मानसिक स्वास्थ्य कैसे ठीक रहे जब तमाम देश अस्वस्थ चल रहा हो…

मानसिक स्वास्थ्य कैसे ठीक रहे जब तमाम देश अस्वस्थ चल रहा हो…

Page Visited: 1638
0 0
Read Time:10 Minute, 5 Second

-सुनील कुमार।।

एक और मानसिक स्वास्थ्य दिवस गुजर गया। दुनिया भर में लोगों ने सोशल मीडिया पर अवसादग्रस्त लोगों के लिए हमदर्दी पोस्ट की, कई लोगों ने अपने नंबर पोस्ट किए कि जिस किसी का मन अच्छा न हो, और बात करने की इच्छा हो तो उनसे बात कर सकते हैं। जानकार विशेषज्ञों ने ऑनलाईन वेबीनार किए, और कुछ चर्चित लोगों ने अपनी खुद की जिंदगी के डिप्रेशन का हाल भी बांटा ताकि दूसरे लोग अपने को लेकर हीनभावना न पालें, और यह जान लें कि बड़े कामयाब लोग भी अपनी जिंदगी में किसी वक्त ऐसे दौर से गुजरे हुए रहते हैं।

अब किसी व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य सबसे पहले तो उसके करीब के छोटे दायरे से प्रभावित होता है जिसमें उसकी अपनी निजी जिंदगी के सुख-दुख का बड़ा हाथ रहता है। आसपास के दायरे में घर-दफ्तर, स्कूल-कॉलेज के साथियों की भूमिका रहती है, किसी के खुश रहने या नाखुश रहने में इन सबका भी हाथ रहता है। आसपास के लोगों का यह सोचना भी जरूरी होता है कि कौन करीबी ऐसे हैं जिन्हें कुछ बात करने की जरूरत है, और जो आज अकेलेपन में घुट रहे हैं। एक छोटी सी दिक्कत आज के वक्त की यह है कि लोग दूसरों की निजता का सम्मान इतनी गंभीरता से करने लगते हैं, और इस हद तक करने लगते हैं कि वे किसी की निजी बातों को पूछना भी उनकी निजता के खिलाफ मान लेते हैं, और यह एक बड़ा जटिल मुद्दा रहता है कि किसी के निजी मामलों में कितनी दखल दें, और कहां जाकर रूक जाएं। ऐसे में संबंधों के खराब होने का भी एक खतरा रहता है। लेकिन एक बड़ा सवाल यह रहता है कि आसपास के कोई करीबी अगर अपने मन के भीतर ही घुट रहे हैं, तो क्या उन्हें उनके हाल पर छोड़ देना निजता का सम्मान है, या अपने आपको उनकी निजी जिंदगी का एक हिस्सा मानकर, साबित करते हुए, उनके दिल-दिमाग के बोझ को उठाने में हाथ बंटाना बेहतर है? यह सवाल आसान नहीं है, इसे हमने तो चार वाक्यों में पूरा कर दिया है, लेकिन असल जिंदगी में इसे तौलते हुए और तय करते हुए लोगों को बरसों लग जाते हैं, और आखिर में जाकर जब अनहोनी हो चुकी रहती है, तब उसके पास महज मलाल रह जाता है कि उन्हें पहले दखल देना था, और एक जिंदगी बचा लेनी थी।

लेकिन जब हम इस दायरे से बाहर आते हैं, और बाकी समाज की तरफ देखते हैं जिसकी एक व्यापक जिम्मेदारी रहती है तो वहां पर हिन्दुस्तान आज सबसे अधिक नाकामयाब दिख रहा है। राजनीतिक दल लोगों की मानसिक सेहत की तरफ से बेफिक्र हैं, और ऐसी हैवानियत की बातें करते हैं कि मानो वे हैवान किसी और ग्रह से आए हैं, और इस धरती की भावनाओं को नहीं समझते हैं। राजनीतिक दल बलात्कारियों के जेल में रहने की वजह से अगर उन्हें चुनावी उम्मीदवार नहीं बना पा रहे हैं, तो मानो इस अफसोस को जाहिर करने के लिए उनके घर के लोगों को उम्मीदवार बना रहे हैं। जो पार्टियां अपने को देश की सबसे पुरानी पार्टी, दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी, किसी प्रदेश की सबसे बड़ी क्षेत्रीय पार्टी करार देते थकती नहीं हैं, वे बलात्कारियों और दूसरे मुजरिमों को टिकट देने के लिए उनके घर पहुंच जाती हैं। कोई अगर यह समझते हैं कि देश का ऐसा राजनीतिक माहौल जनता के मानसिक स्वास्थ्य पर असर नहीं डालता, तो वे नासमझ हैं। जिस देश में मुजरिमों का लगातार सम्मान होता है, हत्यारों और बलात्कारियों को मालाएं पहनाई जाती हैं, बलात्कारियों के हिमायती राष्ट्रीय झंडा लेकर जुलूस निकालते हैं, तो देश की दिमागी सेहत खराब होती ही होती है क्योंकि हर नागरिक तो राजनीतिक दलों जितनी जुर्म की भागीदारी कर नहीं सकते, और वे ऐसा माहौल देखकर निराश हो जाते हैं। जहां तक राजनीति से जुड़ी हुई सरकारों का सवाल है तो ये सरकारें दिमागी सेहत की तरफ से बेरूखी बनाए रखती हैं क्योंकि मानसिक रोगी कोई ऐसा संगठित वोटर तबका तो है नहीं जो कि चुनाव में सत्तारूढ़ पार्टी को हरा सके।

