए कांग्रेस ने दबाव डाला था, लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान जिन भरोसेमंद अखबारनवीसों ने मैदानी रिपोर्टिंग की थी, उनका यह मानना था कि कई सीटों पर तो कांग्रेस चुनाव लड़ते ही नहीं लग रही थी। कपिल सिब्बल की यह बात ध्यान देने लायक है कि एक वक्त जिस उत्तरप्रदेश पर कांग्रेस ने राज किया था, जहां से एक के बाद दूसरे प्रधानमंत्री भेजे थे, उस उत्तरप्रदेश में आज कांग्रेस कुछ सीटों पर दो फीसदी वोट भी नहीं पा सकी।

कांग्रेस पार्टी चुनावी राजनीति से परे किसी देश सेवा या समाज सेवा में लगी हुई संस्था नहीं है। उसकी नीयत चाहे देश सेवा और समाज सेवा की हो, हालांकि उसके नेताओं को देखें तो ऐसा भी नहीं लगता है, कांग्रेस का अस्तित्व चुनाव लडऩे और जीतने पर टिका हुआ है। और कांग्रेस पार्टी ने पिछले छह बरस में लगातार संसद में मौजूदगी खोई है, और एक-एक करके अधिकतर राज्य खोए हैं। शिवानंद तिवारी, ओबामा, और कपिल सिब्बल सहित 23 कांग्रेस नेता, इन सबकी जरूरत भी नहीं है यह समझने के लिए कि कांग्रेस लीडरशिप किस तरह एक मकसद खो चुकी, जुनून खो चुकी, जवाबदेही खो चुकी लीडरशिप हो गई है जिससे इतने बड़े देश और उसके दो दर्जन से अधिक प्रदेश के मोर्चों को सम्हालने की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। हकीकत तो यह है कि कांग्रेस आज अपना संगठन भी नहीं सम्हाल पा रही है क्योंकि जैसा कि कपिल सिब्बल ने याद दिलाया है, कांग्रेस कार्यसमिति एक मनोनीत मंच है जिससे कि मनोनयन करने वाले के खिलाफ सोचने की भी उम्मीद नहीं की जा सकती, किसी आलोचनात्मक नजरिये की भी नहीं।

लेकिन यह कहना ठीक नहीं होगा कि कांग्रेस के पास खोने को बचा ही क्या है। एकबारगी ही हमें तीन ऐसे राज्य याद पड़ते हैं जहां पर कांग्रेस की सरकार है, और कम से कम एक ऐसा राज्य याद पड़ता है जहां वह गठबंधन में है। इसलिए कांग्रेस के पास आज भी खोने के लिए तीन-चार राज्य तो बचे हैं ही, लेकिन क्या कांग्रेस इसी में खुश है?

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