Home मीडिया अर्नब की तरफ से तर्क और हाथरस मामले में बंद पत्रकार का दर्द

अर्नब की तरफ से तर्क और हाथरस मामले में बंद पत्रकार का दर्द

-संजय कुमार सिंह॥
बार एंड बेंच डॉट कॉम के अनुसार अर्नब गोस्वामी की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने अदालत में कहा, मेरा स्पष्ट आरोप है कि जो मामला बंद हो चुका था उसे गलत इरादे से फिर खोला गया है। यह सत्ता में बैठे लोगों के खिलाफ कवरेज के लिए बदले की कार्रवाई है। साल्वे ने यह भी कहा कि यह (अर्नब की गिरफ्तारी और उनके खिलाफ मामला शुरू किया जाना) याचिकाकर्ता (अर्नब) को उत्पीड़ित करने की कार्रवाई है।


इसीलिए पुलिस रिमांड के लिए सर्वश्रेष्ठ कोशिश की गई। साल्वे ने यह भी कहा कि अर्नब के खिलाफ कई एफआईआर हैं और यह बदनियती से काम करने का स्पष्ट मामला है। यह भी दावा किया गया कि अन्वय नाइक का 90 प्रतिशत भुगतान किया जा चुका है। और भुगतान नहीं करना सिविल सूट का मामला है। इस आधार पर यह दलील दी गई कि अर्नब को हिरासत में रखने की आवश्यकता नहीं है।


इसपर अदालत ने कहा कि हम आपकी बाद सुनेंगे पर हमारे पास जो मूल मामला है उसमें हम जमानत का मामला नहीं सुन सकते। इसपर हरीश साल्वे ने कहा कि मैं तो कार्रवाई शुरू किए जाने को ही चुनौती दे रहा हूं और हाईकोर्ट को जमानत देने का अधिकार है। साल्वे ने यह भी कहा कि यह मामला 2019 का है और तबसे अभी तक कुछ नहीं हुआ है। अभी से लेकर दीवाली तक क्या होगा। इस क्रम में साल्वे ने एक दिलचस्प बात कही। (जमानत मिलने पर) क्या वे अपने चैनल पर जाएंगे और (मुंबई के पुलिस आयुक्त) परमबीर सिंह के खिलाफ बोलेंगे? हां, बोलेंगे। लेकिन क्या इससे जांच में बाधा पड़ेगी? नहीं।


मैं यह लेेख यही बताने के लिए लिख रहा हूं। चूंकि पूरा मामला नेट पर है इसलिए इसे पढ़कर मुझे लगा कि अर्नब की तरफ से उसके वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता साफ कह रहे हैं कि अर्नब को जमानत पर छोड़ दिया जाए (क्योंकि गिरफ्तारी उचित नहीं है) और वह चैनल पर जाकर परमबीर सिंह के खिलाफ बोलेगा। यानी अर्नब कह सकता है कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में दिल्ली पुलिस ने ठीक से जांच नहीं की फलां सा हत्यारा है, फलाने को गिरप्तार करो, ढिमकाने के खिलाफ यह सबूत है आदि आदि।
मुंबई पुलिस उसके आदेश (या खबर के दबाव में कार्रवाई करे। खबर गलत हो तो कोई बात नहीं। लेकिन वैसे ही दूसरे मामले में अर्नब को गिरफ्तार कर ले तो बदनीयति। गजब का मामला है। ठीक है कि ये दलील है पर अर्नब को छोड़ दिया जाए क्योंकि वे पत्रकार हैं। पत्रकार रहते हुए गलत काम करें। पुलिस को सीख दें। और पुलिस उसी सीख को उनपर लागू कर दे (जो पहले की गलती भी हो सकती है) तो बदले की कार्रवाई हो जाएगी।


आम आदमी को यह सुविधा कहां मिलेगी। कहने के लिए कानून बराबर है। ठीक है कि जमानत नहीं मिली है। आम आदमी की ओर से यह बकवास कोई सुनेगा? लालू यादव की जमानत अर्जी पर आज सुनवाई नहीं हुई तो 20 दिन की तारीख पड़ी। दूसरे मामलो में ऐसे ही तारीख पड़ती है। अर्नब का मामला कल हाईकोर्ट में लगातार तीसरे दिन सुना जाएगा। पहले कई दिन सुना जा चुका है और सुप्रीम कोर्ट ने ही हाई कोर्ट भेजा था।


एक तरफ तो अर्नब को जमानत इतना जरूरी है। मामला कमजोर बताया जा रहा है। कल कहा गया था कि जमानत दे दी गई तो आसमान नहीं गिर जाएगा। तब जब एक व्यक्ति का पैसा नहीं दिया गया है और उसने आत्महत्या कर ली है। और दूसरी तरफ फर्जी मामले में लोग महीनों जेल में रहते हैं। वह अपनी जगह सच है ही। अदालत से जमानत मिलने के बावजूद भिन्न कारणों से छूट नहीं पाते हैं आदि आदि। और पत्रकारों की बात करें तो सही खबर करने वाले पकड़ कर बंद कर दिए गए हैं जमानत नहीं, जमानत की अपील पर सुनवाई नहीं।


दूसरी ओर, केरल के पत्रकार सिद्दीक कप्पन को तीन अन्य के साथ दिल्ली से हाथरस वाला मामला कवर करने जाते हुए गिरफ्तार किया गया था। उसे अभी तक जमानत नहीं मिली है। बाद में उनपर यूएपीए लगा दिया गया। फिर उन्हें हाथरस साजिश मामले में भी जोड़ दिया गया। वकीलों को उनसे मिलने नहीं दिया गया। इन पत्रकारों के परिवार को इनकी गिरफ्तारी की सूचना नहीं थी। केरल के पत्रकारों की यूनियन ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर मांग की है कि उनकी जमानत याचिका पर जल्दी सुनवाई की जाए। इसपर आज शुक्रवार छह नवंबर को सुनवाई होनी थी। अब 16 नवंबर की तारीख पड़ी है।

Facebook Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.