सचमुच भूमाफिया हैं जनसेवक सिंधिया ?

Desk
Page Visited: 274
0 0
Read Time:27 Minute, 6 Second

-विवेक श्रीवास्तव।।

ग्वालियर नरेश ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने ही ग्वालियर में चारों तरफ से उठते राजनीतिक भूचाल में बुरी तरह से घिरे गए हैं। 'राजनीतिक अवसरवादिता' के आरोपों के चलते आगामी  विधान सभा उपचुनावों में अपने समर्थक भाजपा टिकटार्थियों के पक्ष में माहौल बनाना पहले ही उनके लिए टेढ़ी खीर बना हुआ  था, अब कांग्रेस ने सरकारी ज़मीनों पर बड़े पैमाने पर किये गए ‘अवैध क़ब्ज़ों’ को लेकर उन्हें आरोपों के गंभीर चक्रव्यूह में फंसा दिया है। ग्वालियर और आस-पास के जिलों में हज़ारों एकड़ भूमि ज्योतिरादित्य, उनके परिजनों और उनके पारिवारिक ट्रस्टों के नाम से घेरी गई है। पिछले कई दशकों में हुई भूमि स्वामित्व की इस बंदरबांट के बारे में कहीं-कहीं स्थानीय लोग दबी ज़ुबान से चर्चा करते थे लेकिन अब जिस तरह से इन क़ब्ज़ों के रहस्य उजागर होने शुरू हुए हैं, उससे आम मतदाता हैरत में है।  
                       
प्रदेश में सिंधिया की वजह से सत्ता गंवा चुकी कांग्रेस इसी जनसेवा के जरिए सिंधिया को टारगेट कर रही है। ताजा मामला ग्वालियर के   जयेंद्र गंज इलाके में माहोरकर का बाड़ा का है। 8 बीघा 2 बिस्वा ज़़मीन का यह बाड़ा राजघराने की संपत्ति का हिस्सा नहीं है। कांग्रेस का आरोप है कि फर्जी दस्तावेजों के सहारे सिंधिया ने इसे अपनी संपत्ति घोषित कर दी। पिछले दिनों 3 अक्टूबर को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कांग्रेस ने इस गड़बड़ी को सबूतों के साथ रखा। कांग्रेस का कहना है इसके लिए एक गैर पंजीकृत ‘सिंधिया देवस्थान ट्रस्ट’ का सहारा लेकर लगभग 360 करोड रुपए की इस संपत्ति पर कब्जा किया। यही नहीं कांग्रेस ने सिंधिया को भू माफिया भी घोषित कर दिया।                             
                     
अपनी संपत्तियों को बचाना और उन्हें सुरक्षित रखना कोई गुनाह नहीं है लेकिन सरकारी संपत्तियों को बड़े पैमाने पर हड़पना कई सवाल पैदा करता है। ख़ास तौर पर तब जब सिंधिया अपने भाषणों में यह कहें कि राजनीति उनके लिए जनसेवा का जरिया है। और वह जनसेवक हैं। कुछ बरस पीछे जाएं तो भाजपा नेता और राज्यसभा सांसद रह चुके प्रभात झा सिंधिया परिवार के कथित अवैध कब्जों का मुद्दा उठा चुके हैं। भाजपा नेता दबी ज़ुबान से स्वीकार करते हैं, दिवंगत भाजपा नेता अरुण जेटली और सिंधिया की दोस्ती के चलते प्रभात झा को बाद में अपने कदम खींचने पड़े। 

                    
कांग्रेस नेता और पार्टी के ग्वालियर चंबल संभाग के मीडिया प्रभारी केके मिश्रा ‘सत्य हिंदी’ से बातचीत में दावा करते हैं कि अपने रसूख़ का इस्तेमाल कर सिंधिया ने ग्वालियर में ही 133 बीघा 8 बिस्वा जमीन हथिया ली। जिसका बाज़ार मूल्य 14 अरब रुपए के आसपास है।
                    
