जनता के पैसे से आमजन का विरोध..

बात सरकारी वकीलों की, सरकारी पैसों से जनता का विरोध हो तो जनहित का क्या होगा..

-संजय कुमार सिंह।।

इंडियन एक्सप्रेस में आज प्रकाशित एक खबर के अनुसार दिल्ली दंगे के मामले में गिरफ्तार जेएनयू के छात्र उमर खालिद को गिरफ्तारी का कारण तक नहीं बताया गया है और सरकारी वकील की तरफ से दलील दी गई है कि उसे मांगे गए दस्तावेज दे दिए गए तो वह बहुत सारे दस्तावेज मांगना शुरू कर सकता है। आप समझ सकते हैं कि सरकारी वकील ऐसे तर्क कब और क्यों देगा। आइए सरकारी वकीलों की जरूरत और उनके काम तथा उनकी सेवाएं लेने पर एक नजर डालें।

इंडियन एक्सप्रेस की खबर

इस संबंध में इंडियन एक्सप्रेस में इस खबर के साथ ही एक दूसरी खबर भी है, दिल्ली दंगे के मामले में विशेष सरकारी वकील नियुक्त किए गए हैं और इसे नियमानुसार नहीं हुआ बताया जा रहा है और इसपर भी एक मुकदमा है जिसकी सुनवाई अब नौ नवंबर को होगी।
दिल्ली दंगे से संबंधित इसी पन्ने पर तीसरी खबर के मुताबिक, गोली बताए गए देसी कट्टे से नहीं चली थी और वीडियो रिकार्ड से साबित नहीं होता है कि अभियुक्त मौके पर था। इस लिहाज से उसे जमानत मिल गई। शायद बच भी जाए क्योंकि इस खबर के अनुसार अदालत ने पाया कि वारदात से पहले आस-पास के सीसीटीवी कैमरे अलग दिशा में घुमा दिए गए थे।
अव्वल तो सरकार ही नहीं, सरकारी वकील को भी जनहित की बात करनी चाहिए और पहले ऐसा ही होता था। अभी भी आम मामलों में ऐसा ही होता है। उसे अक्सर एतराज नहीं होता है और नियमानुसार काम होता रहता है। पर एतराज अगर यह किया जाए कि अभियुक्त को कोई कागज दिया गया तो वह बहुत सारे कागज मांगेगा तो आप समझ सकते हैं कि सरकारी पक्ष कितना कमजोर है। आप चाहते हैं कि किसी को जेल में बंद रखा जाए पर कारण भी नहीं बताएंगे। कायदे से सरकार को ऐसा सोचना भी नहीं चाहिए पर सरकार अगर ऐसा चाहती है तो सरकारी वकील सरकार के अच्छे बुरे का समर्थन करने के लिए नहीं होता है। वह कानून का पालन सुनिश्चित करने के लिए होता है।
वैसे ही जैसे किसी पिता से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने हत्यारे बेटे को कानूनी सलाह न दे। किसी पार्टी अध्यक्ष से उम्मीद की जाती है कि अपराधियों को टिकट न दे और जिन्हें टिकट या पद दे वे अपराध करे तो उनका साथ न दे और सुनिश्चित करे कि कानून का शासन हो। किया भी जाए तो सरकारी पैसे से तो नहीं ही हो। वही भ्रष्टाचार है। कानून का शासन मतलब जिसकी लाठी उसकी भैंस नहीं होता है। पर सरकार गलत चाहती है सरकारी वकील उसका समर्थन कर रहा है और सरकार का पक्ष रखने के लिए अगर मुंबई हाई कोर्ट में सुप्रीम कोर्ट के वकील लगाने पड़ेंगे तो आप समझ सकते हैं कि कानून के नाम पर जबरदस्ती चल रही है। कल मैंने एक पोस्ट में लिखा था जज लोया की मौत की जांच का विरोध करने के लिए तब की भाजपा सरकार ने हरीश साल्वे को सरकारी वकील बनाया था और अब अर्नब गोस्वामी के मामले में कपिल सिब्बल की सेवाएं ली जा रही हैं।
ठीक है कि इसमें कानूनन कुछ गलत नहीं है पर इतने बड़े नामों की जरूरत क्यों पड़ी। एक जज की मौत की जांच का विरोध क्यों? अगर मकसद सरकारी संसाधनों की बचत थी तो इतने बड़े वकील को फीस देना कैसे सही हो सकता है? अगर अपराधी बहुत पैसे वाला हो, बड़े वकील रखे तो सरकार मुकाबले में ऐसा करे तो प्रशंसनीय होगा पर क्या ऐसा हमेशा होता है? एक तरफ बड़े नाम यानी ज्यादा खर्च और दूसरी तरफ जनविरोधी तर्क – दोनों सरकारी वकील कर रहे हैं। साफ है कि मामला सरकारी मनमानी है। सरकार जनता के पैसे से मनमानी कर रही है। अगर बड़े (महंगे) वकील सजा या रिहाई या जीत सुनिश्चित करने के लिए लगाए जाते हैं तो यह फैसला जनहित में होना चाहिए, सरकार हित में नहीं। यह कौन देखता है? वकीलों को जनता के करोड़ों रुपए फीस के रूप में देना और जनता के ही खिलाफ दलील दिलवाना कैसे सही हो सकता है?
अगर सरकार मानती है कि महंगे या नामी वकीलों से फैसले या अदालती आदेशों पर फर्क पड़ता है तो आम आदमी के लिए यह सुविधा कैसे सुनिश्चित होगी? अर्नब गोस्वामी या रिपबलिक टीवी का मामला आम आदमी का नहीं है। उसके मामले में महाराष्ट्र सरकार का फैसला तो प्रशंसनीय है पर भाजपा की सरकारें हरीश साल्वे जैसे वकील अगर सरकार की तरफ से रखती हैं तो आम जनता का प्रतिनिधित्व साधारण वकील करें और हार गए तो क्या, “न्याय होना ही नहीं चाहिए होता हुआ दिखना भी चाहिए” – का कोई मतलब नहीं है। खासकर तब जब सरकार ही किसी को जबरन फंसा रही है। अगर जबरन फंसाना इतना ही जरूरी और जायज है, जनहित में है तो यह कानूनी दिखावा किसलिए? मेरे ख्याल से वकीलों को मोटी फीस देने के लिए तो नहीं होना चाहिए।
कानून से यह प्रावधान ही खत्म कर देना चाहिए। वैसे यही हो यही रहा है। (भाजपा) सरकार जिसे चाहती है उसे बंद कर ही देती है और आम आदमी के लिए राहत मिलना लगभग असंभव है। तो दिखावा किसलिए। जब सरकार को बहुमत है, हर गलत का साथ मिल ही रहा है तो यह दिखावा भी बंद हो। गिरफ्तारी के समय ही आदेश सुना दिया जाए कि सरकार के कार्यकाल तक बंद रहेगा। डबल इंजन वाली एक सरकार ने शायद ऐसा कोई कानून बनाया भी है।

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