अपनी जुबान के पक्के कौन? कुछ लोग, या कुछ जातियां?

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-सुनील कुमार।।

सुशांत राजपूत की मौत को खुदकुशी से परे एक साजिश या कत्ल साबित करने में जो खेमा रात-दिन एक कर रहा था, उसे पिछले दिनों एम्स के डॉक्टरों की रिपोर्ट से खासी मायूसी हाथ लगी कि मौत खुदकुशी ही है। इतने महीनों से गैस भरकर एक बड़ा सा गुब्बारा रस्सी से बांधकर आसमान तक पहुंचाया गया था कि सुशांत सिंह राजपूत को इंसाफ मिले, और मुजरिम बताते हुए उन तमाम लोगों को बदनाम करने का एक अभियान चला हुआ था जिन्हें कंगना रनौत पसंद नहीं कर रही थीं। सुशांत राजपूत के घरवालों के मुकाबले भी कंगना रनौत अधिक आक्रामक होकर एक धूमकेतू की तरह इस फिल्मी विवाद में पहुंची थी, और एम्स की रिपोर्ट के बाद उसकी भी बोलती बंद सरीखी है। इस दौरान उसने केन्द्र की भाजपा अगुवाई वाली सरकार से देश की एक सबसे ऊंचे दर्जे की हिफाजत हासिल कर ली, और बिना मास्क लगाए देश की एक सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा एजेंसी के दर्जनों लोगों के लिए खतरा बनी हुई उन्हीं के घेरे में घूम भी रही है। इस बीच उसने महाराष्ट्र की शिवसेना को नीचा दिखाने की एक ऐसी कोशिश भी कर डाली जो कि गठबंधन टूटने के बाद भी भाजपा नहीं कर पाई थी। कुल मिलाकर कंगना रनौत ने कुछ अरसा पहले जिस झांसी रानी लक्ष्मीबाई का किरदार परदे पर निभाया था, उसी किरदार को जिंदा करते हुए वह लकड़ी के घोड़े के बजाय प्लेन और कारों के काफिले में सफर करते हुए भाजपा को नापसंद तमाम लोगों पर तलवार भी चला रही है।

लेकिन यहां लिखने का मकसद कंगना रनौत के इस धूमकेतू-किरदार पर लिखना नहीं है, बल्कि उन्होंने एक ताजा बात कही है उसके व्यापक सामाजिक संदर्भ पर लिखना है। कंगना ने पिछले दिनों किसी बात को लेकर शायद ऐसा दावा किया होगा कि ऐसा हो जाए तो वे अपना सम्मान या अवार्ड लौटा देंगी। उन्होंने दावा किया है या नहीं, यह भी मुद्दा नहीं है, उन्होंने इस बात की याद दिलाते हुए स्वरा भास्कर की एक ट्वीट पर लिखा कि वे एक क्षत्रिय हैं, और अपनी बात से कभी मुकरेंगी नहीं, लेकिन उन्होंने कहा क्या था इसके लिए यह वीडियो देख लिया जाए।

यहां लिखने का मामला बस यहीं से शुरू होता है कि एक क्षत्रिय का दिया हुआ वचन क्या बाकी लोगों के दिए हुए वचन के मुकाबले अधिक वजन रखता है? क्या दूसरी जातियों के लोग अधिक झूठ बोलते हैं? हिन्दुस्तान में इस किस्म का जुबानी जमाखर्च चलते ही रहता है जब लोग अपनी ऊंची समझी जाने वाली जात को लेकर ऐसे दावे करते हैं, कोई कहता है कि यह राजपूत की जुबान है, तो कोई कहती है कि वह ब्राम्हण की औलाद है। यह आम सिलसिला है कि लोग कहें कि उनकी रगों में फलानी जाति का लहू दौड़ रहा है, या वे फलाने की औलाद हैं, और ऐसा नहीं कर सकते।

जातियों का अहंकार हिन्दुस्तान को तो तोड़ रहा है, लेकिन इस अहंकार को तोडऩे वाला हथौड़ा इस देश में बना नहीं है, और यह एक वजह है कि दुनिया के बाकी विकसित देशों के मुकाबले हिन्दुस्तान सौ कदम पीछे ही रहेगा क्योंकि वह अपनी आधी महिला आबादी को हिकारत से देखता है, वह अपनी दलित आबादी को बलात्कार करने के अलावा बाकी कामों के लिए अछूत मानता है, वह आदिवासियों को कमअक्ल मानता है, वह इस देश के मुस्लिमों और ईसाईयों को विदेशी धर्म का मानता है। मतलब यह कि अपने आपको हिन्दुस्तान, और पूरा हिन्दुस्तान मानने वाला यह ऊंची समझी जाने वाली जाति का बहुत छोटा सा तबका ऐसा है जो कि पीढिय़ों के अहंकार से लदा हुआ है। यह गौरव, मतलब यह कि जिसे यह तबका गौरव समझता है, वह इस तबके की ताकत न होकर इस तबके पर बोझ बनकर लदा हुआ है। यह झूठी शान ऐसा सोचने वालों को खुले दिमाग से न कुछ सोचने देती, न बात करने देती। इसकी हरकतें उन जातियों के ओर हमलावर रूख की रहती हैं जिन्हें ये जातियां अपने से नीची मानती हैं।