सरकारी ज़मीनों को खु़र्द बुर्द कर ठिकाने लगाने के खेल में क्या अकेले सिंधिया ही दोषी हैं, यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि सत्ता संभालने के बाद मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सिंधिया परिवार द्वारा संचालित ‘सिंधिया एजुकेशन सोसाइटी’ को 146 एकड़ ज़मीन महज 100 रुपये में 99 साल की लीज पर दे दी थी। सिंधिया एजुकेशन सोसायटी ‘सिंधिया स्कूल’ चलाती है जिसकी गिनती देश के नामचीन पब्लिक स्कूलों में होती है। ‘सोसाइटी’ खैरात में शिक्षा नहीं देती है। इसमें अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए धनाढ्य अभिभावकों को लाखों रुपए की फीस हर साल जमा करानी पड़ती है। तो क्या माना जाए ज़मीनों के खेल में कांग्रेस और भाजपा दोनों के ही दामन पर दाग़ हैं। कांग्रेस नेता केके मिश्रा सत्ता के लिए हुई इस सौदेबाजी को गलत मानते हैं लेकिन उनका कहना है कि  इस मामले में सिंधिया ने कमलनाथ को ब्लैकमेल किया  था। ‘मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी’ के राज्य सचिव जसविंदर सिंह सवाल उठाते हैं, कमलनाथ सरकार के फैसलों की समीक्षा के लिए गठित शिवराज सरकार की कमेटी क्या लीज के इस मामले में भी समीक्षा करेगी। बहरहाल सिंधिया से खार खाई कांग्रेस पूरे कच्चे चिट्ठों के साथ सुप्रीम कोर्ट में जाने की तैयारी कर रही है।
                       
सरकारी ज़मीनों पर क़ब्ज़े को लेकर एक और कांग्रेस जहाँ उन्हें भूमाफिया करार दे रही है वही दूसरी तरफ ग्वालियर में उनके भूमि व्यामोह की ठगी के शिकार आम जन की भी कमी नहीं। ग्वालियर निवासी सुरेंद्र श्रीवास्तव भी ऐसे ही एक शख़्स हैं जो सिंधिया के खिलाफ कानूनी तौर पर लड़ाई लड़ रहे हैं। श्रीवास्तव ने ग्वालियर के ‘शारदा विहार’ इलाके में 31हजार 500 स्क्वायर फीट ज़मीन सिंधिया परिवार से खरीदी थी लेकिन जब रजिस्ट्री हुई तो उनके हिस्से में 6000 स्क्वायर फीट ज़मीन कम आई। बाद में पता चला जिस ज़मीन का सौदा हुआ है वह सिंधिया परिवार की थी ही नहीं। फिलहाल यह मामला संभागीय कमिश्नर की कोर्ट में विचाराधीन है। सुरेंद्र श्रीवास्तव ने  1925 से अब तक के जमीनों से जुड़े दस्तावेज  जुटाए हैं। ‘मीडिया दरबार’ से बातचीत में उन्होंने कहा ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ग्वालियर में ही 10 हजार करोड़ रुपए कीमत की सरकारी जमीनों को अपने नाम करा लिया।
               
आज़ादी के बाद यह पहला मौका है जब "महल" को चुनौती मिल रही है और यह चुनौती भी उसी कांग्रेस की तरफ से है जिसने बरसों महल को ढोया है और महल ने उसे। अगर इतिहास में जाएं तो सिंधिया रियासत को  राजनीतिक तौर पर कभी चुनौती नहीं मिली। वामदलों को छोड़ दिया जाए तो आज़ादी से पहले और उसके बाद कोई  राजनीतिक दल महल को चुनौती देने का साहस नहीं जुटा सका था । एक समय वह भी था जब दिवंगत माधवराव सिंधिया के समय मध्य प्रदेश की सरकार सिंधिया राजपरिवार के  महल यानि जय विलास पैलेस से चलती थी,  मोतीलाल वोरा उस समय मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। अब जबकि मध्यप्रदेश में हो रहे उपचुनाव में भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने हैं, ग्वालियर चंबल संभाग की 16 सीटों पर मुकाबला कांग्रेस बनाम सिंधिया हो गया है। सिंधिया के प्रभाव वाली यह वही  विधानसभा सीटें हैं जिन्होंने मध्य प्रदेश में कांग्रेस के लिए  सत्ता का रास्ता आसान बनाया। 
              
