मानवाधिकार शब्द से चिढ़ने वाले अर्नब की गिरफ्तारी से दुःखी..

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-राकेश कायस्थ॥

अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर आज सुबह से पूरे देश में इतने आँसू बहें है कि डर है कहीं बाढ़ ना आ जाये। राष्ट्र बहुत चिंतित है ऐसे में कुछ तथ्य याद दिला देना फर्ज है।
अमित शाह के बेटे जय शाह कंपनी की आमदनी रातो-रात सोलह ह़ज़ार गुना बढ़ने की खबर छापने के बाद से वेबसाइट द वायर के साथ अब तक क्या हुआ है? द वायर ने खबर सरकारी वेबसाइट पर उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर छापी थी। सिर्फ तथ्य बताये थे, कोई इल्जाम नहीं लगाया था।
इसके बावजूद द वायर के खिलाफ ना जाने कितने शहरों में मामले दर्ज हुए। संपादक सिद्धार्थ वरदराजन के मुताबिक ` अमित शाह ने हमें भारत दर्शन करवा दिया।’ सबसे बड़े मुकदमें सौ करोड़ रुपये के हर्जाने की मांग की गई थी।

गौतम अडानी और सुभाष चंद्रा जैसे सरकार समर्थित उद्योगपतियों के खिलाफ ऐसे ही मानहानि के मुकदमे जीत चुका द वायर ने जय शाह के मामले में भी घुटने नहीं टेके हैं। वायर के खिलाफ थाना-पुलिस कोर्ट-कचहरी की ख़बरें आये दिन आती रहती हैं।

एनडीटीवी के स्टूडियो में संबित पात्रा की एंकर से गर्मागर्म बहस हुई। बात इतनी बढ़ी कि एंकर ने पात्रा को कार्यक्रम छोड़कर निकल जाने को कहा। इसके 48 घंटे के भीतर प्रणय राय के घर पर छापा पड़ गया।

ऐसे ही छापे राघव बहल और सुजीत नायर जैसे दर्जनों सम्मानित संपादक और संचालकों के घर और दफ्तरों पर पड़ चुके हैं। विनोद दुआ जैसे व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज करके उन्हें अलग-अलग राज्यों के चक्कर कटवाये गये। योगी राज में कितने पत्रकारों को शारीरिक तौर पर प्रताड़ित किया गया है, इसका कोई हिसाब नहीं है।

शायद ही कोई ऐसी स्वतंत्र आवाज़ होगी जिसे दबाने की कोशिश ना की गई हो। आवाज़ दबाने की यह व्यवस्था इतनी सख्त है कि सरकारी निर्देश पर बहुत से वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषकों को न्यूज चैनलों में गेस्ट बनाने तक पर बैन है। इनमें कई ऐसे लोग भी हैं, जिनके जीविकोपार्जन का ज़रिया ही न्यूज़ चैनलों से मिलने वाली फीस हुआ करता था।

मैं गौरी लंकेश जैसे कई लेखक/बुद्धिजीवियों की हत्या की बात नहीं कर रहा हूँ। सिर्फ उन पत्रकारों को टारगेट किये जाने की बात कर रहा हूँ, जिन्होंने इस देश में सूचना संप्रेषण के मामले में मानक गढ़े हैं।

आज जो लोग आत्महत्या के एक पुराने केस में अर्णब गोस्वामी के साथ हो रही पुलिस कार्रवाई को अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला बता रहे हैं, क्या आपने उन्हें कभी उपर की किसी भी घटना पर एक लाइन भी बोलते सुना है?

हर धंधे में एक तरह की भाईबंदी होती है। अगर थोक बाज़ार में ब्लैक मार्केटिंग करने वाले किसी आदमी पर कार्रवाई होती है, तो दस और व्यापारी उसके समर्थन में चिल्लाते हैं। यह मामला इतना ही भर है। अर्णब गोस्वामी किसी भी लिहाज से पत्रकार नहीं है, वे एक सुपारी किलर हैं। जिन्होंने उन्हें किराये पर रखा है, उनकी प्रतिक्रियाओं से यह बात साफ है।

महाराष्ट्र पुलिस पर अर्णब गोस्वामी के साथ बदसलूकी का इल्जाम है। अगर वास्तव में पिटाई हुई है तो यह एक निंदनीय बात है। इसकी ना सिर्फ जांच होनी चाहिए बल्कि दोषी पुलिस वालों के खिलाफ कार्रवाई भी होनी चाहिए क्योंकि यह मानवाधिकार हनन का मामला है।
वैसे यह भी याद दिलाना ज़रूरी है कि मानवाधिकार शब्द से उन्हीं लोगों को सबसे ज्यादा चिढ़ है, जो आज अर्णब गोस्वामी के लिए दुखी हैं।

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