कट्टरता की शिकार होती इंसानियत..

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साल 2020 का दसवां माह भी गुजरने को है और महामारी कोरोना से निजात की कोई सूरत अब तक नहीं दिखी है। कई देशों में वैक्सीन के ट्रायल चल रहे हैं, लेकिन समूची आबादी को सुरक्षित कर लिया जाएगा, ऐसा कोई दावा अब तक नहीं हुआ है। वैसे भी जो देश वैक्सीन बनाने में पहले सफलता प्राप्त कर लेगा, वो अपने देशवासियों और मित्र देशों को ही प्राथमिकता में रखेगा।

हालांकि संयुक्त राष्ट्र संघ बार-बार अपील कर रहा है कि इस महामारी में जो कमजोर और पिछड़े हुए देश हैं, सक्षम देश उनकी मदद के लिए आगे आएं। लेकिन ये अपील दुर्लभ होती इंसानियत के आगे नाकाम हो रही है। कोरोना के कारण मानव जाति पर संकट आया है, ये डर कई वैश्विक मंचों से प्रकट किया जा चुका है। अब तो कोरोना की दूसरी लहर का प्रकोप दिखना भी शुरु हो गया है, जिस के कारण यूरोप के देशों में अफरा-तफरी मची है।

भारत जैसे विकासशील देशों में भी ठंड के दौरान कोरोना की मार गरीबों पर अधिक पड़ सकती है। लेकिन इस वक्त मानव जाति के साथ-साथ मानवता का अस्तित्व खत्म होने का जो खतरा सामने खड़ा है, उसे भी नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए। अपने-अपने सुखों और आराम की चाहत में दुनिया इतनी आत्मकेन्द्रित हो चुकी है कि इसी दुनिया में कमजोरों के साथ कैसा अन्याय हो रहा है, इसकी परवाह भी उसे नहीं है। अपने स्वार्थ पूरा करने के लिए आतंक का सहारा लिया जा रहा है, उस पर धर्म का नकाब पहना दिया गया है और निशाना बनाया जा रहा है बच्चों को। अभी इसी हफ्ते कम से कम तीन ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं, जिसमें निशाने पर मासूम बच्चे हैं। अफ्रीकी देश कैमरून के कुंबा में एक प्राथमिक स्कूल में आतंकियों ने अंधाधुंध गोलीबारी की, जिसमें कम के कम 8 बच्चों की मौत हो गई और कई घायल हो गए। आतंकियों ने तब गोली चलाई जब बच्चे अपनी क्लासरूम में बैठकर पढ़ाई कर रहे थे।

गौरतलब है कि यहां पिछले तीन साल से एंग्लोफोन अलगाववादियों और सरकारी सुरक्षाबलों के बीच टकराव चल रहा है। ये अलगाववादी अंग्रेजी भाषा बोलने वाले पश्चिमी हिस्से को अंबाझोनिया नाम का एक अलग देश बनाने की मांग कर रहे हैं। फिलहाल ये स्पष्ट नहीं है कि गोलियां अलगाववादियों ने ही चलाई या फिर किसी और संगठन का इसमें हाथ है। इधर अफगानिस्तान में राजधानी काबुल के शिया बहुल इलाके में एक शिक्षण केंद्र पर आत्मघाती हमला हुआ, जिसमें स्कूली बच्चों समेत 18 लोगों की मौत हो गई। इसमें भी हमला करने वाले संगठन का पता नहीं चल पाया है, लेकिन माना जा रहा है कि इसमें आईसिस का हाथ हो सकता है, जो गैरमजहबी लोगों पर हमला करता है। मंगलवार को पाकिस्तान के पेशावर के एक मदरसे में आतंकी हमला हुआ, जिसमें कम के कम 7 बच्चों की मौत हो गई है। 

इस हमले से 2014 का वह भयावह हमला याद आ गया, जिसमें सैन्य स्कूल के बच्चों को आतंकियों ने अपना निशाना बनाया था, औऱ कम से कम 150 बच्चे मारे गए थे। जो बच्चे अभी जिंदगी का पाठ ही पूरी तरह नहीं पढ़ पाए हैं, उन्हें आतंकी धर्म के नाम पर दहशत का सबक सिखला रहे हैं। और दुनिया के शक्तिशाली देश आतंक की इस राजनीति को खत्म करने की जगह आपसी लड़ाइयों और नकली बहसों में उलझकर आतंकवादियों के काम को आसान बना रहे हैं।

बल्कि ये कहना ज्यादा सही होगा कि शक्तिशाली देशों की मानवता, शांति और भाईचारे की इस उथली पहल का लाभ हथियार विक्रेताओं को भरपूर मिल रहा है। जैसे अभी फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों की एक टिप्पणी के खिलाफ टर्की, ईरान, पाकिस्तान जैसे देशों ने आवाज़ उठाई है, फ्रांस के आर्थिक और राजनैतिक बहिष्कार की बात की जा रही है। पैगंबर मोहम्मद के एक विवादित कार्टून से उपजी हिंसक घटना के बाद मैक्रों ने धर्मनिरपेक्षता की बात करते हुए इस्लाम को ही कट्टरता से जोड़ दिया।

जबकि सच ये है कि कट्टरवादी ताकतें हर धर्म में बढ़ रही हैं और इन ताकतों को शह राजनीति से मिल रही है। जिन देशों में धर्मनिरपेक्षता के कारण जनता उदार समाज में रहने का सुख पा रही थी, वहां भी नफरत के बीज बोए जा चुके हैं, ताकि सत्ता बरकरार रहे। फ्रांस की आलोचना करने वाले मुस्लिम बहुल देशों के शासकों को अपने गिरेबां में झांकना चाहिए कि अपने देश में उन्होंने जनता को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार व आवास जैसी सुविधाएं कितनी दी हैं और इन धर्मआधारित देशों की कट्टरता की आलोचना करने वालों को भी आत्मनिरीक्षण करना चाहिए कि वे किस तरह अपने संवैधानिक मूल्यों को धता बताकर कट्टरपंथ की राह पर देश को ले जा रहे हैं। कैमरून से लेकर पाकिस्तान तक केवल बच्चे आतंकवाद की चपेट में नहीं आए हैं, समूची मानवता इसका शिकार हुई है।

(देशबन्धु)

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