बिहार चुनाव को लेकर टुकड़ा-टुकड़ा कुछ बातें..

Desk

-सुनील कुमार॥
बिहार के इस बार के चुनावी नतीजे बीती रात आधी रात के बाद तक आते रहे, और आज सुबह अलग-अलग पार्टियों की सीटों और उनके वोटों की तस्वीर साफ हुई। वैसे तो भाजपा ने अपने राष्ट्रीय नेता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दम पर यह चुनाव लड़ा था, और एक किस्म से मोदी ही चुनाव मैदान में थे, इसलिए जीत के हकदार मोदी ही हैं। उनकी पार्टी ने कई किस्म से कई मोर्चों पर शानदार प्रदर्शन किया और सत्ता पर अपने गठबंधन की वापिसी सुनिश्चित की। दूसरी तरफ बिहार में सरकार बनाने का मोदी से भी अधिक श्रेय कांग्रेस को जाता है जिसने गठबंधन में 70 सीटें हासिल कीं, और उनमें से 51 सीटें हार गई। मोटेतौर पर यही 51 सीटें तेजस्वी को सत्ता से दूर रखने वाली रहीं। अगर कांग्रेस कम सीटों पर लड़ी होती, और उन सीटों पर वामपंथियों को मौका दिया गया होता, तो आज तेजस्वी मुख्यमंत्री होता। वामपंथियों को 28 सीटें दी गईं जिनमें से 16 सीटें उन्होंने जीतकर गठबंधन को दीं। ऐसा अनुपात अगर कांग्रेस की जीत का होता तो फिर बात ही क्या थी।


सीटों के आंकड़े कई मायनों में बहुत दिलचस्प हैं। भाजपा ने अपनी 21 सीटें बढ़ा लीं, और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सीएम घोषित किया था, लेकिन नीतीश की पार्टी जेडीयू की सीटें 28 घट गईं। अब रामविलास पासवान के गुजरने के बाद उनके बेटे चिराग ने नीतीश के खिलाफ खुली बगावत करते हुए एनडीए छोड़ दिया था, और सिर्फ एक मुद्दे पर पूरा चुनाव लड़ा कि वे अगली सरकार बनाकर नीतीश कुमार को जेल भेजेंगे। अब चिराग पासवान ने 135 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे, और उनका एक उम्मीदवार जीता भी है। लेकिन जिस दम-खम के साथ उन्होंने अपना सीना चीरकर मोदी की छवि दिखाने का दावा किया, और मोदी के मुख्यमंत्री के उम्मीदवार की पार्टी को जमकर हराया भी, वह देखने लायक था। आंकड़े बताते हैं कि करीब डेढ़ दर्जन सीटों पर नीतीश की पार्टी की हार चिराग पासवान की पार्टी की वजह से हुई है। अब मोदी का नाम जपने वाले चिराग ने अपने समर्थकों से भाजपा के पक्ष में वोट डालने कहा होगा, और नीतीश के खिलाफ वोट डालने कहा होगा। यह भी एक वजह है कि भाजपा को फायदा हुआ, और जेडीयू को नुकसान हुआ। ऐसी चर्चा चारों तरफ हर राजनीतिक विश्लेषक की कलम से कुछ हफ्तों से आ रही थी कि भाजपा नीतीश कुमार का कद काटकर छोटा करने जा रही है, भाजपा की ऐसी कोई साजिश अगर थी, तो वहां तक तो हमारी पहुंच नहीं थी, लेकिन चुनावी नतीजे आज यह सवाल भी खड़ा कर रहे हैं कि क्या अब भी भाजपा को नीतीश को सीएम बनाना चाहिए? और यह सवाल भी कि क्या नैतिकता के नाते नीतीश को खुद ही पीछे नहीं हट जाना चाहिए? कुल मिलाकर आज नीतीश की हालत यह है कि सुबह से एक दर्जन कार्टूनिस्ट नीतीश को मोदी की जेब में, मोदी के कंधे पर सवार, मोदी की उंगली पकडक़र चलते हुए बना चुके हैं। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बन भी जाते हैं तो भी यह हार रहेगी, और तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री नहीं भी बनते हैं तो भी वे जीते हुए हैं क्योंकि वे विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी बन चुके हैं। इस मौके पर बेमौके की एक बात यह है कि खुद तेजस्वी यादव के लिए नेता प्रतिपक्ष का एक कार्यकाल, जिसमें वामपंथी उनके करीबी सहयोगी रहेंगे, वह उनके लिए निजी रूप से मुख्यमंत्री के कार्यकाल के मुकाबले बेहतर होगा।


