अदालत चिंतित है अभिव्यक्ति के अधिकार पर .

अदालत चिंतित है अभिव्यक्ति के अधिकार पर .

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पिछले छह सालों में यानी मोदी शासन के छह सालों में देश की राजनीति के तौर-तरीके बदल गए, विरोध और समर्थन के पैमाने बदल गए, सहनशीलता और चुप्पी के मतलब बदल गए। इन सबके साथ देश के मीडिया का चरित्र भी काफी बदल गया। पत्रकार भी सत्ता से सवाल पूछने वाले और राष्ट्रवादी इन दो खेमों में बंट गए। इससे पहले भी पत्रकारों की राजनीतिक दलों से निकटता, दोस्ती, प्रतिबद्धताएं रही हैं, लेकिन गोदी मीडिया कहलाने जैसी नौबत नहीं आई थी।

मगर आज की सच्चाई यही है कि पत्रकारिता में निष्पक्षता, तटस्थता का भाव दुर्लभ हो गया है और आक्रामकता पत्रकारिता का नया फैशन बन गई है। जो जितना जोर से चिल्ला कर बोले, सरकार का पक्ष रखने के लिए तथ्यों को कैसे भी तोड़े-मरोड़े वो उतना बड़ा पत्रकार कहलाने लगा है। न्यूज चैनल अब जनहित और देशहित की जगह टीआरपी को ध्यान में रखकर खबरें चलाने लगे हैं, फिर चाहे उसके लिए उन्हें फर्जी नैरेटिव ही क्यों न गढ़ना पड़े। देश के सांप्रदायिक माहौल को बिगाड़ने में न्यूज चैनल खबरों की आड़ में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। लेकिन अब उनकी पोल खुलने लगी है। इसका ताजा उदाहरण तब्लीगी जमात को लेकर आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला है।

मार्च के अंत में जब कोरोना का प्रसार देश में तेजी से बढ़ा था, उसी वक्त दिल्ली के निजामुद्दीन में तब्लीगी जमात के मरकज में एक कार्यक्रम आयोजित हुआ था, जिसमें देश-विदेश के लोग आए थे। बाद में ये लोग अलग-अलग हिस्सों में गए और इनमें से कुछ कोरोना पॉजीटिव पाए गए। सरकार को अपनी नाकाम छिपाने का एक मौका मिल गया और तब्लीगी जमात को कोरोना के प्रसार का जिम्मेदार ठहरा दिया गया। इसके बाद टीवी चैनलों ने तब्लीगी जमात का कोरोना कनेक्शन जैसी हेडलाइन्स से खबरें दिखानी शुरु कीं और लगातार तब्लीगी जमात के साथ-साथ देश भर के मुस्लिमों को निशाने पर लेना शुरु कर दिया।

बिना किसी ठोस सबूत के एक पूरी कौम को दोषी ठहराने का खेल कई न्यूज चैनलों ने खेला, जिसका नतीजा ये हुआ कि कहीं मुस्लिमों का आर्थिक बहिष्कार हुआ, कहीं उनकी दुकानों, ठेलों को नुकसान पहुंचाया गया, कहीं उनसे मारपीट की गई। सरकार भी कोरोना के अपडेट इसी तरह देने लगी, जिसमें कोरोना संक्रमितों में तब्लीगी जमात के लोगों का अलग से जिक्र होता। देश के सारे मुसलमान तब्लीगी जमात के सदस्य नहीं हैं, फिर भी सबके साथ भेदभाव होने लगा और सरकार चुप रही। कई अखबारों और चैनलों में क्वांरटीन केंद्रों में रखे गए या अस्पताल में इलाज करा रहे तब्लीगी जमात के लोगों के बारे में फर्जी खबरें चलाई गईं, ताकि माहौल बिगड़े। चैनलों के इस रवैये के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी। 

