बिहार में पाकिस्तान का शार्टकट अपनाता NDA..

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बिहार चुनाव में एनडीए सुशासन और विकास का दम भर कर फिर से सत्ता में आने का दावा कर रही है। लेकिन भीतर ही भीतर शायद उसका आत्मविश्वास दरक भी रहा है। इसलिए नीतीश कुमार अब अपने काम पर नहीं प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर वोट मांगते हैं और खुद मोदीजी अपने विकास की सूची गिनाने की जगह लोगों को डरा रहे हैं। नीतीश कुमार तो राजद के 15 सालों की खामियां गिनाते ही थे, पिछली कुछ रैलियों से प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों को जंगलराज का डर दिखाना शुरु कर दिया है।

तेजस्वी यादव का नाम लिए बिना उन्होंने उन्हें जंगलराज का युवराज कह दिया। और लोगों को डराया कि अगर ये सत्ता में आ गए तो अपराध बढ़ जाएंगे। जबकि एनसीआरबी के ही आंकड़े बताते हैं कि राजद के शासनकाल में जितने अपराध आए, उनमें जदयू-भाजपा की सरकार आने पर कोई कमी नहीं आई, बल्कि बढ़ोतरी ही हुई। मुजफ्फरपुर बालिका गृहकांड की आरोपी मंजू वर्मा को नीतीश कुमार ने फिर उम्मीदवार बनाया है, और उसी मुजफ्फरपुर के मोतीपुर में मोदीजी लोगों को जंगलराज की दहशत याद दिला रहे थे। क्या उनकी नजर में बालिकागृह की लड़कियों पर जो जुल्म ढाए गए, वे अपराध नहीं थे।

खैर.. जंगलराज के शोर के बाद भी जब तेजस्वी यादव की सभाओं में भीड़ उमड़ना बरकरार रहा तो अब मोदीजी युवराज, टुकड़े-टुकड़े गैंग वाले पुराने जुमलों पर आ गए हैं। अब उन्होंने नीतीश सरकार की डबल इंजन सरकार बनाम डबल-डबल युवराज की बात उठाई है। छपरा में उन्होंने कहा कि डबल-डबल युवराज अपने-अपने सिंहासन को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। 3-4 साल पहले यूपी के चुनाव में भी डबल-डबल युवराज काली जैकेट पहनकर बस के ऊपर चढ़कर लोगों के सामने हाथ हिला रहे थे।

यूपी की जनता उन्हें पहचान गई थी और उन्हें घर लौटा दिया था। वहां के एक युवराज अब जंगलराज के युवराज से मिल गए हैं। यूपी में जो डबल-डबल युवराज का हुआ, वो ही बिहार में होगा। वहीं मोतिहारी में उन्होंने कहा कि जंगलराज वालों ने अगर कभी आपकी चिंता की होती तो बिहार विकास की दौड़ में इतना पिछड़ता नहीं। अब तो इस चुनाव में जंगलराज वालों के साथ देश के टुकड़े-टुकड़े करने की चाहत रखने वालों के समर्थक भी शामिल हो गए हैं। इस तरह राहुल गांधी, तेजस्वी यादव और कन्हैया कुमार तीनों युवा नेताओं की मौजूदगी से उत्पन्न अपनी बौखलाहट को मोदीजी ने जाहिर कर दिया। रोचक बात ये है कि टुकड़े-टुकड़े गैंग के बारे में केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने इसी साल आरटीआई के तहत जवाब दिया है कि उसके पास ऐसी कोई जानकारी नहीं है, जिसके तहत टुकड़े-टुकड़े गैंग की परिभाषा दी जा सके। लेकिन भाजपा के लोग अब भी इस शब्द का इस्तेमाल धड़ल्ले से करते हैं। मोदीजी ने गैंग भले न कहा हो, लेकिन टुकड़े-टुकड़े करने वालों का जिक्र जरूर किया। 

