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जेसिंडा अर्डर्न ने रचा इतिहास..

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बीते कुछ महीनों से जब पूरी दुनिया में कोरोना के कारण खौफ का साया पसरा हुआ है, और अलग-अलग देशों की सरकारें इस कठिन दौर से निकलने की जद्दोजहद में लगी हुई हैं, तब न्यूजीलैंड में बाकी देशों के मुकाबले हालात काफी बेहतर हैं। यहां कोरोना के गिने-चुने मामले आए हैं, कुछ समय के लिए तो देश पूरी तरह से कोरोना मुक्त हो गया था। कोरोना से इतने बेहतरीन तरीके से निपटने का श्रेय प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डर्न को जाता है, जिन्होंने समय रहते एहतियाती कदम उठाए। लोगों को भरोसे में लेकर, उनके साथ कोरोना का मुकाबला करने की शुरुआत की।

लॉकडाउन जैसी पहल उन्होंने भी की, लेकिन जनता को वो दृश्य भी याद है, जब वे लॉकडाउन खुलने पर अपने साथी के साथ वे पसंदीदा रेस्तरां में भोजन के लिए पहुंची और बाकायदा अपनी बारी का इंतजार किया, लेकिन शारीरिक दूरी के नियम के चलते उन्हें रेस्तरां में जगह नहीं मिली तो वे किसी सामान्य ग्राहक की तरह लौट भी गईं। एक प्रधानमंत्री की यह सहजता जनता को बेहद पसंद आई और ट्विटर पर इसका काफी जिक्र भी हुआ। कोरोना काल में जेसिंडा अर्डर्न की लोकप्रियता न्यूजीलैंड में और बढ़ गई, इसका प्रमाण है हाल ही में हुए चुनाव में उन्हें मिली भारी जीत। न्यूजीलैंड में सितंबर में ही चुनाव होने थे, लेकिन महामारी के कारण एक महीने टाल कर अभी कराया गया।

इस बार चुनाव में कोरोना की मुख्य मुद्दा बना। जेसिंडा के सामने नेशनल पार्टी की नेता जूडिथ कॉलिंस थीं। लेकिन मतदाताओं ने जेसिंडा अर्डर्न पर अभूतपूर्व भरोसा दिखाया। इन चुनावों में पूर्ण बहुमत हासिल कर जेसिंडा अर्डर्न ने इतिहास रच दिया। उनकी सेंटर-लेफ्ट लेबर पार्टी को 87 प्रतिशत वोट में से 48.9 प्रतिशत वोट मिले। मुख्य विपक्षी दल नेशनल पार्टी को सिर्फ 27 प्रतिशत वोट मिले जो 2002 के बाद से उसका सबसे खराब प्रदर्शन है। गौरतलब है कि न्यूजीलैंड में 1996 में लागू हुई नई संसदीय प्रणाली मिक्स्ड मेंबर प्रोपर्शनल रिप्रेजेंटेटिव (एमएमपी) के बाद से किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत हासिल नहीं हुआ है।

न्यूजीलैंड में हर तीन साल में आम चुनाव होते हैं। एमएमपी चुनाव व्यवस्था के तहत मतदाताओं से अपनी पसंदीदा पार्टी और संसदीय सीट के प्रतिनिधि के लिए अलग-अलग वोट देने के लिए कहा जाता है। संसद तक पहुंचने के लिए एक पार्टी को कम से कम पांच प्रतिशत पार्टी वोट या फिर संसदीय सीट जीतनी होती है। माओरी समुदाय के उम्मीदवारों के लिए भी सीटें सुरक्षित होती हैं। सरकार बनाने के लिए 120 में से 61 सीटें जीतना अनिवार्य होता है। एमएमपी लागू होने के बाद से कोई भी पार्टी अकेले अपने दम पर सरकार नहीं बना सकी और गठबंधन सरकार गठित करनी पड़ी। 2017 के चुनावों में नेशनल पार्टी को सबसे ज़्यादा सीटें मिलीं थीं लेकिन वो सरकार नहीं बना सकी थी। तब अर्डर्न की लेबर पार्टी ने ग्रीन पार्टी और न्यूजीलैंड फर्स्ट पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाई थी। 

पिछली बार संसदीय चुनाव 23 सितंबर, 2017 को हुआ था। तीन साल बाद अभी 6 सितंबर को संसद को भंग कर दी गई, ताकि नए सिरे से चुनाव के लिए राह बने। इस चुनाव में भी विश्लेषकों को उम्मीद थी कि फिर गठबंधन सरकार ही बनेगी। लेकिन लीक से हटकर राजनीति करने वाली जेसिंडा अर्डर्न ने स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया। अर्डर्न ने अपने चुनाव अभियान में पर्यावरण संबंधी नीतियां लाने, पिछड़े स्कूलों के लिए अधिक फंड मुहैया कराने और अधिक आय वाले लोगों पर अतिरिक्त कर लगाने का वादा किया था, जिस पर लोगों ने मुहर लगाई।

जीत के बाद अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए अर्डर्न ने कहा, ‘न्यूजीलैंड ने लेबर पार्टी को पचास सालों में सबसे बड़ा समर्थन दिया है। हम आपके समर्थन को हल्के में नहीं लेंगे। मैं ये वादा करती हूं कि हमारी पार्टी न्यूजीलैंड के हर नागरिक के लिए काम करेगी।’ आने वाले तीन साल जेसिंडा को फिर कई कसौटियों पर खुद को साबित करना होगा, क्योंकि उत्तर कोरोना काल में दुनिया के राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक हालात काफी बदल गए हैं।

हालांकि दक्षिणपंथी, पूंजीवादी ताकतें पहले की तरह ही सक्रिय हैं और धार्मिक कट्टरता भी बढ़ ही रही है। इसका ताजा उदाहरण फ्रांस में शिक्षक का सिर कलम करने की घटना के रूप में देखने मिला है। न्यूजीलैंड अर्डर्न के पिछले कार्यकाल में भयावह आतंकी हमले का साक्षी रहा है, लेकिन उसके बाद पीड़ितों के बीच जिस तरह जेसिंडा हिजाब पहनकर गईं और उन्हें गले लगाकर उनका दर्द साझा किया, उसने दुनिया भर के नेताओं को संदेश दिया कि किस तरह वास्तव में कट्टरपंथ से निपटा जा सकता है।

जेसिंडा अर्डर्न इससे पहले प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने के कुछ दिनों बाद ही मां बनने के कारण भी चर्चा में आई थीं। उन्होंने दुनिया को यह दिखा दिया था कि किस तरह एक कामकाजी महिला या राजनीति में उच्च पद संभालते हुए कोई महिला अपने मां बनने का हक और फर्ज दोनों पूरा कर सकती है। अपनी चार महीने की बेटी के साथ वे न्यूयार्क में संरा की आम सभा में शामिल भी हुईं थीं। एक युवा के रूप में जेसिंडा देश की लेफ्ट पार्टियों से जुड़ी थीं और महज 28 साल की उम्र में उन्होंने संसद में प्रवेश कर लिया था।

बकौल जेसिंडा भूख से संघर्ष करते बच्चे और बिना जूते के उनके पांव ने उन्हें राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया। और उनकी अब तक की राजनीति को देखकर कहा जा सकता है कि वे अपनी प्रेरणा के अनुरूप दुनिया में छाई इस गैरबराबरी को दूर करने में लगी हैं। पूंजीपतियों के हितों से संचालित आज की राजनीति में जेसिंडा जैसे और नेताओं की दुनिया को जरूरत है।

(देशबन्धु)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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