जमीयत-उलेमा-हिंद ने मरकज मामले की मीडिया कवरेज को दुर्भावना भरा बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, याचिका में कहा गया है कि मीडिया गैरजिम्मेदारी से काम कर रहा है। मीडिया ऐसा दिखा रहा है जैसे मुसलमान कोरोना फैलाने की मुहिम चला रहे हैं। इस पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस एसए बोबड़े ने ठोस हलफनामा दाखिल न करने को लेकर केंद्र को फटकार लगाई, साथ ही उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी का हाल के दिनों में सबसे अधिक दुरुपयोग हुआ है।

चीफ जस्टिस बोबड़े ने सॉलिसिटर जनरल से कहा कि, ”आप इस कोर्ट के साथ इस तरह का व्यवहार नहीं कर सकते हैं।” हलफमाना एक जूनियर अधिकारी द्वारा दायर किया गया है। यह बहुत गोलमोल है और खराब रिपोर्टिंग की किसी घटना पर प्रतिक्रिया नहीं है। संबंधित विभाग के सचिव को हमें बताना है कि वह विशिष्ट घटनाओं (याचिकाकर्ता की ओर से उठाए गए) के बारे में क्या सोचते हैं और इस तरह का बेतुका जवाब ना दें जिस तरह अभी दिया गया है। अब इस मामले की सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी, और तब पता चलेगा कि मुस्लिमों की छवि खराब करने के लिए कोई दोषी ठहराया जाता है या नहीं और अगर किसी को दोषी माना जाता है, तो उसकी सजा क्या होगी। यह एक महत्वपूर्ण पड़ाव होगा, क्योंकि इससे यह पता चलेगा कि मीडिया कहां तक उच्छृंखल हो सकता है, अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में इस महत्वपूर्ण अधिकार का कैसे दुरुपयोग होता है। केंद्र ने जिस तरह का हलफनामा पेश किया, उससे पता चलता है कि केंद्र इस मामले को जानबूझकर उलझाए रखना चाहता है।

अदालत ने अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर जो चिंता व्यक्त की, वह भी बिल्कुल जायज है। एक ओर इस अधिकार की आड़ में मनमाने तरीके से खबरों को ट्विस्ट किया जा रहा है, या खबरें प्लांट की जा रही हैं, दूसरी ओर उन लोगों की आवाज को दबाया जा रहा है, जो वंचितों-शोषितों के हक में उठें। अभी तीन दिन पहले ट्रैक्टर रैली के दौरान ली गई प्रेस वार्ता में कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने कमजोर विपक्ष होने के सवाल पर मीडिया की आजादी के सवाल को उठाया था। उन्होंने साफ कहा था कि किसी भी देश में विपक्ष एक ढांचे के भीतर काम करता है, जिसमें मीडिया, न्यायिक प्रणाली और संस्थान शामिल हैं, जो लोगों की आवाज की रक्षा करते हैं, लेकिन भाजपा ने इस पूरे ढांचे पर कब्जा कर लिया है। आज दुनिया का कोई भी देश ऐसी स्थिति से नहीं जूझ रहा है, जहां मीडिया भी सरकार से सवाल न करे, जब उसकी जमीन दूसरे देश ने जब्त कर ली हो।

राहुल गांधी की यह बात बिल्कुल सही है, न मीडिया प्रधानमंत्री से सीधे सवाल कर रहा है, न प्रधानमंत्री ने इतने बरसों में खुली प्रेस कांफ्रेंस करने की कोई हिम्मत दिखाई है। उन्होंने केवल प्रायोजित, स्क्रिप्टेड इंटरव्यू दिए हैं, वो भी अपने चुने खास पत्रकारों को। यह बहुत बड़ा उदाहरण है कि हमारे देश में मीडिया किस कदर सत्ता के आगे नतमस्तक हो गया है। और इस दशा में सत्ता की सुविधा के हिसाब से ही खबरें बनाईं और दिखाई जाएंगी, और नाम लिया जाएगा अभिव्यक्ति की आजादी का। सुप्रीम कोर्ट ने तो इस मामले में अपनी चिंता जाहिर की है, लेकिन अब इस देश के नागरिकों को भी अपने अधिकारों को लेकर अधिक जागरुक होना पड़ेगा, ताकि फर्जी खबरों का कारोबार बंद हो सके।

(देशबन्धु)

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