कल-परसों ही दलित तबके के किसी हिमायती ने, या उसके तबके के ही किसी ने यह सवाल उठाया है कि दलित लड़कियों से बलात्कार करते हुए छुआछूत कहां चले जाता है? बात सही भी है, क्योंकि दलितों के छूने से अगर कुआं अपवित्र हो जाता है, उनके पूजा करने के बाद ईश्वर की प्रतिमा और मंदिर को धोना पड़ता है, उनकी छाया पडऩे के बाद अपने आपको गंगाजल से साफ-शुद्ध करना पड़ता है, तो फिर उनकी लड़कियों की देह के इतने भीतर तक जाते हुए सवर्णों को कुछ छुआ नहीं लगता?

जाति के गर्व का पाखंड अहिंसक नहीं है। यह सदियों की हिंसा की परंपरा को आज आजादी की पौन सदी के करीब भी उतनी ही आक्रामकता के साथ लेकर चल रहा है क्योंकि सवर्ण अहंकार को दलितों में रीढ़ की हड्डी नहीं सुहाती, उनके दूल्हे का घोड़ी पर चढऩा बर्दाश्त नहीं होता, और उनके लिए इन पर हमला करना मानो अपने गर्व को जिंदा रखने के लिए जरूरी हो जाता है। ऐसे ही हमलावर तबके बात-बात पर अपनी जात के गौरव का गुणगान जुबान का पक्का रहने, हौसलामंद होने, इज्जत के लिए दूसरों को खत्म कर देने जैसी बातों के साथ करते हैं।

भारत जैसे जटिल जातिवाद को देखें, उसके ढांचे और उसकी हिंसा को देखें, तो यह बात साफ दिखती है कि किसी धर्म या किसी जाति के अहंकार के सार्वजनिक दावे एक किस्म से दूसरे धर्मों और दूसरी जातियों को अपने से नीचे दिखाने की कोशिश भी रहते ही हैं। लोगों को अगर सामाजिक न्याय की बात करनी है, दूसरे धर्म और दूसरी जातियों के लोगों को बराबरी का इंसान समझना है, तो अपने तबके के घमंड से अपने को आजाद भी करना होगा। जो धर्म परंपरागत रूप से दूसरों के प्रति हमलावर रहते आए हैं, जो जातियां दूसरी जातियों पर ज्यादतियां करते आई हैं, उन जातियों की ऐसी काल्पनिक खूबियों के दावे एक सामाजिक हिंसा तो रहते ही हैं, फिर चाहे उनसे सीधे-सीधे लहू न निकलता हो।

हिन्दी फिल्मों में कहानी में नाटकीयता पैदा करने के लिए ऐसी हिंसा की बातों को लाद दिया जाता है। फिल्मों के संवाद-लेखक इन्हें उसी हिंसा के साथ पेश करते हैं जो हिंसा आजादी के पहले भी नाजायज मानी जा चुकी थी। ऊंची समझी जाने वाली जातियों की नीची समझी जाने वाली जातियों पर हिंसा। अनगिनत हिन्दी फिल्मों की कहानियां ऐसे ही सामाजिक अन्याय पर टिकी रहती हैं, उन्हीं की बुनियाद पर खड़ी रहती हैं।

सामाजिक व्यवस्था अनंतकाल से महिलाओं के खिलाफ, कुछ जातियों के खिलाफ, गरीबी और बीमारी के खिलाफ, विकलांगता के खिलाफ, बेकसूर जानवरों के खिलाफ अंतहीन किस्म के कहावत और मुहावरे गढ़ते आई है। समाज का मिजाज बेइंसाफी से भरा रहता है, और उसे आगे बढ़ाने के लिए, धार देने के लिए समाज वैसी ही जुबान का इस्तेमाल बढ़ाते चलता है। अपने आपको क्षत्रिय बताते हुए अपनी जुबान पक्की होने के बारे में जाति का हवाला देते हुए कंगना रनौत ने कोई नया काम नहीं किया है, बल्कि सदियों से चली आ रही इसी अन्यायपूर्ण सामाजिक सोच को आगे बढ़ाया है कि लोगों का अपनी बात पर कायम रहना किसी जात से जुड़ा रहता है। मतलब यह कि दूसरी जातियों के लोग शायद अपनी बात पर पक्के नहीं रहते। सामाजिक अन्याय की खूबी यही रहती है कि कई बार वह किसी दूसरे को गाली दिए बिना, महज अपने गुणगान से एक बेइंसाफ तस्वीर पेश करता है। और अब तो यह अहंकार वाई केटेगरी के सुरक्षा घेरे में चल रहा है, करेला नीम पर चढ़ गया! (इस मिसाल के लिए करेले और नीम दोनों से माफी मांगते हुए)।

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