सिंधिया को उनके ही गढ़ में धराशायी करने के लिए कांग्रेस जिस तरह एक के बाद एक सिंधिया के कथित ज़मीन घोटालों को उछाल रही है उसकी काट भाजपा और सिंधिया के पास नहीं है। इधर सिंधिया के साथ भाजपा में शामिल हुए पूर्व विधायकों की "बिकाऊ" छवि भी भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही है। ग्वालियर चंबल संभाग में कांग्रेस सिंधिया के खिलाफ जिस हमलावर अंदाज में है, इसमें कोई संदेह नहीं, भाजपा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया की जनसेवक की छवि फीकी जरूर पड़ी है और शायद यही कांग्रेस का मकसद है। रियासतें भले ही खत्म हो गई हो लेकिन सिंधिया को लगता है वह अभी महाराज हैं और अंचल की जनता उनकी रियाया। अपने पिता माधवराव सिंधिया के निधन के बाद कांग्रेस मैं अपनी एंट्री के बाद से ही सिंधिया ने अपनी संपत्तियों को बचाने के प्रयास शुरू कर दिए।

सिंधिया और कांग्रेस के खिलाफ जारी जंग में 9 अक्टूबर को टि्वस्ट आया। कांग्रेस की तरफ से एक के बाद एक जमीन घोटाले उजागर करने पर सिंधिया ने अपनी चुप्पी तोड़ी। ज्योतिरादित्य सिंधिया इन दिनों ग्वालियर चंबल संभाग के चुनावी दौरे पर हैं। कांग्रेस के आरोपों पर जब उनकी टिप्पणी मांगी गई तो उन्होंने कहा- ” ये संपत्तियां 300 वर्ष से सिंधिया परिवार की हैं।” वे आगे कहते हैं, मेरा सवाल उनसे है जो नए महाराजा बने हैं। पूरे मामले को इमोशनल टच देते हुए उन्होंने यह भी कहा, अगर मैंने ऐसे परिवार में जन्म लिया है तो यह मेरी गलती है। हालांकि इसके बाद कांग्रेस नेता केके मिश्रा ने उन्हें दस्तावेजों के साथ आमने सामने अपनी बात रखने की चुनौती भी दी।

ग्वालियर के प्राचीन भूतेश्वर महादेव मंदिर पर पर भी सिंधिया परिवार की निगाहें हैं। यह मंदिर माफ़ी औकाफ़ विभाग के अधीन है। माफ़ी औकाफ़ दरअसल वह महकमा है जो जिसके जिम्मे रियासत काल के समय बनाए मंदिर जो अब राज्य शासन की सम्पत्ति है, देखरेख करना है। मध्य प्रदेश सरकार का यह विभाग यूपी के मथुरा और वृंदावन में सिंधिया रियासत द्वारा बनाए मंदिरों की देखभाल भी करता है। हालांकि अधिकांश मंदिरों और इससे जुड़ी संपत्तियों पर स्थानीय लोगों ने अवैध कब्जा कर लिया है और कुछ मंदिरों पर कब्जे को लेकर यूपी में कोर्ट कचहरी में भी मामले चल रहे हैं। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक भूतेश्वर मंदिर की 19 बीघा से ज़्यादा ज़मीन ग्वालियर में और लगभग 15 बीघा मंदिर पेटे की ज़मीन मुरैना जिले में है। ग्वालियर में सर्वे नंबर 773 पर मंदिर और उससे लगी सर्वे नंबर 573, 574, 575 और 576 की ज़मीनें दस्तावेजों में हेराफेरी कर सिंधिया परिवार की तरफ से बेच दी गईं। साल 1989 में तत्कालीन तहसीलदार के जरिए कारस्तानी कर मंदिर से जुड़े दस्तावेजों में देवस्थान की जगह ‘सिंधिया देवस्थान’ दर्ज करा दिया गया। क्योंकि मंदिर की बेशकीमती ज़मीन को बेचना था लिहाजा हेर फेर की शुरुआत हुई। ख़रीद फरोख़्त के लिए नजूल का अनापत्ति प्रमाण पत्र जरूरी था, इसलिए एक आवेदन दिया गया। साल 2003 में माफ़ी औकाफ़ विभाग ने अनापत्ति प्रमाण पत्र देने से इनकार कर दिया बल्कि तत्कालीन कलेक्टर ने कमिश्नर को भेजे अपने प्रतिवेदन में इसे औकाफ़ की जमीन ही बताया। इस बीच बगैर कोई फैसला आए 2004 में ज़मीन को बेच दिया गया। इधर इसी साल मंदिर के पुजारी शंभू नाथ शर्मा की भी हत्या कर दी गई। हत्या किसने की इसका खुलासा अब तक नहीं हुआ। फिलहाल पुजारी परिवार की पांचवी पीढ़ी और स्वर्गीय शंभू नाथ के बेटे अमन शर्मा मंदिर के पुजारी हैं और मंदिर परिसर से पुजारी परिवार को बेदखल किए जाने के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।
यह मामला तहसीलदार कोर्ट, एसडीएम कोर्ट से कलेक्टर कोर्ट होता हुआ कमिश्नर कोर्ट में पहुंचा, जहां यह मामला विचाराधीन है। इस मामले में दिलचस्प तथ्य यह है कि इसी साल मार्च से मई के दौरान लॉक डाउन की अवधि में सिंधिया परिवार राजस्व न्यायालयों में एक के बाद एक जीत हासिल करता रहा। अमन शर्मा की अपील पर अब कमिश्नर कोर्ट मामले की सुनवाई कर रहा है। इधर बेदखली के ख़िलाफ अमन शर्मा ने ग्वालियर और भोपाल में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मीडिया के सामने भी अपना पक्ष रखा।

