शेर को बिस्कुट खिलाने की अधिसूचना..

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-हिना ताज॥


केंद्र सरकार ने फैसला किया है कि अब से ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टलों, ऑनलाइन कॉन्टेंट प्रोवाइडरों की निगरानी भी सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय करेगा । इसमें सभी ओटीटी प्लेटफॉर्म्स जैसे हॉटस्टार, नेटफ्लिक्स और अमेजन प्राइम भी शामिल किये गये हैं। केंद्र सरकार ने मंगलवार को इसकी अधिसूचना जारि करते हुए तर्क दिया था कि ऐसा करने के पीछे का कारण डिजिटल कंटेंट की निगरानी के लिए कोई कानून या फिर स्वायत्त संस्था नहीं होना है। केंद्र का ज़ोर इस बात पर रहा कि उसके इस कदम का कारण फिल्म मेकर्स और आर्टिस्ट्स को सेंसर बोर्ड के डर और सर्टिफिकेशन के बिना अपना कंटेंट रिलीज करने से रोकना है। क्योंकि यह मांग की जा रही थी कि इस पर निगरानी और विवादित कंटेंट पर अंकुश लगाने के लिए सरकार कोई कदम उठाए।


मोटे तौर पर इस निर्णय को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर स्वायत्त नियमन के तहत देखा जा सकता है लेकिन सरकार के इस फैसले के पीछे की क्रोनोलॉजी कुछ और ही कहती है। दरअसल 2014 में मोदी सरकार आने के बाद से इलेक्ट्रोनक मीडिया का हाल किसी से छिपा नहीं रह गया है। मोदी सरकार ने खुले तौर पर संविधान के चौथे स्तंभ की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करते हुए ज़्यादातर मीडिया संस्थानों को अपने प्रभाव क्षेत्र में ले लिया जो आज के परिप्रेक्षय में गोदी मीडिया के नाम से जाना जाता है।
लेकिन मोदी फैक्टर के तहत काम करने को उन लोगों ने सिरे से खारिज कर दिया जिन्में पत्रकारिता के गुण जीवित बचे थे। इसलिये यह धड़ा सोशल प्लेटफॉर्म्स पर सक्रिय होने के साथ ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल की तरफ खिसक गया। 2018 आते आते देश में ऑनलाइन मीडिया हिट हो गया । जिसने बीजेपी आईटी सेल के हथकंडों के लिये सिर दर्द का काम किया और इसके द्वारा प्रसारित फेक न्यूज़ के खिलाफ बेहद कारगर अभियान चलाया । दि वायर, दि प्रिंट, न्यूज़ क्लिक, दि क्विंट जैसे नये नये उगे न्यूज़ पोर्टल्स ने केंद्र सरकार की ऐसी खिंचाई की कि मोदी की माया में डूबी जनता का ब्रेन वॉश होने लगा, विकास, नोटबंदी, जीएसटी, एनआरसी-सीएए जैसे मुद्दों को मोदी का मास्टर स्ट्रोक समझने वाली जनता सवालों की लंबी लिस्ट के सात मुखर हो गई। इसलिये मोदी सरकार को लगने लगा की ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के डिजिटल कंटेंट की निगरानी के लिए कोई कानून या फिर स्वायत्त संस्था नहीं होना उनके शासन के लिये खतरनाक साबित हो सकता है।


बीजेपी के लिये सोशल प्लेटफॉर्म इतना बड़ा डर साबित हुआ है कि कई लोगों को यहां सिर्फ मोदी शासन के खिलाफ लिखने के लिये जेलों में डाल दिया गया । आज अर्नब केस में सुप्रीम कोर्ट हाइकोर्ट को उसके अधिकार याद दिलाने के लिये भले ही यह राय दे कि लोगों की व्यक्तिगत आज़ादी को बनाए रखने के लिये उसे अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने की ज़रूरत है क्योंकि लोग ट्वीट के लिये जेल जा रहे हैं। लेकिन सच तो यह है कि मोदी जी के प्रिय पत्रकार को रिहा करने भर के लिये व्यक्तिगत अभिव्यक्ति के दूसरे मामलों में गिरफ्तार किय गये लोगों का ज़िक्र करना देश की सबसे बड़ी न्यायपालिका का जस्टिफिकेशन ही नज़र आता है। यह देश का दुर्भाग्य ही है कि गोदी मीडिया और स्वायत्त संस्थाएं सब एक टूल की तरह मोदी की पिक्चर की तैयार पटकथा पर बस अभिनय कर रहे हैं। बीजेपी सरकार के लिये भारत का ऑनलाइन मीडिया इन्हीं पिक्चरों का सेंसर बोर्ड बन गया था, जिसे अपने कब्जे में लिये बिना इसकी नकेल खींचना इससे पहले मोदी सरकार के लिये दि वायर जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर करोड़ो के मुकदमें की हियरिंग में उलझने जैसा था।


इसलिये ऑनलाइन माध्यमों का नियमन आज मोदी सरकार को टीवी से ज़्यादा ज़रूरी लगने लगा है। इसलिये खास तौर पर ऑनलाइन माध्यमों से न्यूज़ या कॉन्टेंट देने वाले माध्यमों को मंत्रालय के तहत लाने का कदम उठाया गया है। तो क्रोनोलॉजी यह है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म की आड़ सिर्फ बहाना है। असली खेल डिजिटल मीडिया को पालतू बनाना है।

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