पत्रकारिता के प्रति निर्मम मोदी सरकार..

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मोदी सरकार के छह सालों में स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य हो गया है। लोकतंत्र का जाप करते-करते इस सरकार में विरोध की आवाज उठाने वालों, सरकार की खामियों को दिखाने वाले, उसके फैसलों की आलोचना करने वाले अनेक पत्रकारों को तरह-तरह के दमन का सामना करना पड़ा। गौरी लंकेश जैसे कई पत्रकारों की आवाज हमेशा के लिए खामोश करा दी गई। जो जिंदा हैं, उन्हें भी डरा कर चुप कराने की कोशिशें जारी हैं। ताजा उदाहरण प्रशांत कनौजिया, अनुराधा भसीन, सिद्दीक कप्पन जैसे पत्रकार हैं।

उत्तरप्रदेश में आपत्तिजनक ट्वीट करने के आरोप में प्रशांत कनौजिया को अगस्त में गिरफ्तार किया गया था, जिन्हें हाल ही में जमानत मिली है। इधर जम्मू और कश्मीर के प्रमुख अंग्रेजी अखबार कश्मीर टाइम्स के श्रीनगर कार्यालय को सोमवार को संपदा विभाग ने सील कर दिया। इस पर कश्मीर टाइम्स की संपादक अनुराधा भसीन ने कहा, क्योंकि मैं स्पष्ट रूप से स्थिति को प्रतिबिंबित कर रही हूं और खुलकर बोल रही हूं, इसलिए मुझे बदला लेने के लिए निशाना बनाया जा रहा है। गौरतलब है कि इस महीने की शुरुआत में अधिकारियों ने अनुराधा को जम्मू में उनके आधिकारिक निवास से बेदखल कर दिया था।

कश्मीर टाइम्स कार्यालय पर हुई कार्रवाई की प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने भी भर्त्सना की है। इसी तरह हाथरस मामले के बाद रिपोर्टिंग के लिए जा रहे केरल के पत्रकार सिद्दीक कप्पन को तीन अन्य लोगों के साथ उत्तरप्रदेश पुलिस ने कोई संज्ञेय अपराध करने की मंशा रखने के शक में सीआरपीसी की धारा 151 के तहत गिरफ्तार किया था, लेकिन बाद में चारों के खिलाफ राजद्रोह और आतंकवाद रोधी कानून के तहत मामला दर्ज किया गया। उन्हें सात अक्टूबर को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजा गया था और अब इसकी अवधि 2 नवंबर तक बढ़ा दी गई है। इससे पहले कप्पन से मिलने के लिए केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (केयूडब्ल्यूजे) द्वारा दायर की गई याचिका खारिज कर दी गई थी।

उत्तरप्रदेश पुलिस उन्हें पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया का सदस्य बता रही है। जबकि गिरफ्तारी के कुछ ही घंटों बाद केरल के एक प्रमुख पत्रकार संगठन ने सिद्दीक कप्पन को लेकर जानकारी दी थी कि वह केरल के कई मीडिया संस्थानों के लिए काम करने वाले दिल्ली के एक वरिष्ठ पत्रकार हैं। बिना किसी सबूत के, बिना किसी गलती के हिरासत में भेजा जाना इस सरकार में आम बात हो गई है और उससे भी मामूली बात ये है कि अगर आप सरकार के समर्थक हैं तो फिर आप गोली मारो जैसी बातें अपने भाषण में कहें या हम खुद निपट लेंगे जैसी धमकी दें, या लाठी-डंडे लेकर किसी शैक्षणिक संस्थान में खुलेआम गुंडागर्दी करें, आप पर कोई कार्रवाई नहीं होगी। क्योंकि पुलिस को इसमें समाज के लिए कोई खतरा नजर नहीं आता, शांति भंग होने का डर नहीं लगता।

पुलिस-प्रशासन और सरकार को डर केवल अपने विरोधियों से लगता है, इसलिए उन्हें देश के लिए खतरा बताकर कैदखाने का रास्ता दिखा दिया जाता है। बल्कि इस सरकार को तो आरोपियों के परिजनों से भी शायद खौफ होने लगा है। इसलिए राहुल गांधी से जब कप्पन की पत्नी ने भेंट की, और अपने पति के लिए इंसाफ दिलाने में मदद मांगी, तो भाजपा को यह बात भी आपत्तिजनक लग रही है। इसलिए भाजपा प्रवक्ता गौरव भाटिया ने कहा कि जो देशविरोधी लोग हैं, कांग्रेस उनके साथ है। इससे पहले जब कश्मीर के तीन फोटो पत्रकारों को प्रतिष्ठित पुलित्जर पुरस्कार मिलने पर राहुल गांधी ने उन्हें बधाई दी थी, तो भाजपा के संबित पात्रा ने राहुल गांधी को एंटी नेशनल कह दिया था। 

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को इस तरह बाधित किए जाने के प्रकरणों का नतीजा है कि इस साल वैश्विक प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 180 देशों के समूह में दो स्थान नीचे उतरकर 142वें नंबर पर आया है। दुनिया देख रही है कि भारत में प्रेस की स्वतंत्रता को खत्म करने की कोशिशें हो रही हैं और इसलिए ऑस्ट्रिया स्थित इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्यूट और बेल्जियम स्थित इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट इन दो अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर कहा है कि कोरोना वायरस संकट के बाद से पत्रकारों के खिलाफ दायर किए गए केसों में तेजी देखने को मिली है।

सरकार की कमियों को उजागर करने वालों की आवाज स्वास्थ्य संकट का बहाना बनाकर शांत की जा रही है। एक अच्छे और सफल पब्लिक हेल्थ सिस्टम के लिए स्वतंत्र मीडिया का होना जरूरी है। पत्र में राइट्स एंड रिस्क एनालिसिस ग्रुप  की रिपोर्ट का जिक्र किया गया है कि 25 मार्च से 31 मई के बीच करीब 55 पत्रकारों को महामारी कवर करने के दौरान लक्ष्य बनाया गया। इन संगठनों ने मोदीजी से आग्रह किया कि वे राज्य सरकारों को निर्देश दें कि पत्रकारों के खिलाफ सभी केस बंद किए जाएं।

साथ ही वो केस भी बंद किए जाएं जिनमें पत्रकारों को काम करने की वजह से राजद्रोह के आरोप लगा दिए गए हैं। इस पत्र से जाहिर हो रहा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उदार लोकतांत्रिक शासन और अभिव्यक्ति की आजादी के परिप्रेक्ष्य में मोदी सरकार की छवि किस तरह की बन रही है। इस छवि को टीआरपी के खेल से सुधारना भी कठिन होगा।

(देशबन्धु)

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