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अब जब चिराग के हवाले बिहार साथियों..

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बहुदलीय, बहुकोणीय और बहुस्तरीय मुकाबला..

-संजय कुमार सिंह।।

बिहार विधानसभा चुनाव में कौन किसके साथ और कौन किसके खिलाफ यह सब समझना आसान नहीं है। पहले सरकारों को समर्थन अंदर से और बाहर से भी दिया जाता रहा है। अब विरोध भी अंदर से ही हो रहा है, बाकायदा। और मजबूरी यह कि विरोध के खिलाफ बोल नहीं सकते। आश्वासन मांग सकते हैं, मिल भी गया है पर वह कम दिलचस्प नहीं है। बिहार चुनाव पर आज द टेलीग्राफ में दिलचस्प खबर है। राम विलास पासवान के निधन के बाद अगर उनकी पार्टी कुछ मजबूत हुई, सीटें अगर ज्यादा आ गईं तो चुनावी खेल का दूसरा हिस्सा नतीजे आने के बाद देखने को मिलेगा।

अभी तो 243 सदस्यों वाली बिहार विधान सभा में अधिकतम 29 सीटों से 2015 में दो सीटों पर पहुंच गई राम विलास पासवान की पार्टी इस बार एकला चलो के ‘सिद्धांत’ के तहत 143 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और घोषणा है, “बीजेपी से बैर नहीं, नीतिश की खैर नहीं”। जाहिर है, बाकी सीटें किसके लिए छोड़ दी गई हैं। यहां यह दिलचस्प है इससे पहले बहुजन समाज पार्टी सबसे ज्यादा लोकसभा सीटों पर से उम्मीदवार उतार कर एक भी सीट नहीं जीतने का रिकार्ड बना चुकी है।

बात रिकार्ड की चली तो यह बताना प्रासंगिक होगा कि राम विलास पासवान सबसे ज्यादा अंतर से चुनाव जीतने का रिकार्ड बना चुके हैं और यह विडंबना ही है कि इस बार उनकी पार्टी ‘भोटकटवा’ की भूमिका में नजर आ रही है। बिहार के चुनावों को पहले बूथ लुटेरों के लिए जाना जाता था। अब कहने की जरूरत नहीं है और लालू प्रसाद यादव कहते रहे हैं कि बिहार चुनावों में भोटकटवों की भूमिका भी होती है। कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना अंदाज में। मतदाता भी जानते समझते वोट काटने वालों को समर्थन देते हैं।

वैसे तो राजनीति में कुछ स्थायी नहीं होता फिर भी राम विलास पासवान हाजीपुर से लोकसभा के आठ चुनाव जीत चुके हैं। हालांकि, 2009 में हार भी चुके हैं। 2015 के विधानसभा चुनाव से पासवान की पार्टी एलजेपी को हाजीपुर की सात विधानसभा सीटों में से एक सीट मिली थी और 2019 का लोकसभा चुनाव राम विलास पासवान ने नहीं लड़ा था। एक जुलाई 2019 को उन्होंने दूसरी बार राज्यसभा के सदस्य के रूप में शपथ ग्रहण किया था। इससे पहले हाजीपुर से हारने के बाद 2010 में आरजेडी के समर्थन से राज्यसभा के सदस्य रह चुके हैं।

द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार (लिंक कमेंट बॉक्स में) विधानसभा चुनाव में एलजेपी से टिकट पाने वालों में कई भाजपा छोड़ने वाले भी हैं और सुशील मोदी यह एलान कर चुके हैं कि भाजपा नीतिश के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही है। इसमें कोई अगर-मगर नहीं है। हालांकि, जिस मंच से यह एलान किया गया उसी मंच पर भाजपा के चुनाव प्रभारी देवेन्द्र फडनविस मास्क लगाकर शांत बैठे रहे।

नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के साथ नीतिश कुमार पहली बार भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। पिछला चुनाव लालू यादव के साथ लड़े थे, उनके बेटों के साथ सरकार बनाई थी और कोई डेढ़ साल बाद केंद्र सरकार ने लालू परिवार के खिलाफ जांच शुरू करवाई तो नीतिश कुमार की अंतरात्मा जाग गई थी। उन्होंने इस्तीफा दे दिया था और इससे पहले कि भाजपाई राज्यपाल कुछ कर पाते नीतिश कुमार ने भाजपा के समर्थन से सरकार बना ली थी।

ऐसी हालत में इस बार किसी भी पार्टी की स्थिति ना बहुत मजबूत हुई है ना बहुत खराब। नीतिश की पार्टी को सत्ता में रहने का नुकसान जरूर होगा। यही हाल केंद्र की सत्ता में रहकर शौंचालय बनाने वाली भाजपा का भी हो सकता है। इसलिए, बिहार में मुकाबला बहुदलीय बहुकोणीय और बहुस्तरीय है।

About Post Author

Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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