यह ताजा विवाद है, इससे पहले यह विवाद सेशन कोर्ट, एडीजे कोर्ट, हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट जा चुका है जहां सिंधिया परिवार को हार मिली। अदालतों के फैसलों का लब्बोलुआब यही था कि बगैर वैधानिक प्रक्रिया अपनाए पुजारी को बेदखल ना किया जाए। शर्मा परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी पुजारी की ज़िम्मेदारी संभाल रहा है और सिंधिया परिवार इस परिवार को किराएदार साबित करना चाहता है ताकि उसे बेदखल कर मंदिर की संपत्ति को हासिल किया जा सके। सुप्रीम कोर्ट में भी हार मिलने के बाद नए सिरे इस मामले को तहसीलदार की अदालत में लाया गया जिसमें जिला प्रशासन ने सिंधिया के दबाव में गजब की फुर्ती दिखाई।


कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आने के पीछे सिंधिया भले ही यह तर्क दें कि कांग्रेस में उनका अपमान हुआ है कांग्रेस छोड़ने के पीछे उनकी वजह ग्वालियर चंबल अंचल की उपेक्षा है, लेकिन इस चुनाव में यह खुलकर साफ हो गया है कि कमलनाथ सरकार के रहते सिंधिया अपनी जमीनों को बचाने में असहज महसूस कर रहे थे। ग्वालियर में सरकारी ज़मीनों को ठिकाने लगाने का एक बड़ा मामला राजनीतिक दबाव के बाद ईओडब्ल्यू ( आर्थिक अपराध अन्वेषण विंग )ने ठंडे बस्ते में डाल दिया। सर्वे नंबर 1211,1212,1217और1221 की बेशकीमती ज़मीनें सिंधिया परिवार के नाम हो गईं। और फिर इन्हें बेच दिया गया। उस वक्त इन जमीनों को बेचने वाले सिंधिया कांग्रेसी थे और ख़रीददार भाजपाई। कहने की जरूरत नहीं है ऐसे मामलों में राजनैतिक छुआछूत नहीं देखी जाती है। अवैध ख़रीद-फ़रोख़्त के इस मामले की ईओडब्ल्यू में सुरेन्द्र श्रीवास्तव ने शिकायत की थी। यह बात साल 2014 की है। जानकार बताते हैं ज़मीन की अवैध ख़रीद-फ़रोख़्त के इस मामले में 1000 करोड़ रुपए का घपला हुआ है। 2014 में शिकायत आने के बाद ईओडब्ल्यू अपने हिसाब से मामले की पड़ताल करता रहा, लेकिन 2020 में जांच ने रफ्तार पकड़ ली। उस वक्त कमलनाथ मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। ईओडब्ल्यू की जांच के नतीजे आते इससे पहले ही कमलनाथ सरकार गिरा दी गई। और शिवराज सिंह ने मुख्यमंत्री बनने के बाद जांच पर भी लगाम लगा दी। हालांकि सुरेंद्र श्रीवास्तव इस मामले को नए सिरे से अन्य जांच एजेंसियों के सामने ले जाने की तैयारी में हैं ताकि करोड़ों के इस घोटाले का सच सामने आ सके।
हाल के दिनों में सिंधिया परिवार से जुड़े दबे ढंके जमीन घोटाले जितने सामने आए हैं उतने पहले कभी नहीं आए। ज़मीनों की हेरा फेरी से जुड़े मामले छोटी-बड़ी अदालतों में जरूर चले लेकिन इस तरह कभी सामने नहीं आए। ऐसा ही एक मामला ‘कुत्ते की समाधि’ का है। अंग्रेजी राज के वक्त सिंधिया परिवार के पास एक विदेशी नस्ल का कुत्ता था और उसकी मौत के बाद उसकी वफादारी की याद में इस कुत्ते की समाधि बनवाई गई थी। बड़े भूभाग में बनी इस कुत्ते की समाधि भी अवैधानिक तरीके से बेच दी गई।
