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दांव पर भारत की विदेश नीति

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भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और गुटनिरपेक्षता जैसी पहल के कारण दुनिया में शांतिदूत के तौर पर पहचान रखता था, लेकिन 70 सालों से बनी भारत की छवि में आमूलचूल बदलाव लाने के लिए प्रतिबद्ध मोदी सरकार अब वैश्विक मानचित्र पर भारत की पहचान शांतिदूत की नहीं, अमरीकी दूत के तौर पर बनाती दिख रही है।

पिछले छह सालों में बराक से लेकर डोनाल्ड तक के गले लगकर हमारे प्रधानमंत्री गदगद हैं। अब अमेरिका और भारत के संबंध राजनयिक, कूटनीतिक जैसी औपचारिक शब्दावली तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अब लंगोटिया यारों जैसा संबंध वहां के राष्ट्रपतियों से मोदीजी का बन रहा है, जिसमें वे नाम लेकर बुलाना, हंसी-ठिठोली करना सबकी छूट ले सकते हैं। इस तथाकथित गहरी दोस्ती के बदले भारत को कभी-कभार कुछ खरी-खोटी अमेरिका सुना दे, तो मोदीजी दोस्त की बात का शायद बुरा नहीं मानते हैं। इसलिए चाहे भारत से धमकी भरे अंदाज में दवाई मंगाना हो या फिर उसकी हवा को गंदी बताना हो, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की इन बातों को नरेन्द्र मोदी ने बिल्कुल दिल पर नहीं लिया।

बल्कि अभी मोदी सरकार खुशी से फूली नहीं समा रही है कि उसने 2 प्लस 2 जैसे लुभावने नाम के अंतर्गत अमेरिका से बेका समझौता कर लिया। 2 प्लस 2 सुनने में बिल्कुल बराबरी वाला हिसाब लगता है, लेकिन इस समझौते के बाद कितनी बराबरी रहेगी, ये आने वाला समय बताएगा। बेका यानी बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट अमेरिका और भारत के बीच हाल ही में हुआ है।

भारत की तरफ से विदेश मंत्री एस. जयशंकर और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जबकि अमेरिका की तरफ से विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो और रक्षा मंत्री मार्क एस्पर के बीच हुई बैठक में इस पर हस्ताक्षर किए गए। बेका समझौते के तहत दोनों देश एक-दूसरे के साथ अत्याधुनिक सैन्य प्रौद्योगिकी,  साजो-सामान और भू-स्थानिक मानचित्र साझा करेंगे। ‘बेका’ भारत और अमेरिका के बीच होने वाले चार मूलभूत समझौतों में से आखिरी है। इससे दोनों देशों के बीच लॉजिस्टिक्स और सैन्य सहयोग को बढ़ावा मिलेगा। पहला समझौता 2002 में किया गया था जो सैन्य सूचना की सुरक्षा को लेकर था, इसके बाद दो समझौते 2016 और 2018 में हुए जो लॉजिस्टिक्स और सुरक्षित संचार से जुड़े थे।

ताजाा समझौता भारत और अमेरिका के बीच भू-स्थानिक सहयोग है। इसमें क्षेत्रीय सुरक्षा में सहयोग करना, रक्षा सूचना साझा करना, सैन्य बातचीत और रक्षा व्यापार के समझौते शामिल हैं। इस समझौते से प्रत्यक्षत: तो यही समझ आ रहा है कि दो मित्रों के बीच अब उन सूचनाओं का आदान-प्रदान होगा, जो अमूमन गोपनीय होती हैं, और हर किसी के सामने प्रकट नहीं की जातीं। लेकिन इस समझौते में छिपी हुई बात ये लग रही है कि अब भारत की रक्षा और सैन्य से जुड़ी अधिकतर बातों की न केवल अमेरिका को जानकारी होगी, बल्कि उन पर उसकी दखलंदाजी भी बढ़ जाएगी।

आसान शब्दों में कहें तो भारत की विदेश नीति रक्षा सौदों के जरिए अमेरिकी इशारों पर संचालित होने का डर रहेगा। इसका ताजा उदाहरण इसी बैठक में देखने मिला, जब अमेरिकी मंत्रियों के भाषण में खुलकर गलवान का जिक्र  हुआ, लेकिन भारत के दोनों मंत्री चीन का नाम लेने से बचते रहे। 

अमेरिका लगातार ये बात कह चुका है कि चीन के साथ पनपे विवाद में वह भारत की मदद कर सकता है। भारत और चीन के बीच अभी तनाव काफी बढ़ा हुआ है। दोनों देशों की सेनाएं लगातार आमने-सामने हैं, फिर भी देश के प्रधानमंत्री अब तक इस मसले पर चीन को सीधे-सीधे नाम लेकर कुछ कह नहीं सके हैं। वे सैनिकों की वीरता के बारे में काफी कुछ कहते हैं, लेकिन देश को साफ-साफ नहीं बताते कि एलएसी पर इस वक्त वास्तविक हालात क्या हैं, चीन ने हमारी कितनी जमीन पर कब्जा किया हुआ है। अभी कुछ दिनों पहले भाजपा के एक वरिष्ठ नेता से लेकर एनएसए तक के ऐसे बयान सामने आए, जिनमें चीन या पाकिस्तान से युद्ध का जिक्र है। अपने दो पड़ोसी देशों के साथ इतने तनावपूर्ण संबंध किसी भी नजरिए से ठीक नहीं हैं। लेकिन इन संबंधों पर कोई भी फैसला द्विपक्षीय ही होना चाहिए, किसी तीसरे के दखल की इसमें कोई गुंजाइश नहीं है। अगर ऐसा होता है तो फिर भारत की स्वतंत्र विदेश नीति प्रभावित होगी। लेकिन अमेरिका इस वक्त ऐसी ही दखलंदाजी की कोशिश कर रहा है। 

बेका समझौते के बाद बेशक हमें अमेरिका से सामरिक-तकनीकी सहयोग मिलेगा, लेकिन उस सहयोग के बदले अमेरिका हमसे क्या कीमत चाहेगा, ये अनुमान भी भारत को लगा लेना चाहिए। चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करने के लिए अमेरिका कई तरह से कोशिशें कर रहा है। और उसमें आने वाले समय में इस सहयोग के बदले वह भारत को मोहरे की तरह इस्तेमाल कर सकता है। अभी श्रीलंका में अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने चीन की कम्युनिस्ट सरकार को हिंसक जानवर कहा, जिस पर श्रीलंका ने तुरंत सफाई पेश कर दी कि श्रीलंका हमेशा से अपनी विदेश नीति में तटस्थ रु$ख रखता आया है और हम ताक़तवर देशों के टकराव में नहीं उलझेंगे। भारत को भी अपनी विदेश नीति तटस्थ, स्वतंत्र और दबावमुक्त रखने के लिए तात्कालिक लाभों की जगह दूरदृष्टि के साथ विचार करना चाहिए। अन्यथा इस दुनिया में ऐसे देशों की कमी नहीं, जो अमेरिका का पिठ्ठू बनकर बाद में अपने अस्तित्व की तलाश ही करते रह गए।

(देशबंधु)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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