शाहीनबाग: सुप्रीम कोर्ट का फैसला और लोकतांत्रिक समझ..

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-सुनील कुमार।।
दिल्ली में पिछले बरस शाहीन बाग आंदोलन को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया है कि सार्वजनिक जगहों को किसी प्रदर्शन के लिए बेमुद्दत नहीं घेरा जा सकता। यह प्रदर्शन नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ पुरानी दिल्ली के बीच व्यस्त इलाके में चल रहा था, और महीनों तक चलते रहा। इसी आंदोलन का चेहरा बनी एक बुजुर्ग महिला को ‘टाईम’ पत्रिका ने पिछले बरस के सौ सबसे प्रभावशाली लोगों में से एक चुना है। यह आंदोलन कई मायनों में अनोखा रहा, महीनों तक चलते रहा, आरोप झेलते रहा, उकसावे और भडक़ावे पर भी इसने आपा नहीं खोया, पूरी तरह अहिंसक रहा, और मोटेतौर पर मुस्लिम समुदाय के लोगों के इस आंदोलन का साथ देने के लिए देश के बाकी दूसरे सभी समुदायों के लोग पहुंचे, और एक वक्त तो ऐसा भी हुआ कि इन्हें खाना खिलाने का काम सिक्ख बिरादरी कर रही थी। यह बात सही है कि इससे आसपास के रास्ते बंद हुए थे, और आवाजाही बंद होने से इर्द-गिर्द के लोगों का कारोबार, उनकी जिंदगी भी प्रभावित हुए ही होंगे। यह आंदोलन खत्म हो चुका है, हालांकि इसका मुद्दा खत्म नहीं हुआ है। यह आंदोलन तमाम किस्म की तोहमतें झेलते हुए चलते रहा, और इन्हें कभी राष्ट्रविरोधी करार दिया गया, तो कभी विदेशी पैसों पर पलने वाले गद्दार कहा गया, लेकिन गांधी के आंदोलन की तरह इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत इसकी अहिंसा रही, जिसने एक हाथ भी नहीं उठाया।

शाहीनबाग का आंदोलन कोई स्थाई ढांचा नहीं था। और लोकतंत्र में आंदोलन सार्वजनिक जगहों पर ही होते हैं। पश्चिम बंगाल एक ऐसा राज्य है जहां वामपंथियों से लेकर ममता बैनर्जी तक की एक-एक सभा में 10-10 लाख लोग भी मौजूद रहते आए हैं, और ऐसी हर सभा वहां सडक़ पर ही होती है क्योंकि कोई मैदान तो इतना बड़ा होता नहीं है। देश के हर प्रदेश में जब जिस राजनीतिक दल या धार्मिक, जातीय संगठन की जितनी ताकत होती है, उतना बड़ा, उतना लंबा प्रदर्शन होता है, और इसी देश में हमने महीनों तक पटरियों पर धरना देखा है जिससे रेलगाडिय़ां बंद करनी पड़ी थीं। कई जगहों पर कई-कई दिन तक सडक़ें बंद कर दी जाती हैं, और आंदोलन से जिंदगी में कुछ रूकावट पैदा होना कोई अनहोनी नहीं है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से शाहीनबाग का आंदोलन न तो गैरकानूनी साबित हुआ है, और न ही गलत साबित हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने एक स्थापित सत्य को ही लिखा है कि सार्वजनिक जगहों पर आंदोलन अंतहीन नहीं चल सकते, और प्रशासन इन पर कार्रवाई कर सकता है। अदालत ने एक पुराना स्थापित सिद्धांत भी दुहराया है कि लोकतांत्रिक अधिकार जिम्मेदारियों के साथ ही आते हैं, और सार्वजनिक जगहों को लेकर आंदोलनकारियों की भी एक जिम्मेदारी बनती है।

बात सही है, और शाहीनबाग का आंदोलन भी सही था, और सार्वजनिक जगह पर इसे अंतहीन न चलने देना भी सही है। लोकतंत्र एक लचीली व्यवस्था है जिसके भीतर तरह-तरह के आंदोलनों की गुंजाइश है। ऐसे आंदोलनों में कानून न सही स्थानीय नियम कभी-कभी टूटते हैं, और भला कौन सी ऐसी पार्टी है, कौन से ऐसे नेता हैं जिन पर आंदोलनों में नियम तोडऩे के मामले मुकदमे दर्ज न हुए हों? अभी राहुल और प्रियंका गांधी जिस तरह पुलिस इंतजाम के बीच से हाथरस जाने की कोशिश कर रहे थे, उनके खिलाफ भी यूपी पुलिस ने कई किस्म के मामले दर्ज किए हैं, जिनमें से एक दफा महामारी के बीच भीड़ जुटाने की भी है। दूसरी तरफ मध्यप्रदेश में रोजाना ही सत्तारूढ़ भाजपा की भीड़ दिखाई पड़ती है, और जिस राज्य में जिसकी लाठी रहती है वे सार्वजनिक जीवन की भैंस को अपने हिसाब से हांकते हैं। लेकिन सत्ता और राजनीति से परे भी सार्वजनिक जगहों के बारे में कुछ सोचने की जरूरत है।