बिहार चुनाव के विश्लेषण में वहां के अधिक जानकार लोगों ने दो बातें लिखी हैं जिन पर गौर करना चाहिए। पहली बात तो यह कि दलितों के वोट वाली पार्टी को जब तेजस्वी के गठबंधन से निराशा हुई, तो वे छोडक़र निकल गए, और एनडीए जाकर मोदी से कुछ सीटें पाईं, कई सीटें जीतकर दीं, और जाहिर है कि बहुत सी दूसरी सीटों पर उन्होंने एनडीए को अपने समुदाय के वोट भी दिलवाए होंगे। बिहार के जानकार लोगों का यह भी मानना है कि मुस्लिम समाज की राजनीति करने वाले ओवैसी ने तेजस्वी यादव के गठबंधन को मिलने वाले मुस्लिम वोटों में खूब घुसपैठ की, और खुद भी 5 सीटें पाईं, और कुछ दर्जन सीटों पर वोट पाकर गठबंधन की संभावनाएं खत्म कीं। ओवैसी से राजनीतिक विश्लेषकों को यही उम्मीद थी, और उन्होंने उसे पूरा किया। लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने आज सुबह ही ओवैसी को वोटकटवा कहकर उन्हीं अटकलों और आरोपों को आगे बढ़ाया है कि ओवैसी गालियां तो बीजेपी को देते हैं, लेकिन उनकी हरकतों से फायदा भी बीजेपी को ही मिलता है।
कुल मिलाकर बिहार का यह चुनाव वामपंथियों के शानदार प्रदर्शन का रहा, उन्होंने अपनी सीटें बढ़ाईं, अपने वोट बढ़ाए, उन्हें मिली सीटों पर जीत का प्रतिशत शानदार रहा। तेजस्वी यादव ने हाशिए पर से जीत से दस कदम पीछे तक का यह सफर शानदार तरीके से तय किया। मोदी के करिश्मे और चुनाव जीतने की उनकी तकनीक के बारे में हम कल भी इसी जगह लिख चुके हैं।
बिहार के ये चुनाव खासे जटिल थे, एनडीए में बड़ी फूट थी, गठबंधन को छोडक़र लोग निकले थे, ओवैसी ने भारतीय राजनीति में अपनी एक चर्चित उपयोगिता जमकर साबित की, और आखिर में कांग्रेस के बारे में यह कहना होगा कि उसने इतना बड़ा कौर मुंह में भर लिया था कि जो उसकी चबाने की क्षमता से अधिक बड़ा था। जिन 70 सीटों पर कांग्रेस ने उम्मीदवार खड़े किए, उतनी जगह चुनाव लडऩे की उसकी तैयारी भी नहीं थी, ऐसा भी एक वरिष्ठ पत्रकार ने लिखा है, और चुनावी नतीजे भी साबित करते हैं कि यह अंदाज हो सकता है सच हो। अधिक सीटें हासिल करने में तो कांग्रेस गठबंधन के भीतर जीत गई, लेकिन मतदाताओं के सामने इनमें से बड़ी संख्या में सीटें भी हार गई, और तेजस्वी की मुख्यमंत्री बनने की मजबूत संभावना को भी हरा दिया। फिर भी एक बात है, भाजपा के लोग नाशुकरे नहीं हैं, बहुत से भाजपा नेता खुलकर इस बात को मंजूर कर रहे हैं कि कांग्रेस ने एक बार फिर भाजपा को सरकार में आने में पूरी मदद की। अब यह बात कांग्रेस की नीयत में तो नहीं होगी, लेकिन यह उसकी नियति जरूर बन गई है।

Facebook Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Next Post

इस अंत से किसका भला.?

अंत भला तो सब भला, इस सोची-समझी चुनावी अपील का पूरा फायदा नीतीश कुमार को मिला। काफी जद्दोजहद के बाद सही, लेकिन बिहार चुनाव में आखिरकार एनडीए ही विजेता बनकर उभरा है। और अब वे फिर से मुख्यमंत्री पद पर बैठने जा रहे हैं। हालांकि उनकी पार्टी जदयू अब बिहार […]
Facebook
escort eskişehir - lidyabet - macbook servis - kabak koyu
%d bloggers like this: