बेकसूर का गला काटने, बदनीयत के हाथ उस्तरा!

बेकसूर का गला काटने, बदनीयत के हाथ उस्तरा!

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-सुनील कुमार।।

हिन्दुस्तान में बढ़ती हुई राजनीतिक कटुता के चलते हुए अलग-अलग पार्टियों के राज वाले प्रदेशों में अलग-अलग विचारधाराओं को लेकर, अलग-अलग लोगों को लेकर जिस तरह एफआईआर हो रही है, उस पर सुप्रीम कोर्ट को सोचने की जरूरत है। अनगिनत मामलों में राज्यों की हाईकोर्ट एफआईआर को कहीं खारिज कर रही हैं, कहीं उन पर रोक लगा रही हैं, लेकिन यह काफी नहीं है। किसी मामले में एफआईआर करना है, या नहीं करना है, इसके बीच का फासला उस प्रदेश या उस शहर की राजनीतिक ताकतों के हाथ में रहता है। मामला अगर राजनीति और नेताओं से जुड़ा हुआ नहीं है, और किसी नेता या सत्ता की उसमें दिलचस्पी नहीं है, तो पुलिस अपने स्तर पर आमतौर पर उसमें कमाई की गुंजाइश देखती है। जब इनमें से कोई भी बात नहीं रहती, तब जाकर कोई-कोई एफआईआर सच्ची वजहों से भी दर्ज हो जाती है। हालांकि ऐसी नौबत कम आती है क्योंकि आमतौर पर पुलिस निचुड़े हुए गन्ने जैसी हालत में पहुंचे लोगों का भी रस निकालने की काबिलीयत रखती है।

अब सुप्रीम कोर्ट को यह सोचना चाहिए कि एफआईआर दर्ज हो या न हो, इसमें अगर विवेक से तय करने का हाथी सरीखा विशाल और विकराल हक अगर राजनीति, सत्ता, और पुलिस के हाथ दिया जाता है, तो बेकसूरों कापिस जाना आम से भी आम बात होना तय ही है। जिसे नेता, सत्ता, और रिश्वत लेने के लिए पुलिस, इनकी मेहरबानी, और सरपरस्ती हासिल हो, उसके खिलाफ एफआईआर के लिए लोगों को अदालत तक जाना पड़ता है, और अदालतों में फिर सत्ता, नेता, और रिश्वत की ताकत से लड़ते हुए एफआईआर हो सकती है। इसके बाद भी सिलसिला थमता नहीं है, कल ही सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के एक आदेश पर रोक लगा दी है जिसमें हाईकोर्ट ने उत्तराखंड सीएम के खिलाफ एफआईआर करने, और जांच करने का हुक्म सीबीआई को दिया था। अब पल भर को यह सोचने की जरूरत है कि जहां हाईकोर्ट एफआईआर दर्ज करने का हुक्म दे रहा है, वहां पर सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के हुक्म को गलत पा रहा है, उसकी आलोचना कर रहा है। यहां पर अभी इसी हफ्ते ही सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट द्वारा यूपी पुलिस को लगाई गई फटकार पर भी गौर करने की जरूरत है जिसमें अदालत ने कहा है कि आईटी एक्ट की जिस धारा को सुप्रीम कोर्ट पिछले बरस असंवैधानिक करार दे चुका है, उस धारा के तहत यूपी पुलिस अब तक एफआईआर दर्ज कर रही है, जुर्म कायम कर रही है।