हालांकि वे भी इस बात को सबूतों के साथ नहीं बता पाएंगे कि आखिर किन लोगों ने देश के टुकड़े करने की चाह पाली है। बस अपने विरोधियों को मात देने के लिए एक गलतफहमी चला दी गई और अब देश के प्रधानमंत्री भी उसे बढ़ावा देने में लगे हैं। इस तरह की राजनीति देश को किस तरह का विकास देगी, ये भी मोदीजी को बता देना चाहिए। वैसे बिहार में जीत हासिल करने के लिए मोदीजी कुछ पुराने पैंतरों पर भी उतर आए हैं, जैसे राष्ट्रवाद, आतंकवाद और पाकिस्तान। इस बार तो संयोग से पाकिस्तान से ही उन्हें मौका मिल गया। दरअसल पाकिस्तान की संसद में अपने प्रधानमंत्री इमरान खान को मजबूत बताने के लिए तर्क पेश करते-करते केन्द्रीय मंत्री फवाद चौधरी का अपनी जुबान पर संयम नहीं रहा और वे फरवरी 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में हुई आतंकी घटना का सेहरा इमरान खान के सिर बांध गए।

भारत में घर में घुसकर मारेंगें वाला डायलाग काफी चर्चित हुआ है और अब पाकिस्तान में इसका इस्तेमाल करने की कोशिश की गई। ये दांव शायद इमरान सरकार पर उल्टा पड़ेगा, क्योंकि वैश्विक स्तर पर आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान की छवि पहले ही खराब है। फवाद चौधरी ने बाद में सफाई भी दे दी कि उनके बयान का गलत मतलब निकाला गया, वे 14 फरवरी नहीं, 26 फरवरी की बात कर रहे थे।

लेकिन मोदी सरकार और उसके गोदी पत्रकारों ने इस मुद्दे को लपकने में जरा देर नहीं की। कई चैनलों पर पाकिस्तान का बेड़ा गर्क, पापियों की मौत मरेगा पाकिस्तान जैसे कार्यक्रम चल पड़े। मोदी जी के उत्साही मंत्री और सोशल मीडिया आर्मी उन विपक्षी नेताओं के बयान खंगालने लग गई, जिन्होंने पुलवामा पर सरकार से जवाब मांगा था। मोदीजी ने भी गुजरात के केवड़िया में राष्ट्रीय एकता दिवस के मौके पर पूरे नाटकीय अंदाज में विपक्ष को कोसा, उन्होंने कहा कि देश कभी भूल नहीं सकता कि जब अपने वीर बेटों के जाने से पूरा देश दुखी था, तब कुछ लोग उस दुख में शामिल नहीं थे। वो पुलवामा हमले में भी अपना राजनीतिक स्वार्थ खोज रहे थे।.. मेरे दिल पर वीर शहीदों का गहरा घाव था। पाकिस्तान की संसद में जो सत्य स्वीकारा गया है, उसने इन लोगों के असली चेहरे को देश के सामने ला दिया है। पता नहीं मोदीजी को किस आत्मज्ञान के तहत ये पता चल गया कि पुलवामा की घटना पर जो लोग सरकार से सवाल पूछ रहे थे, वे जवानों की शहादत से दुखी नहीं थे।

बल्कि उनके दुख पर तो कोई शंका ही नहीं होनी चाहिए, क्योंकि वे उन कारणों को जानना चाह रहे हैं जिस वजह से पुलवामा जैसी घटना हुई। कई किलो आरडीएक्स से भरी गाड़ी संवेदनशील रास्ते पर सुरक्षा बल के जवानों की बस से टकरा जाती है। तो सवाल उठने लाजिमी हैं कि आखिर सुरक्षा व्यवस्था में, खुफिया जानकारी एकत्र करने में इतनी बड़ी चूक कैसे हुई। सरकार ने इन सवालों के जवाब तो नहीं दिए, उल्टे अब मोदीजी ये साबित करने में लगे हैं कि पुलवामा से कुछ लोग दुखी नहीं थे। इस तरह वे बिहार में पाकिस्तान के शार्टकट से सत्ता हासिल करना चाहते हैं। लेकिन देश याद रखे कि शार्टकट अपनाने से गलत मंजिल मिलने का डर रहता है।

(देशबन्धु)

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