मोदी, मीडिया औऱ मार्केटिंग..

Desk

-अपूर्व भारद्वाज।।

आप मोदी जी की लाख बुराई कर ले लेकिन उनकी एक बात का मैं कायल हूँ वो हर बात को एक इवेंट बना देते है. हर चीज की गजब मार्केटिंग करते है. खुद की ब्रांड इमेज के लिए इतना सचेत राजनेता पूरे विश्व मे शायद ही होगा. उनकी ब्राण्ड इक्विटी इतनी हाई है कि वो अपने ब्रांड को दिन में खुद दस बार हेमर करते है और उसमें उनके समर्थक और विरोधी बराबर से अपना योगदान देते है. वो ऐसा मायाजाल रचते है की सारे कैमरे उन्ही पर फोकस रहते है. उनसे बड़ा ब्रांड गुरु शायद ही आज विज्ञापन जगत में होगा लेकिन ब्राण्ड लॉयल्टी और इंट्रीगिटी दो अलग अलग चीज है अगर मोदी इसकी उपेक्षा करेंगे तो अपनी बरसो पुरानी मेहनत पर पानी फेर सकते है.

मिसाल के तौर पर विज्ञान और रिसर्च को ही ले लीजिए मोदी के अवैज्ञानिक रवैये के कारण आज पूरे विज्ञान विश्व में भारत की छवि खराब गयी है उन्होंने इसे मजाक बना दिया है और विज्ञान ब्रान्ड अम्बेसडर बनने के चक्कर में मोदी जी ने खुद कई बार अपनी जगहसाई करवा के एक भद्दी मिसाल पेश की है मोदी कभी गटर से गैस बनाते है कभी बादलों से राडार को छुपाते है कभी हवा से ऑक्सीजन और नमी से पानी बनाए पाये जाते है उन्हें औऱ उनके समर्थकों को लगता है कि ऐसा करके वो लोगो का ध्यान असली मुद्दों से भटकाते है लेकिन वो मार्कर्टिंग के मूल सिद्धांत को भुल जाते है. संस्कृत में एक कहावत है अति सर्वत्र वर्जयते अर्थात किसी बात की अति हमेशा बुरी होती है मोदी आज वहीँ गलती कर रहे है.

शायद किसी ने ब्रांड हेमरिंग की गलत व्याख्या उन्हें पढ़ा दी है खुद को लार्जर देंन लाइफ बनाने के चक्कर मे वो स्मॉलर देन अदर होते जा रहे है उन्हें ब्रान्ड इंट्रीगिटी बनानी है तो लाल बहादुर शास्त्री जी सीखना चाहिए युद्ध केदौरान देश में अन्न संकट के समय उन्होंने खुद एक समय खाकर देखा फिर परिवार को एक समय खाना खिलाया तब जाकर उन्होंने पूरे देश के लिए एक समय का अन्न त्यागने की अपील की थी यह बात बहुत दिन बाद सार्वजिनक हुई थी और उसके बाद शास्त्री जी की जो ब्रान्ड इंट्रीगिटी बनी थी वो आज तक कायम है मोदी हर जगह मीडिया,मार्केटिंग और सेल्फ ब्रांडिग से रिलायंस जैसा बड़ा ब्रांड तो बन सकते है लेकिन टाटा जैसा विश्वास शायद ही हासिल कर पाए .

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