ग्वालियर के महलगांव इलाके में सर्वे नंबर 916 पर एक बीघा आठ बिस्वा ज़मीन पर ही कुत्ते की समाधि है। यह साल 1996 तक राजस्व रिकॉर्ड में राजस्व विभाग, कदीम, पटोर नजूल के तौर पर दर्ज थी। 1996 के बाद तहसीलदार ग्वालियर ने बगैर किसी ही वैधानिक आवेदन अथवा बगैर कोई मामला दायर हुए और शासन का पक्ष सुने बगैर स्वर्गीय माधवराव सिंधिया के नाम पर नाम पर नामांतरित कर दी। यही नहीं इस हेराफेरी में हाई कोर्ट ग्वालियर के 8 सितंबर 1981 के उस आदेश की भी अनदेखी की गई जिसमें मध्य प्रदेश भू राजस्व संहिता की धारा 57(2) का हवाला है। इस धारा के तहत ऐसा करने का अधिकार एसडीएम को है, तहसीलदार को नहीं। जाहिर है उस वक्त के अफसरों की सहमति या फिर महल के दबाव और रसूख़ की वजह से ही ऐसा हुआ होगा। नामांतरण के बाद के सालों में स्वर्गीय माधवराव सिंधिया की पत्नी श्रीमती माधवी राजे सिंधिया ने अपने बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया और बेटी चित्रांगदा राजे की सहमति से कुत्ते की समाधि की जमीन को बेच दिया। कांग्रेस नेता और मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष मुरारी लाल दुबे इस नामांतरण और इसके बाद हुई ज़मीन की ख़रीद फरोख़्त को अवैध ठहराते हैं। दुबे उस दस्तावेज का हवाला देते हैं जो रियासतों के विलीनीकरण के वक्त का है। इस दस्तावेज में महाराजा ग्वालियर की चल अचल संपत्ति का ब्योरा है। दरअसल यह दस्तावेज उस करार का हिस्सा है जो भारत सरकार और महाराजा ग्वालियर के बीच हुआ था। करार के वक्त महाराजा ग्वालियर की व्यक्तिगत, पूर्ण स्वामित्व व उपयोग की जो संपत्ति तय की गई, उसकी चार सूचियां प्रकाशित हुईं। दुबे के मुताबिक वर्ष 1992-93 में सर्वे नंबर 916 पर स्थित यह ज़मीन शासकीय भूमि के रूप में दर्ज है। इसके खाता नंबर 12 में कैफ़ियत में कुत्ता समाधि दर्ज है। लिहाजा यह सम्पत्ति महाराजा ग्वालियर या फिर सिंधिया परिवार की नहीं है। दुबे के पास इन सूचियों की प्रति है। कांग्रेस जमीन की हेराफेरी के इस मामले को गंभीर किस्म की धोखाधड़ी ठहराती है। दरअसल हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच के जिस आदेश का उपरोक्त जिक्र है, उस आदेश का हवाला श्रीमती माधवी राजे ने कुत्ता समाधि की ज़मीन के विक्रय पत्र में किया, जिसमें कहा गया कि इसी आदेश के आधार पर सर्वे नंबर 916 की ज़मीन उनके हिस्से में आई। इधर मुरालीलाल दुबे की मानें तो हाईकोर्ट के आदेश में सर्वे नंबर 916 का जिक्र ही नहीं है। मतलब साफ है कि कोर्ट के आदेश की गलत व्याख्या की गई। दिलचस्प यह भी है कि जमीनों से जुड़े इन मामलों में सिंधिया परिवार या फिर उनके प्रवक्ता की तरफ से कोई सफाई नहीं आई है, ऐसे में कई संदेह पैदा होते हैं।
मध्यप्रदेश में इन दिनों चुनावी हवा बह रही है और ख़ासतौर पर ग्वालियर चंबल संभाग की 16 विधानसभा सीटों पर सियासत कुछ ज्यादा ही उफान पर है। और यह चुनाव भी सिंधिया के लिए अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। ज़मीन घोटालों ने उनकी “महाराज” की छवि को निश्चित रूप से धक्का पहुंचाया है। सिंधिया भाजपा के तो हो गए हैं लेकिन यहां उनकी ख़िदमत में सर झुकाने वाली नहीं हैं। भाजपा के साथ कमलनाथ सरकार गिराने के बाद ठीक “महल” के सामने “महाराज” के पुतले जलना ग्वालियर चंबल अंचल के लिए एक अजूबा ही था। इसके बाद सामने आए जमीन घोटालों ने महाराज की साख में और बट्टा लगा दिया। 