वोटरों को लुभाने का सिलसिला पहुंच गया अब जुर्म की हद तक..

वोटरों को लुभाने का सिलसिला पहुंच गया अब जुर्म की हद तक..

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-सुनील कुमार।।

दो दिन पहले छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में दुर्गा विसर्जन के हंगामे को रोकती पुलिस पर पथराव हुआ, थाना घेरा गया, और पुलिस ने लोगों को लाठियों से खदेड़ा। प्रतिमाओं वाली गाडिय़ां खड़ी रह गईं, और देश के सबसे कुख्यात साम्प्रदायिक मीडिया ने इस घटना को इस तरह पेश किया कि थाने में तैनात एक मुस्लिम अफसर ने दुर्गा विसर्जन पर लाठियां चलवाईं। बिहार के मुंगेर में और दो-तीन दिन पहले विसर्जन की बेकाबू भीड़ पर पुलिस को गोलियां चलानी पड़ीं जिनमें एक मौत हुई, और शायद आधा दर्जन लोग जख्मी हुए। यह सब हंगामा उस वक्त हो रहा है जब देश के अधिकतर हिस्से में मंदिरों पर भी लॉकडाऊन के कम से कम कुछ नियम तो लागू किए ही गए हैं, कम से कम कागजों पर तो लागू किए ही गए हैं। ऐसे में महाराष्ट्र में राज्य सरकार ने यह समझदारी दिखाई कि कोई धर्मस्थल नहीं खोलने दिए जिसे लेकर वहां के राज्यपाल ने शिवसेना के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को धर्मनिरपेक्ष जैसी गंदी गाली भी दे दी। लेकिन उद्धव ठाकरे अपने फैसले पर अड़े रहे, और धर्मस्थल नहीं खोले गए।

आज कोरोना के खतरे के बीच जब देश को यह समझने की जरूरत है कि कोरोना की वजह से देश पर लादे गए लॉकडाऊन से करोड़ों लोगों के बेरोजगारी से मरने की नौबत आ गई है, और इस नौबत को दूर करने कोई ईश्वर सामने नहीं आए, तो आज जरूरत कोरोना के खतरे को घटाने की है, खत्म करने की है, ताकि लोगों का चूल्हा जल सके। लेकिन हिन्दुस्तान के लोग हैं कि ईश्वर के प्रसाद का चूल्हा पहले जलवाना चाहते हैं, चाहे फिर धार्मिक भीड़ से कोरोना और क्यों न फैल जाए, देश और बड़े आर्थिक संकट में क्यों न डूब जाए।

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर ही नहीं, बाकी शहरों में भी जिस तरह डीजे और धुमाल पार्टियों के हंगामे के साथ बिना मास्क धक्का-मुक्की करते गैरजिम्मेदार लोगों की भीड़ अभी इस हफ्ते नाचती रही उसे देखकर कोरोना भी सोच रहा होगा कि ऐसे बेवकूफों को मारकर अपने हाथ गंदे करे, या न करे? और दिलचस्प बात यह है कि निर्वाचित विधायकों ने खुद होकर इस शोहरत का दावा किया कि विसर्जन के लिए डीजे बजाने की इजाजत जिला प्रशासन पर दबाव डालकर उन्होंने दिलवाई। जिस इलाके के नेता, जिस धर्म वाले नेता को अपने वोटरों को खतरे में धकेलना हो, वे ही ऐसा गैरजिम्मेदारी का काम कर सकते हैं जिसका नतीजा उधर बिहार के मुंगेर में निकला, इधर दो दिन पहले बिलासपुर में दिखा, और बाकी शहरों में यहां हिंसा नहीं हुई, वहां ऐसे विसर्जन-डांस से कोरोना कितना फैलेगा इसका हिसाब ऐसे गैरजिम्मेदार विधायक भी नहीं लगा पाएंगे।

