वो कौन है जो आपको राम या मुहम्मद के नाम पर हत्या के लिए उकसाता है?

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-श्याम मीरा सिंह।।

“लिंचिंग गलत है, लिंचिंग जायज नहीं ठहराई जा सकती, हिन्दू धर्म में तो शांति और मोहब्बत का ही संदेश है, हमारे राम ने कहा है किसी से बैर मत करो। पर बीफ ख़ाकर हमारे सेंटीमेंट क्यों हर्ट किए जाते हैं। हिन्दू धर्म में गाय को माता माना गया है, कोई हमारी माँ से कुछ कहेगा तो हम चुप थोड़े ही रहेंगे, कुछ तो रिएक्शन होगा ही। Lynching करना सही नहीं है पर बीफ खाना भी कहाँ सही है? हमारी गाय माता को क्यों छेड़ते हैं?”

ये थी संघी जिंदगी। ऊपर वाले कुतर्कों से आप किसी भी दकियानूसी संघी को पहचान सकते हैं। लेकिन अगर इसी तरह किसी मुसंघी या AMIM छाप कठमुल्ले की पहचान करनी हो तो ऊपर वाले कुतर्क को फ्रांस वाली घटना से रिवर्स कर दीजिए, राम की जगह मोहम्मद लिख दो, हिन्दू धर्म की जगह इस्लाम लिख दो, गाय की जगह कार्टून लिख लो। फिर जो कुतर्क सामने आएगा उससे आप एक मुसंघी को आराम से पहचान सकते हैं। जैसे–
“हत्या गलत है, हत्या जायज नहीं ठहराई जा सकती। इस्लाम धर्म में तो शांति और मोहब्बत का संदेश है, हमारे नबी ने कहा है किसी से बैर मत करो, पर हमारे मोहम्मद साहब का कार्टून बनाना कितना जायज है? इस्लाम में मोहम्मद साहब का फोटो बनाना हराम है तो लोग क्यों हमें छेड़ते हैं। कोई हमारे नबी की शान में कुछ कहेगा तो हम चुप थोड़े ही रहेंगे, कुछ तो रिएक्शन होगा ही। हत्या करना सही नहीं है, लेकिन हमारे सेंटिमेंट हर्ट करना कितना सही है?”

दोनों ही मामलों में आपने देखा, कट्टरपंथी चाहे इस्लामिस्ट हों चाहे हिंदुत्ववादी हों, दोनों के लिए ही एक आदमी की हत्या, एक आदमी की लिंचिंग मुख्य मसला नहीं है, मुख्य मसला उनका धार्मिक सेंटीमेंट है। उनकी चिंता का Main ऑब्जेक्ट गाय है, एक कार्टून है एक आदमी की जान चले जाना नहीं है।

धार्मिक आजादी सबके लिए होनी चाहिए, सब अपने धर्म और विश्वास मानने के लिए स्वतंत्र होने चाहिए, लेकिन इसके दूसरी तरफ फ्रीडम ऑफ स्पीच और एक्सप्रेशन भी है। जैसे आपकी धार्मिक आजादी है, वैसे ही उसपर मत रखने की स्वतंत्रता बाकी सभी नागरिकों को भी है। राम मेरे लिए आस्था के विषय हो सकते हैं। मैं राम का अंधभक्त हो सकता हूँ लेकिन राम पर अपना मत रखने के लिए बाकी नागरिक पूरी तरह से स्वतंत्र हैं। गाय, राम, या मोहम्मद मेरे लिए आस्था के विषय हो सकते हैं। गाय, राम, मोहम्मद पर विपरीत मत रखने वाले से मुझे आपत्ति हो सकती है, लेकिन आपत्ति होने के कारण मैं उनके प्रति हिंसा करने का अधिकारी नहीं हो सकता।

वैसे धार्मिक मामलों को छेड़ने से बचना चाहिए, लेकिन धर्म को छेड़े बगैर उसमें सुधार भी सम्भव नहीं है, चारों और बढ़ती धार्मिक कट्टरपंथ के माहौल में यही कहूंगा कि धर्म को बहुत अधिक छेड़ने से बचना चाहिए चूंकि मालूम नहीं कब किसी मूर्ख की भावनाएं आहत हो जाएं। लेकिन ये एक सलाह भर हो सकती है, ये एक अपेक्षा हो सकती है कि लोग धार्मिक मामलों को कम ही छेड़ें, लेकिन ये एक नियम नहीं हो सकता। किसी भी कट्टरपंथी को धर्म के नाम पर किसी ऐसे व्यक्ति को नोच लेने की आजादी नहीं है जो उसके धर्म के प्रति आस्था नहीं रखता। धार्मिक सेंटीमेंट हर्ट होने की स्थिति में उपचार के कई उपाय हैं, यदि कोई आपके धर्म के बारे में कुछ गलत कह रहा है तो अपने धर्म के सबसे अच्छे विचार उसके सामने रखकर उससे तर्क करिए। अच्छे आर्टिकल लिखिए, धार्मिक उलेमाओं और पुरोहितों को अपने सबसे अच्छे उपदेश जनता के सामने रखने चाहिए ताकि आपका आलोचक आपके धर्म के आगे छोटा पड़ जाए। अगर कोई आपके धर्म को चिढ़ाने जैसा कुछ करता है तो कानून के अंदर जो उपचार हैं वे अपनाने चाहिए, FIR करानी चाहिए। लेकिन अगर ऐसी स्थिति में कहीं किसी की हत्या कर दी गई है तब वहां खुलकर हत्या के खिलाफ बोला जाना चाहिए, जहां लिंचिंग हुई हो वहां लिंचिंग के विरोध में खुलकर आना चाहिए न कि गाय और कार्टून के समर्थन में।

