अब कोई ऐरा-गैरा, नत्थू-खैरा नहीं खोल पाएगा टीवी चैनल, लेकिन कितनी कारगर होगी रोक?

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कैबिनेट ने अपलिंकिंग-डाउनलिंकिंग नीति में बदलाव को मंजूरी तो दे दी, लेकिन सवाल ये है कि क्या इन बदलावों से सरकार को अपने मकसद में कोई कामयाबी मिल पाएगी? बताया जा रहा है कि सरकार ने इन नए कदमों की घोषणा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के क्षेत्र में ‘गैर-जिम्मेदार’ कंपनियों के प्रवेश को रोकने के लिए किया है।

कड़े नियम: सरकार को मिल रही थीं मीडिया के दुरुपयोग की शिकायत

ऐसा मानना है कि नए दिशा निर्देशों के आने के बाद नया टीवी चैनल लांच करना पहले जैसा आसान नहीं रह जाएगा। शुक्रवार को आयोजित कैबिनेट में निजी टीवी चैनलों के अपलिंकिंग-डाउनलिंकिंग नीति में बदलाव से संबंधित सूचना-प्रसारण मंत्रालय के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई।

फिलहाल भारत में टीवी चैनलों के लिए दो गाइडलाइनें हैं। एक गाइडलाइन उन विदेशी चैनलों के लिए हैं जो देश के बाहर से अपलिंक कर भारत में कार्यक्रम दिखाते हैं। दूसरी, उन देसी चैनलों के लिए है जो देश से ही अपलिंक कर देश में ही कार्यक्रम दिखाते हैं। पहली गाइडलाइन 11 नवंबर 2005 को अधिसूचित हुई थी जबकि दूसरी को 2 दिसंबर 2005 को जारी किया गया था। आंकड़े गवाह हैं कि भारतीय आकाश में सैटेलाइट चैनलों का विस्तार इन्हीं दिशा-निर्देशों के आने के बाद हुआ। 31 अगस्त 2011 तक सूचना-प्रसारण मंत्रालय कुल 745 टीवी चैनलों को अनुमति दे चुका है, जिसमें से 366 ‘न्यूज एंड करंट अफेयर्स’ श्रेणी के हैं जबकि 379 ‘नॉन न्यूज’ श्रेणी के हैं।

दरअसल सरकार ने पाया कि टीवी चैनलों का लाइसेंस लेना बेहद आसान और सस्ता है इसलिए इस क्षेत्र में गैर गंभीर लोगों की बाढ़ आ गई थी। न्यूज़ एंड करेंट अफेयर्स कैटेगरी के चैनल कम लाभकारी होने के बावजूद नवोदित ब्रॉडकास्टरों की पहली पसंद बना हुआ था क्योंकि इसके दूसरे फायदे अधिक हैं। कई चिटफंडिए, अपराधी और बिल्डर सरकार पर दबाव बनाने और अपना ब्रैंड स्थापित करने के लिए न्यूज़ चैनलों के साथ बाजार में कूद पड़े। सरकार को लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि इन संस्थानों के पत्रकारों पर भी अपने मालिकों के उल्टे-सीधे कामों को करवाने या उनके हितों से जुड़ी खबरों को प्रसारित करने का सीध दबाव रहता है जिससे मीडिया की विश्वसनीयता भी घट रही थी।

सरकार के पास मीडिया का दुरुपयोग रोकने का कोई सीधा मैकेनिज्म नहीं होने के कारण लाइसेंस शर्तों को ही कड़ा करने का उपाय रह गया था। केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी का भी कहना है कि टीवी इंडस्ट्री खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पुराने दिशा निर्देशों का फायदा उठाकर कई लोग उचित उद्देश्य के बजाय ‘दूसरे उद्देश्यों’ की पूर्ति के लिए इस क्षेत्र में आ गए हैं, इसलिए नए नीति निर्देशों को लागू करने की जरूरत समझी गई ।

नए नियमों के तहत गैर न्यूज चैनलों की अपलिंकिंग और विदेशी चैनलों की डाउनलिंकिंग के लिए पूंजी की सीमा डेढ़ करोड़ से बढ़ाकर पांच करोड़ रुपये कर दी गई है। वहीं न्यूज चैनलों के लिए यह सीमा तीन करोड़ से बढ़ाकर 20 करोड़ रुपये तक कर दी गई है। टीवी चैनलों के उच्च प्रबंधन जैसे अध्यक्ष, प्रबंध निदेशक या मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) या मुख्य संचालन अधिकारी (सीओओ) या मुख्य वित्तीय अधिकारी (सीएफओ) को समाचार और गैर समाचार चैनलों की मीडिया कंपनी में कम से कम तीन साल का अनुभव होना चाहिए।

सभी टीवी चैनलों को अब अनुमति मिलने के एक साल के भीतर अपने चैनलों को संचालित करना पड़ेगा। वहीं परफॉर्मेंस बैंक गारंटी की राशि भी बढ़ा दी गई है। वहीं विदेशी चैनलों के लिए भी सख्त मानक बनाए गए हैं। सूचना-प्रसारण मंत्रालय ने इस नीति में संशोधन का प्रस्ताव दूरसंचार नियामक ट्राई के साथ सलाह कर तैयार किया है। इस संशोधन के बाद भारत में सिर्फ वही कंपनियां/संस्थाएं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रवेश कर सकेंगी जो इस क्षेत्र में काम करने के लिए गंभीर होंगी। नए नियमों में यह भी प्रावधान है कि अगर चैनल लगातार दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करते हैं तो उनका लाइसेंस निरस्त भी किया जा सकता है। तय नियमों के मुताबिक किसी भी चैनल को अधिकतम पांच बार ही नियम तोड़ने की छूट मिल पाएगी।

स्वीकृत संशोधन के मुताबिक ‘नॉन-न्यूज’ श्रेणी के तहत विदेशी चैनलों के अपलिंकिंग-डाउनलिंकिंग के लिए नेटवर्थ को भी 1.5 करोड़ से बढ़ाकर 5 करोड़ रुपए किया जा रहा है। यह आवेदक कंपनी के पहले चैनल पर लागू होगी। अतिरिक्त चैनलों में हर चैनल के लिए 2.5 करोड़ रुपए की नेटवर्थ होना जरूरी होगा। ‘न्यूज एंड करंट अफेयर्स’ श्रेणी के तहत पहले चैनल की अपलिंकिंग के लिए नेट-वर्थ 3 करोड़ से बढ़ाकर 20 करोड़ रुपए की जा रही है। अतिरिक्त चैनलों के लिए नेट-वर्थ 5 करोड़ रुपए प्रति चैनल होना जरूरी होगा। टेलीपोर्ट के लिए भी नेटवर्थ की शर्त को एक समान कर दिया गया है। अब चैनल की क्षमता के अनुसार कोई भेदभाव नहीं होगा। इसी के साथ टीवी चैनलों को अनुमति लेने के एक वर्ष के अंदर काम शुरू करना होगा।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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