सरकारी घोषणाओं से गरीब गायब..

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भारत में लॉकडाउन का दौर खत्म हो चुका है और लगभग सभी चीजें अनलॉक हो गई हैं। सिनेमाघर, स्कूल-कालेज आदि बंद हैं, वहां भी कुछ समय में चहल-पहल देखने मिल जाएगी। कोरोना तो अपनी रफ्तार से बढ़ रहा है, हम अब भी अमेरिका से थोड़ा पीछे हैं, लेकिन दुनिया में दूसरे नंबर के कोरोना बीमार देश बने हुए हैं। स्वास्थ्य सुविधाएं पहले से अधिक लचर रूप में देखने मिल रही हैं। और इन सबके बीच अर्थव्यवस्था भी खस्ताहाल ही है।

हालांकि अब कारखानों, दुकानों में काम शुरु हो गया है, सड़क पर काम से आते-जाते लोग नजर आते हैं, ठेले-खोमचे-गुमटियों में फिर ग्राहक आने लगे हैं, तो यह सवाल बार-बार मन में उठता है कि आखिर लॉकडाउन करने का मतलब क्या था। क्यों लाखों मजदूरों को अकल्पनीय तकलीफें झेलने के लिए छोड़ दिया गया। क्यों करोड़ों नौकरियों को दांव पर लगाया गया और क्यों पूरे देश के भविष्य के साथ ऐसा खिलवाड़ सरकार ने किया। अब महामारी बढऩे के बावजूद अर्थव्यवस्था संभालने की खातिर सब कुछ खोला जा रहा है, तो क्या इसके लिए सरकार पर कोई वैसे ही जुर्माना लगना चाहिए, जैसा उन मजबूर लोगों पर लगाया गया, जो आर्थिक विवशता के कारण लॉकडाउन में दुकान खोलने या बाहर निकलने मजबूर हुए थे। खैर, सरकार तो पूरे देश पर अपना मालिकाना हक समझती है, इसलिए जैसा चाहे, वैसा नाच जनता को नचा रही है। 21 दिन में कोरोना से जंग जीत जाएंगे, जैसे महाभारतीय संवाद अब गुम हो गए हैं।

पांच लाख करोड़ डालर की अर्थव्यवस्था बनाने के दावे भी चुपके से दबा दिए गए हैं। अब आत्मनिर्भर भारत का नया तराना गूंजायमान है। वल्र्ड बैंक से लेकर रिजर्व बैंक तक सब जीडीपी के माइनस में जाने के अनुमान बतला चुके हैं। लेकिन लोगों को अच्छे दिनों का अहसास कराना है, और त्योहारी मौसम भी कुछ दिनों में शुरु होने वाला है, लिहाजा अब सरकार की घोषणाएं भी आतिशबाजियों जैसी हैं। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने सरकारी कर्मचारियों को त्योहार का तोहफा पहले ही दे दिया है।

सरकार एलटीसी कैश वाउचर स्कीम के तहत, सरकारी कर्मचारियों को छुट्टियों के लिए नकद राशि का विकल्प दे रही है। बता दें कि हर चार साल में सरकार अपने कर्मचारियों को उनकी पसंद के किसी गंतव्य की यात्रा के लिए एलटीसी देती है। इसके अलावा एक एलटीसी उन्हें उनके गृह राज्य की यात्रा के लिए दिया जाता है। इस योजना के तहत अगर सरकारी कर्मचारी कम से कम 12 फीसदी जीएसटी कलेक्ट करने वाला कोई भी सामान खरीदते हैं तो उन्हें उनकी छुट्टियों के एवज में मिलने वाली रकम और तीन बार के टिकट के किराये जितनी नकदी लेने का विकल्प मिलेगा। 

माना जा रहा है कि सरकार की कर्मचारियों के लिए इस योजना का फायदा बाजार को मिलेगा। इससे 31 मार्च 2021 तक 36,000 करोड़ रुपये तक की उपभोक्ता मांग आ सकती है। एलटीसी के लिए नकद पर सरकार का खर्च 5,675 करोड़ रुपये होगा। इसके अलावा सार्वजनिक उपक्रमों और बैंकों को 1,900 करोड़ रुपये दिए जाएंगे।

केंद्र सरकार ने अपने कर्मचारियों के लिए स्पेशल फेस्टिवल एडवांस स्कीम की घोषणा की है। इसके तहत सभी कर्मचारियों को 10 हजार रुपये दिए जाएंगे। इसे 31 मार्च 2021 तक खर्च करना होगा। यह ब्याज मुक्त एडवांस है। उम्मीद है कि इससे 8,000 करोड़ रुपए तक की मांग बाजार में बनेगी। सरकार की इन घोषणाओं से सरकारी कर्मचारियों की दीवाली तो अच्छे से मन जाएगी, मांग बढऩे से व्यापारियों को भी फायदा होगा। इससे देश की अर्थव्यवस्था में भी थोड़ी रौनक नजर आ सकती है। लेकिन क्या इस रौनक में गरीब, निम्नवर्ग के लोगों की भी कोई हिस्सेदारी होगी। किसानों, मजदूरों की दीवाली क्या इन योजनाओं से रौशन होगी।

सरकारी कर्मचारियों के साथ ही सरकार ने राज्यों के लिए भी बड़ी घोषणा की है। जिसके मुताबिक 12 हजार करोड़ रुपयों का ब्याज मुक्त कर्ज 50 सालों के लिए दिया जाएगा, जिससे आर्थिक गतिविधियां बढें़, ये राशि पूंजीगत परियोजनाओं पर खर्च होगी। यह कर्ज राज्यों की उधारी सीमा से अलग होगा। 50 साल बाद राज्यों को इसका भुगतान एक बार में करना होगा। इस राशि का उपयोग राज्य ठेकेदारों और आपूर्तिकर्ताओं के लिए बिलों के लिए कर सकते हैं, लेकिन पूरी राशि का भुगतान 31 मार्च 2021 से पहले करना होगा। इस तरह सरकार एक बार फिर पूंजीपतियों की राहत का इंतजाम करने में लग गई। जब कोरोना से त्रस्त देश राहत पैकेज की उम्मीद कर रहा था, तब भी सरकार ने ऐसी ही भारी-भरकम घोषणाएं की थीं। उसमें भविष्य के लिए अच्छे इंतजाम थे, लेकिन केवल उद्योगपतियों के लिए और अब भी यही आलम है।

आम जनता तो अपने लिए लाखों-करोड़ों के पैकेज नहीं चाहती, वह चाहती है कि थोड़ी महंगाई कम हो जाए, बिजली-पानी-स्वास्थ्य की सुविधाएं आसानी से उसे उपलब्ध हो जाएं, बैंकों में उसकी राशि सुरक्षित रहे, उस पर कर्ज का बोझ कम हो, बस इसी में उसकी दीवाली मन जाएगी। लेकिन सरकार यह राहत उसे नहीं दे पा रही।

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