गांधी-नेहरू को बदनाम करने उनके विरोधियों के पास अब कंगना ही बची..

गांधी-नेहरू को बदनाम करने उनके विरोधियों के पास अब कंगना ही बची..

Page Visited: 392
0 0
Read Time:7 Minute, 44 Second

-सुनील कुमार।।

एक वक्त हिन्दुस्तान की जनता में राजनीतिक चेतना का यह हाल था कि क्यूबा से चे गुएरा का भारत आना हुआ था, और गांवों में किसानों के बीच जाना हुआ था, तो लोगों को क्यूबा का महत्व मालूम था। उसके भी और पहले आजादी के पहले से खान अब्दुल गफ्फार खान को भारत में गांधी के दोस्त होने के नाते जो इज्जत मिली, वह दुनिया के इतिहास में कम ही लोगों को मिलती है, और इसी इज्जत के तहत उन्हें सीमांत गांधी का नाम दिया गया। हिन्दुस्तान ने ऐसा दौर देखा है जब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू दुनिया के सभी बड़े मुद्दों पर अपनी राय रखते थे, और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के हितों से परे भी उनका दखल रहता था। जहां भारत का कोई लेना-देना नहीं रहता था, वहां भी विश्वकल्याण के लिए, विश्वशांति के लिए नेहरू खुलकर बोलते थे, खुलकर लिखते थे, और दुनिया के बारे में उनकी सोच किताबों की शक्ल में दर्ज है जो कि समकालीन इतिहास की अहमियत रखने वाली किताबें मानी जाती हैं। वह वक्त था जब नेहरू हिन्दुस्तान के तमाम मुख्यमंत्रियों को चि_ी लिखते थे और देश और दुनिया के मामलात पर उन्हें अपनी राय बताते थे।

आज हिन्दुस्तान कंगना रनौत से जान और समझ रहा है कि गांधी ने क्या गलतियां की थीं, और किस तरह नेहरू प्रधानमंत्री बनने के लायक नहीं थे। यह हैरानी की बात है कि गांधी को मारने वालों से लेकर आज नेहरू के खिलाफ झूठ फैलाकर नफरत पैदा करने वाले लोगों तक के बीच बहुत से लोगों के पढ़े-लिखे होने का भी दावा किया जाता था। ऐसे में एक फिल्म अभिनेत्री जिसकी तमाम शिक्षा-दीक्षा नफरत और साम्प्रदायिकता की हुई दिखती है, उसको नेहरू और गांधी को निपटाने के लिए तैनात कर दिया गया है! क्या नेहरू और गांधी से नफरत करने वाले लोग, उनकी स्मृतियों की हत्या करने में लगे लोग कंगना से अधिक गंभीर कोई और आलोचक नहीं ढूंढ पाए? यह सवाल छोटा इसलिए नहीं है कि कल के दिन इस देश की अर्थव्यवस्था के गंभीर विश्लेषण करने का जिम्मा कॉमेडियन कपिल शर्मा पर आ जाए, इस देश की संस्कृति-नीति को तय करने का जिम्मा शक्ति कपूर पर आ जाए, तो क्या वह राजनीतिक और सामाजिक नेतागिरी में आधी-आधी सदी गुजार चुके लोगों का दीवाला निकल जाना नहीं होगा?

आज सोशल मीडिया की मेहरबानी से चर्चित और नामी या बदनाम किसी भी किस्म के लोग अपनी अच्छी और बुरी बातों से दसियों लाख लोगों तक पहुंच जाते हैं। ऐसे लोगों में अमिताभ बच्चन जैसे लोग भी हैं जो कि अपनी बेमिसाल लोकप्रियता के बावजूद जलते हुए हिन्दुस्तान के बीच अपने पिता की कोई कविता पोस्ट करते हुए पूरी चौथाई सदी गुजार सकते हैं, और किसी आत्मग्लानि में भी नहीं पड़ते। कुछ लोग सोनू सूद सरीखे हैं जो कि सोशल मीडिया को समाज सेवा की जगह बनाकर चल रहे हैं, और रात-दिन लोगों की मदद जाने कहां से करते चले जा रहे हैं। बहुत से लोग देश की साम्प्रदायिक हिंसा, देश में बढ़ती असहिष्णुता, देश में बेइंसाफी के खिलाफ खुलकर लिखने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। वहीं धूमकेतु की तरह पिछले कुछ महीनों में महाराष्ट्र और फिर देश की राजनीति में वन वूमैन आर्मी की तरह उतरी हुई कंगना रनौत अब गांधी की गलतियां गिना रही हैं।

देश की राजनीतिक ताकतों, और देश के विख्यात सांस्कृतिक संगठनों में पूरी जिंदगी गुजारने वाले लोग क्या पूरी तरह दीवालिया हो चुके हैं कि उन्हें विवादों पर जिंदा रहने वाली एक बकवासी और खालिस हिंसक अभिनेत्री की जरूरत हिन्दुस्तान की आजादी की लड़ाई और आजाद हिन्दुस्तान की व्याख्या करने के लिए पड़ रही है? गांधी को कोसना, नेहरू को गालियां देना जिनका पसंदीदा शगल है, उन्हें कम से कम अपनी इज्जत का तो ख्याल रखना चाहिए कि अगर उनके यह काम भी कंगना कर लेगी, तो वे क्या करेंगे? सिर्फ नफरती जहर को फैलाकर अगर किसी विचारधारा को इतिहास में इज्जत मिलने वाली है, तब तो उसे इस देश में कंगनाओं को शहीद का दर्जा भी दे देना चाहिए, जो कि आज उनके हाथ में हैं।

टीवी के स्टूडियो में बैठकर दूसरे लोगों की जान ले लेने की हद तक नफरत और हिंसा जो लोग फैला रहे हैं, उनकी नौकरी खतरे में दिख रही है। अगर कंगनाएं उनकी जगह बिठा दी गईं, तो आज के नफरतियों के मुकाबले उनके दर्शक अधिक होंगे, वे अधिक हिंसक बातों को अधिक दर्शनीय मौजूदगी के साथ सामने रख सकेंगी, और नेहरू-गांधी की क्या औकात कि वे अपनी इज्जत बचा सकें। खैर, यह देश इतिहास के एक दिलचस्प मोड़ पर आ खड़ा हुआ है जहां इस देश के इतिहास की सबसे बड़े नायकों की चरित्र-हत्या, उन्हें घटिया और बेवकूफ साबित करने का जिम्मा अब ऐसे नाजुक कंधों पर आ टिका है, और गांधी-नेहरू के तमाम वैचारिक विरोधी आज बेअसर साबित किए जा रहे हैं। अब इस देश की जनता को भी सोचना है कि जिसके नजरिए को एक दिन गांधी और नेहरू ने बड़ी मेहनत और ईमानदारी से वैश्विक बनाया था, आज उसे कहां ले जाकर पटका गया है। गांधी के संपादित किए गए अखबारों के पुराने अंक देखें, तो देश के किसी गांव के सरपंच का पोस्टकार्ड पर पूछा सवाल मिलता है जिसमें वह फिलीस्तीन और इजराईल के तनाव को समझना चाहता है, और उसके सवाल के साथ गांधी खुलासे से इस अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर अपनी सोच लिखते थे। आज इस देश की जनता को चकाचौंधी सनसनी के नशे में उतारकर पूरी तरह गैरजिम्मेदार बना दिया गया है।

Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleepy
Sleepy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %
Facebook Comments

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this:
Visit Us On TwitterVisit Us On FacebookVisit Us On YoutubeVisit Us On LinkedinCheck Our FeedVisit Us On Instagram