कुल मिलाकर नौबत यह है कि राज्यों की राजनीतिक ताकतों, या रिश्वतखोर पुलिस-अफसरों की जिसके खिलाफ मर्जी हो, उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज होने से कोई रोक नहीं सकते। एफआईआर के बाद आगे की कार्रवाई में पुलिस तब तक ईश्वर जैसी ताकत रखती है जब तक कोई अदालती दखल न हो। और इसी ईश्वरीय ताकत का इस्तेमाल वे राजनीतिक ताकतें करती हैं जो पुलिस की ताकतवर कुर्सियों पर पसंदीदा या भुगतानशुदा लोगों को बिठाती हैं। ऐसे में किसी बेकसूर की गुंजाइश कहां बचती है? इसकी एक सबसे जलती-सुलगती मिसाल पिछली भाजपा सरकार के दौरान छत्तीसगढ़ के आईजी कल्लुरी के स्वायत्तशासी बस्तर में सामने आई थी। देश के कुछ प्रमुख प्राध्यापकों, और छत्तीसगढ़ के ईमानदार और संघर्षशील वामपंथी नेताओं के खिलाफ हत्या के लिए उकसाने का जुर्म कायम कर दिया गया था जिसे अभी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा खारिज करके नाजायज करार दिया गया, और नंदिनी सुंदर, अर्चना प्रसाद, संजय पराते, इन तमाम लोगों को मुआवजा भी दिलवाया गया है। लेकिन क्या एफआईआर करने और करवाने वाले पुलिस अफसरों पर कुछ हुआ? कुछ भी नहीं। इस देश में हर दिन दसियों हजार बेईमान और नाजायज एफआईआर होती हैं, जिनमें से सैकड़ों आगे जाकर किसी न किसी अदालत में गलत साबित होती हैं, लेकिन एफआईआर करने वाले भ्रष्ट या बदनीयत, या दोनों, अफसरों पर भूले-भटके ही कोई कार्रवाई हो पाती है। यह सिलसिला लोकतंत्र के हिसाब से बहुत ही भयानक है क्योंकि हिन्दुस्तान में पुलिस को आज भी अंग्रेजीराज की तरह के मनमाने हक हासिल हैं जिनके सामने किसी गरीब या कमजोर, या सत्ता का नापसंद इंसान के बचने की कोई गुंजाइश नहीं रहती है।

मोदी सरकार ने पिछले बरसों में देश के ऐसे हजार-दो हजार कानूनों को खारिज किया है जो एक-डेढ़ सदी पहले किसी तानाशाह मकसद से बनाए गए थे, जो मनमाने और अलोकतांत्रिक थे, और जो अब किसी काम के नहीं रह गए थे, या लोकतंत्र विरोधी साबित हो रहे थे। लेकिन भारत की न्यायव्यवस्था का सिलसिला जिस पुलिस थाने से शुरू होता है, वहां थानेदार की कुर्सी को अब तक एक अंग्रेज बहादुर की कुर्सी जैसी ताकत हासिल है, एफआईआर के मामले में। यह थोड़ी सी हैरानी की बात है कि सुप्रीम कोर्ट के सामने पुलिस, या दूसरी जांच एजेंसियों के एफआईआर करने के मनमाने अधिकारों के खिलाफ कोई मामला क्यों नहीं चल रहा है। आज देश भर में किसी प्रदेश में पत्रकारों के खिलाफ, किसी प्रदेश में सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ, किसी प्रदेश में राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का अंतहीन सिलसिला चला हुआ है। और तो और जो हिन्दुस्तान आज फ्रांस में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत करते हुए खड़ा है, अपने देश में दुनिया की सबसे अधिक मुस्लिम आबादी की हकीकत के बाद भी फ्रांस के साथ खड़ा है, उस देश में खुद केन्द्र सरकार चला रही पार्टी की राज्य सरकारों में जगह-जगह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ पुलिस रिपोर्ट दर्ज हो रही है। फ्रांस में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत, और अपने देश में अपनी सत्ता के प्रदेशों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को जेल! लेकिन यह महज भाजपा की सोच नहीं है, अभी कल ही सुप्रीम कोर्ट ने एक प्रदेश की मालकिन ममता बैनर्जी को हडक़ाया है कि वहां लोकतंत्र कायम रहने दें। मामला सोशल मीडिया पोस्ट पर ममता बैनर्जी की आलोचना करने पर दर्ज एफआईआर का था। सोशल मीडिया पर दिल्ली के एक महिला ने बंगाल सरकार की आलोचना की थी, तो इस पर बंगाल पुलिस ने एफआईआर दर्ज करके उसे पूछताछ के लिए कोलकाता बुलवाया था। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल सरकार को जमकर फटकार लगाई और कहा कि उसे दिल्ली से कोलकाता बुलवाना उस पर जुल्म के अलावा कुछ नहीं है, कल चार अलग-अलग राज्यों से पुलिस किसी को कुछ लिखने पर बुलावा भेजेगी, और उसका एक ही संदेश होगा, कि अगर तुम कुछ लिखोगे तो हम तुम्हें सबक सिखाएंगे।