10 नवंबर को तय हो जाएगा कि मध्य प्रदेश में किसकी सरकार बनती है। अगर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनती है तो सिंधिया के मुश्किलें बढ़ना ही हैं। सकता फिर शिवराज के हाथ आई तो उन्हें भाजपा के ही दिग्गजों से जूझना होगा। हां, ज़मीन घोटालों पर पर्दा जरूर पड़ा रहेगा।
ग्वालियर का किला कभी सिंधिया के हाथ में नहीं रहा लेकिन इसी किले पर सिंधिया परिवार द्वारा संचालित प्रतिष्ठित सिंधिया स्कूल है। सिंधिया की ज़िद के चलते ग्वालियर में रोपवे प्रोजेक्ट परवान नहीं चढ़ सका। साल 2017 में इस प्रोजेक्ट ने रफ्तार पकड़ी लेकिन अपने रसूख़ का इस्तेमाल कर ग्वालियर के फूलबाग से ग्वालियर किले तक जाने वाले रोपवे की जगह ही बदलवा दी। ऐसा इसलिए क्योंकि रोपवे को किले की जिस हिस्से तक पहुंचना था, वह ज़मीन सिंधिया स्कूल से कुछ ही दूरी पर है। सिंधिया स्कूल के आसपास पर्यटक फटकें यह सिंधिया को मंज़ूर नहीं था। दिलचस्प यह है कि रोप वे प्रोजेक्ट की जगह बदलने का काम इसी साल जुलाई में हुआ और इस समय भाजपा की सरकार है। इसे लेकर सिंधिया की मंशा पर भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या वे किले की ज़मीन को भी कब्ज़ाना चाहते हैं? ज्योतिरादित्य सिंधिया के इस कदम से ग्वालियर सांसद विवेक नारायण शेजवलकर सिंधिया से तो खुन्नस खाए हुए ही हैं, भाजपा के दूसरे नेताओं में भी इसे लेकर नाराज़गी है।
रोप वे कि इस प्रोजेक्ट की कहानी भी कम रोचक नहीं है। साल 1972 के आसपास ग्वालियर नगर निगम में फूलबाग से ग्वालियर किले तक का सफर रोपवे से कराने का प्रस्ताव पारित हुआ था। इन सालों में नगर निगम ग्वालियर रोप वे के लिए बजट तो हर साल आवंटित करती रही लेकिन काम रत्ती भर नहीं हुआ। सांसद विवेक शेजवलकर ने साल 2006 में महापौर रहते हुए इसमें रुचि ली और इस काम को रफ़्तार दी और 2017 में इसके टेंडर भी हो गए। अगर नई जगह पर रुपए की शुरुआत की जाती है तो तमाम औपचारिकताओं के लिए नए सिरे से पहाड़ा पढ़ना होगा, उधर इस बदलाव से कोलकाता की ठेकेदार फर्म दामोदर रोपवे हाई कोर्ट में चली गई है। इन हालात में नहीं लगता कि ग्वालियर में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए लोग फूलबाग से किले तक हवा में सफ़र कर पाएंगे।

Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleepy
Sleepy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %
Facebook Comments

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Next Post

नीतीश को फिर लालू संग सरकार बनानी पड़ी तो कितने बच्चे गोद बिठाएंगे?

-सुनील कुमार।। चुनाव में हलकटपन बड़ी आम बात है। मध्यप्रदेश में कमलनाथ ने भाजपा की नेता इमरती देवी को आइटम […]
Visit Us On TwitterVisit Us On FacebookVisit Us On YoutubeVisit Us On LinkedinCheck Our FeedVisit Us On Instagram