अर्नब गोस्वामी को हाईकोर्ट की फटकार..

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बांबे हाईकोर्ट ने रिपब्लिक टीवी से कहा – आपको अपनी सीमाएं मालूम होनी चाहिए, सीमा पार मत कीजिए
पीठ ने अधिवक्ता से कहा, अगर आपको सच्चाई का पता लगाने में इतनी ही दिलचस्पी है तो आपको अपराध प्रक्रिया संहिता को भी जानना चाहिए। कानून की जानकारी न होना कोई बहाना नहीं है।

-संजय कुमार सिंह।।
अर्नब गोस्वामी की स्वतंत्र पत्रकारिता का घड़ा अब भर गया लगता है। सरकारी संरक्षण में यह इतनी जल्दी हो पाएगा – इसपर आपको चाहे जितना संदेह हो, अभी तक जो हुआ है वह कम भी नहीं है। आप जानते हैं कि एजंडा पत्रकारिता की स्वतंत्रता का उपयोग करने वाले अर्नब चैनल मालिक तो हैं ही फर्जी टीआरपी का खेल में भी शामिल होने का शक है। मुंबई पुलिस के इस आशय के आरोप के बाद स्थितियां काफी बदली हैं। मंगलवार को अचानक दिल्ली लखनऊ के बीच ऐसा कुछ हुआ कि गोदी पत्रकारिता का मामला सीबीआई की गोदी में जाता लगने लगा है। इसलिए आखिर क्या होगा या मामला कितनी दूरी तक जाएगा – यह सब अनिश्चित होते हुए भी जो हो रहा है वह खबर है। गोदी मीडिया की खबर। लाइव लॉ के अनुसार, बांबे हाई कोर्ट ने रिपब्लिक टीवी के वकील से पूछा है – क्या जनता से पूछना कि किसे गिरफ्तार किया जाना चाहिए, खोजी पत्रकारिता है। आप जानते हैं कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद चैनल ने ट्वीटर पर हैशटैग कैमपेन अरेस्ट रिया चलाया था।
हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपंकर दत्ता और न्यायमूर्ति जीएस कुलकर्णी की पीठ ने याचिका की सुनवाई करते हुए रिपब्लिक टीवी द्वारा ट्विटर पर चलाए गए हैश टैग कंपेन ‘अरेस्ट रिया’ के बारे में चैनल की वकील मालविका त्रिवेदी से पूछा, “क्या यह खोजी पत्रकारिता का हिस्सा है?” इससे पहले चैनल ने अदालत को बताया था कि चैनल द्वारा सुशांत सिंह राजपूत की मौत से संबंधित तथ्यों का पता लगाने के लिए खोजी पत्रकारिता की जा रही थी। इस पर बेंच ने पूछा, जब मामले की जांच चल रही हो और यह तय किया जाना हो कि मौत हत्या है या आत्महत्या तब चैनल का यह कहना कि हत्या है, क्या यह खोजी पत्रकारिता है? पीठ ने चैनल की अधिवक्ता से कहा, “अपराध प्रक्रिया संहिता के तहत जांच के अधिकार पुलिस के पास हैं”।
मुंबई हाईकोर्ट में सुशांत सिंह राजपूत से संबंधित मामले में मीडिया ट्रायल की कई याचिकाओं की सुनवाई चल रही है। रिपब्लिक टीवी की तरफ से रिपोर्टिंग की आवश्यकता और वैधता का दावा किया गया पर अदालत ने रिपोर्टिंग के तरीके पर नामंजूरी जताई और कहा, “आत्महत्या की रिपोर्टिंग से संबंधित कुछ दिशा निर्देश हैं। कोई सनसनीखेज शीर्षक नहीं होना चाहिए। आपकी नजर में क्या मृतक का क्या कोई सम्मान नहीं है? यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। इस मामले में लाइव लॉ की दूसरी और बाद की एक खबर का शीर्षक है, अगर आप जांचकर्ता, अभियोजक और जज बन जाएंगी तो हम यहां किसलिए हैं? शाम साढ़े पांच बजे के बाद की इस खबर के अनुसार अदालत ने मीडिया ट्रायल पर चिन्ता जताई।
खबर के अनुसार, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपंकर दत्ता और न्यायमूर्ति जीएस कुलकर्णी की पीठ ने रिपबलिक टीवी की अधिवक्ता मालविका त्रिवेदी से पूछा, “अगर आप जांचकर्ता, अभियोजक और जज बन जाएंगी तो हम यहां किसलिए हैं?” पीठ ने अधिवक्ता से कहा, अगर आपको सच्चाई का पता लगाने में इतनी ही दिलचस्पी है तो आपको अपराध प्रक्रिया संहिता को भी जानना चाहिए। कानून की जानकारी न होना कोई बहाना नहीं है। अधिवक्ता का कहना था कि चैनल खोजी पत्रकारिता कर रहा था और जांच में खामियां उजागर कर रहा था। ऐसे अन्य तर्कों के जवाब में अदालत ने कहा, हम नहीं कह रहे हैं कि मीडिया का गला घोंट दिया जाना चाहिए। हमारी चिन्ता प्रोग्राम कोड के अनुपालन को लेकर है और आपकी रिपोर्टिंग से निर्धारित नियमों का उल्लंघन हुआ है कि नहीं। हम सिर्फ यह कह रहे हैं कि आपको अपनी सीमाएं मालूम होनी चाहिए और उसके अंदर आपको सब कुछ करने की इजाजत है। बेंच ने आगे कहा, सीमा पार मत कीजिए।
इससे पहले टीआरपी घोटाले में बांबे हाईकोर्ट मुंबई पुलिस से अर्नब गोस्वामी को समन भेजने के लिए कह चुका है। सोमवार को मुंबई पुलिस को टीआरपी की हेरा-फेरी के मामले में अर्नब गोस्वामी को आरोपी बनाने से पहले समन भेजने का निर्देश दिया था। जस्टिस एसएस शिंदे और जस्टिस एमएस कर्णिक की पीठ ने गोस्वामी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे द्वारा दिए गए बयान को दर्ज किया कि वह इस तरह का समन मिलने पर जांच में शामिल होंगे और सहयोग करेंगे।
पीठ ने एआरजी आउटलियर मीडिया लिमिटेड (रिपब्लिक एंड आर भारत चलाने वाली कंपनी) और अर्नब गोस्वामी द्वारा धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात और आपराधिक षड्यंत्र के अपराधों के लिए कांदिवली पुलिस स्टेशन में टीआरपी घोटाले के लिए दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने की मांग करने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया।