कट्टरपंथ और उदारवाद में यही एक अंतर है, कट्टरपंथ अपनी हिंसाओं के समर्थन के लिए धार्मिक आजादी की आड़ लेता है, उदारवाद हिंसा का विरोध करते हुए धार्मिक आजादी की बात करता है हिंसा होने की स्थिति में उदारवाद मानवता के पक्ष में खड़ा होता है, इंसानियत के पक्ष में खड़ा होता है न कि धार्मिक विश्वासों के।

फ्रांस मामले में कट्टरपंथ और उदारवाद के बीच का अंतर साफ देखा जा सकता है यहां लोगों के लिए कार्टून मुख्य मुद्दा है, एक आदमी की जघन्य हत्या मुद्दा नहीं है। हत्या के लिए सिर्फ इतना लिखा जा रहा है कि “हत्या गलत है, लेकिन…………”। “लेकिन” के बाद जो शुरू होता है वही धार्मिक चरमपंथ है। हत्या जैसे जघन्य अपराध के लिए कोई किंतु, परन्तु,, If, but, though, although नहीं चल सकता। लेकिन यहां तो हत्या के विरोध में केवल 4 शब्द होते हैं कि “हत्या जायज नहीं है लेकिन”… और हत्यारे के समर्थन में एक पूरी किताब लिखी जाती है।
यही दोगलापन बाकी धर्मों में कट्टरपंथ के जन्म का कारण देता है। ये एक साइकल है कभी इस्लामिस्ट कुतर्क करते हैं, उसके रिएक्शन में हिंदुत्ववादी कुतर्क करते हैं, जब हिंदुत्ववादी कुतर्क करते हैं तो इस्लामिस्ट भी सेम कुतर्क अपनाते हैं। इन कुतर्कों का कोई अंत नहीं है, न पहले था, न आगे है, बस एक चीज इसे मिनिमाइज कर सकती है वह ये है कि सभी धर्मों के प्रबुद्ध नागरिक, पढ़े लिखे लोग, यूनिवर्सिटियों के छात्र, किसी भी हाल में “उदारवादी” विचारों को न छोड़ें। हर हाल में सेक्युलिरिज्म, संविधानवाद, लोकतंत्र, धार्मिक आजादी और फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन के समर्थन में खड़े रहें।

प्रबुद्धजनों का व्यवहार संविधान और लोकतंत्र के प्रति अपनी आस्था के अनुसार तय होना चाहिए न कि इस विधि से तय होना चाहिए कि बाकी धर्म के लोग उनके साथ कैसे व्यवहार करते हैं। अगर कोई इस्लामिस्ट मुझे गाली देकर निकल जाए, मेरे धर्म के बारे में कुछ कह जाए, मुझे संघी कह जाए, इसका अर्थ ये नहीं है कि मैं उनकी धार्मिक आजादी, उनके नागरिक अधिकारों का दुश्मन बन जाऊंगा। मैं हर हाल में मुस्लिमों के नागरिक अधिकारों, उनकी धार्मिक स्वतंत्रता, फ्रीडम ऑफ स्पीच के लिए खड़ा रहूंगा। यही अधिकार इस देश के सभी धर्मों, सभी जातियों के लोगों के लिए चाहूंगा। इसमें कोई If, No, But, Though, किंतु, परन्तु पसन्द नहीं करूँगा। इसी प्रतिबद्धता के साथ सभी धर्मों के प्रबुद्धजनों को खड़े रहना पड़ेगा, तभी कट्टरपंथ को कुछ हद तक मिनिमाइज किया जा सकता है, अन्यथा धार्मिक कट्टरता लाखों को नागरिकों को लील जाएगी जैसे अभी तक लीलती रही है वह चाहे ईसाई धर्म हो, हिन्दू धर्म हो, चाहे इस्लाम हो।

जैसे गाय के लिए एक इंसान की हत्या कर देना गलत है, वैसे ही एक कार्टून के लिए आदमी की हत्या कर देना गलत है। अपनी अपनी कौम और इंसानियत से मोहब्बत करने वालों को हर हाल में इसके खिलाफ खड़े रहना पड़ेगा। इस राह में थोड़ी मुश्किलें हैं, तमाम आलोचनाएं और गालियां हैं, लांछन हैं, बहिष्कार है, लेकिन अपनी कौम, अपने महजब, अपने ईश्वर, अपने देश से प्यार जताने का यही एक तरीका है कि न्याय के लिए खड़े रहिए। किसी ने सही कहा भी है “बड़ा आसान है कम्युनल हो जाना, बड़ा मुश्किल है सेक्युलर बने रहना”।

अपनी अपनी कौम से प्यार करने वालों से यही कहा जा सकता है, दोस्त, पहले हत्याएं रोक लो, हिंसा रोक लो, धर्म अपने आप खुद ही बच जाएगा। आप ही तो कहते हैं भगवान राम बैर करना नहीं सिखाते, आप ही तो कहते हैं मोहम्मद, बैर करना नहीं सिखाते। फिर कौन है जो आपसे कह रहा है कि राम के नाम पर, मोहम्मद के नाम पर हत्या कर दो?

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