बांग्लादेश से सीखना चाहिए न कि चिढ़ना..

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-सुनील कुमार।।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अभी एक अनुमान बताया है कि जिस रफ्तार से बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति जीडीपी बढ़ रही है, और भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी की जो बदहाली चल रही है, जल्द ही बांग्लादेश भारत से बेहतर अर्थव्यवस्था बन सकता है, इस एक पैमाने पर वह आगे निकल सकता है। इस बात को लेकर कई अर्थशास्त्री सहमत हैं कि 1971 में पैदा हुए बांग्लादेश ने भारी दिक्कतें, फौजी हुकूमत, राजनीतिक अस्थिरता, धार्मिक कट्टरता, और प्राकृतिक विपदाओं को झेलते हुए भी धीमी लेकिन निरंतर गति से जैसी तरक्की की है, वह अहमियत रखती है, और बांग्लादेश दुनिया के कारोबारियों में एक भरोसेमंद जगह बन चुका है। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान के पिछले छह बरसों को लेकर राहुल गांधी ने आईएमएफ के ताजा अनुमान का हवाला देते हुए लिखा है कि भाजपा सरकार के पिछले छह बरस के नफरत भरे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की सबसे ठोस उपलब्धि यही रही है कि बांग्लादेश भी भारत को पीछे छोडऩे वाला है।

किसी तर्क के रूप में कोई मिसाल देना खतरनाक होता है क्योंकि लोग तुरंत ही इस पर उतर आते हैं कि भारत और बांग्लादेश में कौन-कौन से फर्क हैं जिनकी वजह से यह मिसाल ही नाजायज है। किसी तर्क को पटरी से उतारना हो तो ही कोई मिसाल देनी चाहिए। लेकिन अब एक अंतरराष्ट्रीय संगठन ने अगर एक पैमाने पर भारत, बांग्लादेश, और नेपाल सबके आंकड़े दिए हैं तो लोग तुलना कैसे न करें? मिसाल कैसे न दें? हिन्दुस्तान में आज वह पीढ़ी अभी रिटायर हो रही है जिसने अपने कॉलेज के दिनों में बांग्लादेश से आए हुए शरणार्थियों के गुजारे के लिए इंदिरा सरकार द्वारा लागू किए गए शरणार्थी टैक्स का पैसा हर सिनेमा टिकट पर दिया था। बांग्लादेश 1947 के पहले तक अविभाजित भारत का ही एक हिस्सा था, जो विभाजन में पहले पाकिस्तान में जाकर पूर्वी पाकिस्तान बना, और फिर इंदिरा गांधी के हौसले से उस हिस्से को पाकिस्तान से तोडक़र बांग्लादेश बनाया गया। अब भारत के ही बनाए हुए ऐसे बांग्लादेश में महज इंसानों की मेहनत से अगर अर्थव्यवस्था इस तरह बेहतर होती चली जा रही है तो फिर तुलना के लिए इस पड़ोसी से बेहतर और कौन सा देश हो सकता है? फिर बांग्लादेश ने यह मिसाल भी सामने रखी है कि अपनी महिलाओं को हुनर सिखाकर, कामकाज में लगाकर किस तरह पूरी दुनिया के बड़े-बड़े फैशन ब्रांड के कपड़े बांग्लादेश में सिले जा सकते हैं। अपनी मानव शक्ति का ऐसा इस्तेमाल करके इस देश ने अगर एक मिसाल सामने रखी है, तो हिन्दुस्तान में झंडा-डंडा थमाकर फर्जी मुद्दों पर झोंक दी गई कई पीढिय़ों के बारे में सोचना चाहिए कि उनसे देश की एकता के टुकड़े-टुकड़े होने के अलावा और क्या हासिल हो रहा है?
बात राहुल गांधी ने कही है, या कि एक अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संगठन से आई है, या कि पड़ोस के एक ऐसे गरीब और छोटे देश की है जिसके साथ ‘गर्व से कहो हम भारतीय’ लोग अपनी तुलना नहीं चाहते हैं। इसलिए आज यह हिन्दुस्तान कश्मीर से 370 के खात्मे, राम मंदिर बनने, बाबरी मस्जिद केस में सबके रिहा हो जाने की खुशी में ऐसा डूबा है कि पड़ोस का गरीब मेहनत करते-करते कब उससे आगे निकल गया, यह उसे न पता लगा, और न ही वह इस हकीकत को देखना ही चाहता है। दरअसल किसी भी देश-प्रदेश की सरकार के लिए आर्थिक आंकड़े सबसे बड़ी चुनौती होते हैं, और सबसे बड़ी कसौटी भी होते हैं। ये आंकड़े अगर ईमानदारी से जुटाए जाते हैं, तो ये धोखा देने के काम नहीं आते, और सवाल बनकर मुंह चिढ़ाते हैं। ऐसे में आज भारत में किसी भी किस्म के आर्थिक सर्वे, आर्थिक विश्लेषण, और उनसे जुड़े सवालों से मुंह चुराया जा रहा है। असली आंकड़े झंडों-डंडों से नहीं डरते, उन्हें भीड़ पीट-पीटकर मार भी नहीं सकती, वे न थाली-ताली से खुश होते हैं, और न ही दीयों की लौ से डरकर भागते हैं। अगर कोई चीज सबसे स्थाई होती है, तो वह असल और सच्चे आंकड़े होते हैं। ऐसे में बांग्लादेश की कामयाबी को चुनौती की तरह लेने के बजाय, उससे सबक लेने के बजाय, अपनी नाकामयाबी की लकीर छोटी करने के बजाय बांग्लादेश को एक मिसाल के रूप में भी खारिज कर देना अधिक आसान समझा जा रहा है। हकीकत से इस हद तक मुंह चुराकर दुनिया में कोई भी तरक्की नहीं कर सकते। आज बांग्लादेश में एक-एक महिला लाखों की सिलाई मशीनों पर दुनिया के महंगे ब्रांड के कपड़े सिलकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक साख बना रही है, और हिन्दुस्तान ऐसी संभावनाओं को अनदेखा करते हुए अपने लोगों को नारों और कीर्तन में झोंक रहा है। यह सिलसिला अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों में जारी नहीं रह सकता, क्योंकि उनके पास इस देश में दबाए गए, छुपाए गए आंकड़ों से परे भी जानकारियां हैं।

हिन्दुस्तान आज जिस आर्थिक बदहाली से गुजर रहा है, उससे उबरने का रास्ता मुंह छिपाने से होकर नहीं गुजरता। उससे उबरना तभी हो सकता है जब हकीकत का सामना किया जाए, समस्या को माना जाए, और उन बातों के बारे में भी सोचा जाए जो तरक्की के रास्तों पर रोड़ा हैं। एक देश जो अपने नामौजूद इतिहास के झूठे गौरव के नशे में मदमस्त रखा जा रहा है, वैसे देश का पिछडऩा तय है। और लोग हैं कि भूखे पेट उन्हें ऐसे झूठे गौरव का नशा और अधिक चढ़ रहा है।

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