पीठ ने याचिका पर पांच नवंबर को दोपहर तीन बजे से अंतिम सुनवाई शुरू करने पर सहमति जताई है। कोर्ट ने मुंबई पुलिस को 4 नवंबर को सीलबंद कवर में अन्वेषण (इन्वेस्टिगेशन) के दस्तावेज पेश करने का भी निर्देश दिया। हालांकि साल्वे ने गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा देने की मांग की। इस पर पीठ ने कहा कि इस समय इस तरह का आदेश पारित करना मुश्किल है जबकि अभी तक गोस्वामी को अभियुक्त के रूप में नामित नहीं किया गया है। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, महाराष्ट्र राज्य और मुंबई पुलिस की ओर से पेश हुए। उन्होंने सहमति व्यक्त की कि गोस्वामी को पहले समन जारी किया जाएगा। हालांकि उन्होंने कहा कि वह कोई वचन नहीं दे रहे हैं कि गोस्वामी को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।
हरीश साल्वे ने तर्क दिया कि वर्तमान एफआईआर महाराष्ट्र प्रशासन द्वारा रिपब्लिक टीवी की पत्रकारिता की स्वतंत्रता को टारगेट करने और दबाने के लिए की गई कार्रवाई की एक नई कड़ी है। सिब्बल ने कहा कि याचिका अपरिपक्व है और शुरुआती अवस्था में जांच में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि आपराधिक सामग्री होने पर आपराधिक जांच में दुर्भावना की कोई प्रासंगिकता नहीं है। सिब्बल ने यह भी कहा कि गोस्वामी केवल ‘विशेष विशेषाधिकार’ के हकदार नहीं हैं, क्योंकि वह एक पत्रकार हैं और उन्हें गिरफ्तारी के लिए आशंका होने पर अग्रिम जमानत लेने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 के तहत उपाय का लाभ उठाना चाहिए।
इससे पहले, याचिकाकर्ताओं ने सीधे याचिका के साथ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि, शीर्ष अदालत के न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया और याचिकाकर्ताओं को बांबे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाने के लिए कहा। याचिका में गोस्वामी ने कहा कि प्राथमिकी रिपब्लिक टीवी के खिलाफ “राजनीतिक साजिश” का एक हिस्सा थी और मुंबई पुलिस ने उसके खिलाफ दुर्भावना के तहत काम किया। “यह सम्मानजनक रूप से प्रस्तुत किया गया है कि मुंबई पुलिस ने रिपब्लिक टीवी और आर भारत के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण काम किया।
आप जानते हैं कि 8 अक्तूबर को मुंबई पुलिस ने प्रेस को बताया था कि उसने टीआरपी हेरफेर की धोखाधड़ी के बारे में पता लगाया है। रिपब्लिक टीवी और दो मराठी चैनलों को एफआईआर में आरोपी बनाया गया है। ऐसे लोगों को शामिल किया गया है जो हमेशा साक्षर नहीं थे, उनके पास एक अंग्रेजी समाचार चैनल था; पुलिस ने कहा कि उन्हें हर महीने लगभग 400-500 रुपये का भुगतान किया जाता था। पुलिस ने कहा कि उन्होंने हंसा रिसर्च ग्रुप प्राइवेट लिमिटेड से जुड़े एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया, जो प्रसारण दर्शकों की सहायता कर रहा था

About Post Author

Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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