अब बारी आती है मीडिया की। तो मीडिया का रूख पिछले छह महीनों में जितनी आक्रामकता के साथ नकारात्मकता की पीठ पर सवार होकर अधिक दर्शक संख्या की मंजिल तक जाते दिखा है, उसके बारे में आज पूरा देश ही बात कर रहा है। बहुत से लोगों ने ऐसे पोस्ट भी किए हैं कि कोई टीवी परिवार की दिमागी हालत बेहतर कर सकता है अगर उसकी स्क्रीन दीवार की तरफ रखी जाए। यहां हमें हिन्दुस्तानी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बारे में कुछ अधिक लिखने की जरूरत नहीं है क्योंकि उसके अधिकतर हिस्से में हाल के महीनों में जितनी गैरजिम्मेदारी दिखाई है उसमें भी जिंदगी से निराश लोगों को और अधिक निराश ही किया है। महीनों से टीवी पर सिर्फ एक खुदकुशी की चर्चा चल रही है जिसे कत्ल साबित करने की कोशिश चल रही है। अपनी जिंदगी से निराश कोई इंसान जब रात-दिन, रात-दिन, जब सिर्फ यही, हत्या-आत्महत्या, हत्या-आत्महत्या देखते रहते हैं, तो वे खुद आत्महत्या की तरफ बढ़ जाते हैं, ऐसा सिर्फ हमारा कहना नहीं है, ऐसा मनोचिकित्सकों का भी कहना है। मीडिया से जुड़ी हुई एक और बात कुछ अरसा पहले हमने लिखी थी कि समाज के अवसादग्रस्त लोगों को लेकर मीडिया के लोगों में न समझ है, न संवेदनशीलता। नतीजा यह है कि इतनी नकारात्मकता फैलाई जा रही है कि उससे लोगों में अवसाद और बढ़ते चल रहा है। मीडिया में खबरें गैरजिम्मेदारी से बनाई जा रही है, टंगी हुई लाशों की तस्वीरें तुरंत इस्तेमाल हो रही हैं, और किसी को यह परवाह नहीं दिख रही कि इससे तनावग्रस्त लोगों पर क्या असर पड़ रहा है।

जब देश में वारदातें अधिक से अधिक भयावह हो रही हैं, उन्हें राजनीतिक बढ़ावा पूरे वक्त मिल रहा है, जब देश में खाने-कमाने की गुंजाइश घटती चली जा रही है, जब कोरोना और लॉकडाऊन ने करोड़ों लोगों को बेरोजगार कर दिया है, और करोड़ों छोटे-बड़े कारोबारियों का दीवाला निकाल दिया है, तब किसी भी किस्म का बढ़ता हुआ तनाव लोगों को अगर मार नहीं डाल रहा है, तो उन्हें कम से कम गंभीर बीमार जरूर कर दे रहा है।

मानसिक स्वास्थ्य दिवस के मौके पर यह भी याद रखने की जरूरत है कि हिन्दुस्तान में मनोचिकित्सक और मानसिक परामर्शदाता आबादी के अनुपात में ऊंगलियों पर गिने जाने लायक हैं। दुनिया के सभ्य और विकसित देशों में शायद सबसे बुरा अनुपात हिन्दुस्तान में ही होगा जहां बड़े शहरों से नीचे कहीं कोई मनोचिकित्सा नहीं है, गरीब के लिए तो बिल्कुल ही नहीं है, मध्यम वर्ग की पहुंच से भी बाहर सरीखी है। इस देश में समाज की चेतना को स्वस्थ रखने की समझ भी नहीं है, उसकी जरूरत को भी न सरकार समझ रही, न समाज समझ रहा। कुल मिलाकर यह देश उन लोगों के लिए जानलेवा हो चुका है जो अधिक संवेदनशील हैं, अधिक भावुक हैं, जो किसी मौजूदा वजह से या किसी आशंका से दहशत में हैं, अवसादग्रस्त हैं, तनावग्रस्त हैं, बेरोजगार हैं। इस माहौल को सिर्फ मानसिक चिकित्सा के नजरिए से देखने के बजाय समाज के मानसिक रूप से स्वस्थ रहने की जरूरत के नजरिए से देखना चाहिए। बात कुछ गंभीर है, खासी बोझिल है, लेकिन हम इतना भरोसा दिला सकते हैं कि हकीकत हमारी बातों से कहीं अधिक गंभीर है, कहीं अधिक बोझिल है, और कहीं अधिक खतरनाक है।

Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleepy
Sleepy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %
Facebook Comments

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Visit Us On TwitterVisit Us On FacebookVisit Us On YoutubeVisit Us On LinkedinCheck Our FeedVisit Us On Instagram