लोग जब वोटों पर ंिजंदा रहते हैं, तो गैरजिम्मेदारी को बढ़ाने की कीमत पर भी, हिंसा का खतरा बढ़ाने की कीमत पर भी, अपने सबसे अराजक वोटरों की भीड़ को लुभाने की ऐसी आपराधिक हरकत करते हैं। नतीजा यह होता है कि एक धर्म के देखादेखी दूसरे धर्म के लोग भी उससे अधिक अराजकता का हक मांगते हैं। बिलासपुर में तो यह हुआ कि जिन दुर्गा समितियों को विसर्जन में डीजे की इजाजत नहीं मिली थी, और जिन्होंने बिना हो-हल्ले के विसर्जन किया था, उन्होंने बाकी कुछ समितियों के विसर्जन में डीजे की मौजूदगी पर आपत्ति की, और वहां से पुलिस की दखल शुरू हुई। देखादेखी अराजकता बढ़ाने के लिए दूसरे धर्म की जरूरत भी नहीं पड़ी, एक ही धर्म के लोगों ने इस बात पर आपत्ति की कि जब उन्हें अराजकता की इजाजत नहीं मिली, तो दूसरों को अराजकता की इजाजत क्यों दी गई?

एक तो धर्म वैसे भी पूरी तरह से अराजक मिजाज मामला रहता है, फिर उसमें जब सत्तारूढ़ नेता अपनी ताकत की हवन सामग्री और झोंक देते हैं, तो उसकी अराजकता और भभक पड़ती है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की इस बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने अपना दमखम दिखाया, पक्का इरादा दिखाया, और धर्मस्थलों पर रोक जारी रखी। वरना वहां एक धर्म की हिंसा का मुकाबला करने के लिए दूसरा धर्म भी अपनी हिंसा, अपनी मनमानी, और अपनी अराजकता के हक का दावा करता।

इस देश में सुप्रीम कोर्ट से लेकर दर्जन भर से अधिक हाईकोर्ट सार्वजनिक जगहों पर लाउडस्पीकर और शोरगुल के खिलाफ कड़े फैसले दे चुके हैं, इसके बावजूद कमजोर शासन और कमजोर प्रशासन धर्म तो धर्म तो धर्म, किसी शादी-ब्याह के जुलूस में भी कानून तोडऩे के सामने तुरंत दंडवत हो जाते हैं, और लोगों का जीना हराम होते रहता है। छत्तीसगढ़ में हाईकोर्ट ने कई बार डीजे जैसे शोरगुल के खिलाफ निर्देश दिए हैं, लेकिन विसर्जन का यह हफ्ता पूरी राजधानी को, और भी शहरों को लाउडस्पीकरों में डुबाकर चले गया। अब जहां प्रशासन ऐसी अराजकता और धर्मान्धता के सामने बिछा हुआ है, वहां पर किस आम इंसान या जनसंगठन की यह ताकत है कि वह शासन-प्रशासन की गैरजिम्मेदारी के खिलाफ हाईकोर्ट जाए, और हाईकोर्ट को याद दिलाए कि उसके आदेश पर अफसर अपने जूते रखकर बैठते हैं।

जहां इंसानों का रोजगार शुरू नहीं हो पाया है, जहां कारोबारी हलचल मंदी पड़ी हुई है, लोग बेरोजगार बैठे हैं, लोगों की नौकरियां छूट गई हैं, तनख्वाह घटा दी गई है, काम के घंटे बढ़ा दिए गए हैं, तनख्वाहें रूकी पड़ी हैं, वहां पर उन लोगों को धर्म की फिक्र अधिक पड़ी है, जिन्हें अपने शहर, अपने प्रदेश, और अपने देश को कोरोना के सामने परोस देने में जरा भी हिचक नहीं है। ऐसी गैरजिम्मेदारी पर आज कोई कार्रवाई सिर्फ अदालत कर सकती है। सार्वजनिक जिंदगी को तबाह करके, आम लोगों को खतरे में डालकर नेता और अफसर जिस तरह धार्मिक कर्मकांडों को बढ़ावा दे रहे हैं, उसे अगर अदालत अनदेखा कर रही है, तो वह भी अपनी जिम्मेदारी से दूर भाग रही है।

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