लेकिन ममता बैनर्जी की बर्दाश्त की कमी, और पुलिस के बेजा इस्तेमाल का यह अकेला मामला नहीं था, ऐसे कई मामले पहले भी दर्ज हुए हैं, और कम से कम एक मामले में तो जाधवपुर विश्वविद्यालय के एक प्राध्यापक के खिलाफ एफआईआर करके उसे गिरफ्तार भी किया गया।

सुप्रीम कोर्ट को जनता के सबसे कमजोर तबके के हक के लिए एफआईआर की मनमानी, गिरफ्तारी की मनमानी के साथ जोडक़र यह भी देखना चाहिए कि निचली अदालतें अपने भ्रष्टाचार के लिए कितनी बदनाम हैं, और उन अदालतों के पास भी नाजायज एफआईआर, नाजायज गिरफ्तारी के मामलों में जमानत न देने का कितना भयानक विवेकाधिकार है, मनमर्जी है। सुप्रीम कोर्ट को यह भी देखना चाहिए कि पुलिस की एफआईआर आगे जाकर अगर नाजायज साबित होती है तो ऐसे अफसरों पर क्या कार्रवाई होती है, अगर कोई कार्रवाई होती है तो। सुप्रीम कोर्ट यह भी देखना चाहिए कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जाकर नाजायज एफआईआर और गिरफ्तारी के जो मामले खारिज होते हैं, उनमें राज्य सरकारें अपने जवाबदेह-जिम्मेदार पुलिस अफसरों पर कोई कार्रवाई करती हैं या नहीं? इसके लिए एक बहुत आत्मनिर्भर मैकेनिज्म विकसित करने की जरूरत है कि फर्जीवाड़े के जिम्मेदार पुलिस अफसरों के खिलाफ कार्रवाई ठीक उसी तरह हो जिस तरह हर हिरासत मौत के बाद मजिस्टीरियल जांच होती ही होती है, किसी नवविवाहिता के शादी के सात बरस के भीतर अस्वाभाविक मौत होने पर उसकी जांच होती ही होती है। कुछ ऐसा ही एफआईआर की मनमानी को लेकर भी करने की जरूरत है।

आज जब समाज के खास और आम, सभी किस्म के लोग सोशल मीडिया पर अपने मन की (असली) बात लिखने लगे हैं, और ताकतवर लोगों का बर्दाश्त खत्म हो चुका है, तो ऐसे में राजनीतिक दबावतले काम करने वाली अमूमन भ्रष्ट पुलिस के हाथ एफआईआर जैसा अंधाधुंध ताकत वाला हथियार कैसे दिया जा सकता है?

थोड़ी सी हैरानी की बात यह है कि अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग पार्टियों के लोग वहां की सत्ता की नाराजगी का ऐसा हमला झेल रहे हैं, लेकिन किसी पार्टी ने एफआईआर के सिलसिले को चुनौती देने का काम न संसद के भीतर किया, न ही सुप्रीम कोर्ट जाकर किया। चूंकि देश के सामाजिक कार्यकर्ता और मीडिया के लोग बड़े पैमाने पर ऐसी मनमानी के शिकार हैं, इसलिए कम से कम इस तबके के कुछ लोगों को एक जनहित याचिका लेकर सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए, और एफआईआर की जवाबदेही, और उसके अधिकार सीमित करने की मांग करनी चाहिए।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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