जिस अमरीका में लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर लोगों में एक दीवानापन है, जहां लोग मास्क पहनने के बजाय उसे जलाना अपना बुनियादी संवैधानिक हक मानते हैं, और उसका इस्तेमाल करते हैं, वहां पर सार्वजनिक जगहों को लेकर एक मतभेद चलते ही रहता है। वहां बहुत से बाग-बगीचों में बेघर लोग डेरा डाल लेते हैं, और फिर वहां से हिलते ही नहीं। ऐसे में वहां कई बार यह बहस छिड़ती है कि सार्वजनिक जगहों पर पहला हक किसका? जिस इस्तेमाल के लिए जगह बनी है वह इस्तेमाल करने वाले नागरिकों का, या फिर जिनके पास घर नहीं है उनके बसने का? अलग-अलग राज्यों में, अलग-अलग शहरों में वहां पर अलग-अलग सोच के लोग हैं, और जहां वामपंथी रूझान के लोग हैं, या जहां उदार लोकतांत्रिक सोच है वहां लोग सार्वजनिक जगहों पर वंचित तबके का पहला हक मानते हैं, वे मानते हैं कि घर-बार वाले लोगों का बाग-बगीचों में घूमना उतना जरूरी नहीं है जितना जरूरी बेघर लोगों का ठहरना है। इस बात की चर्चा हम शाहीनबाग के संदर्भ में नहीं कर रहे हैं, बल्कि सार्वजनिक जगहों के तरह-तरह के इस्तेमाल की जिम्मेदारी, और इस्तेमाल के हक की विविधता बताने के लिए एक मिसाल के रूप में कर रहे हैं। हिन्दुस्तान में ऐसा ही चौराहों पर भीख मांगने, या सामान बेचने वाले लोगों के लिए सोचा जाता है कि ट्रैफिक के बीच यह काम उनका हक है, या उन्हें इस काम से रोकना चाहिए? फुटपाथ पर जीने वाले, या रेलवे प्लेटफार्म पर जीने वाले लोगों को हटाया जाना चाहिए, या किसी भी सरकारी जगह पर सिर छुपाने का उनका हक सरकार के हटाने के हक से अधिक बड़ा है? ऐसी कई बातें सार्वजनिक जीवन को लेकर सामने आती हैं, और कोई सभ्य और लोकतांत्रिक समाज इन पर गौर किए बिना नहीं रहता। जो समाज जितना अधिक सभ्य रहता है, वह अपने बीच के वंचितों के मुद्दों पर उतना ही अधिक गौर करता है। और जो समाज जितना असभ्य, अपरिपक्व, और अलोकतांत्रिक रहता है, वह अपने बीच के वंचितों को एक आम नागरिक या इंसान मानने से भी मना कर देता है, और उन्हें संपन्न और संचित समाज की नजरों से भी दूर रखने की कोशिश करता है। यह महज मोदी का गुजरात नहीं था जहां ट्रंप के आने पर सडक़ किनारे की झोपड़पट्टियों को छुपाने के लिए ऊंची दीवार ही खड़ी कर दी गई थी, जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री जॉन मेजर बंगाल आए थे, तो वहां की वामपंथी सरकार ने भी राजधानी कोलकाता से लाखों भिखारियों और बेघर लोगों को सार्वजनिक फुटपाथ से हटाकर शहर के बाहर कर दिया था। इसलिए राजनीतिक सोच एक किस्म की हो सकती है, और उसी पार्टी की सरकार की सरकारी सोच एक अलग किस्म की हो सकती है। कुल मिलाकर सार्वजनिक जीवन में, सार्वजनिक जगहों पर आम लोगों या आंदोलनकारियों के अधिकार कैसे रहें, कितने रहें, दूसरे लोगों के मुकाबले कम रहें, या ज्यादा रहें, इन तमाम बातों पर उस देश-प्रदेश की सरकारों और वहां के समाज को सोचना पड़ता है, सोचना चाहिए।

हमारा तो यह मानना है कि शाहीनबाग के आंदोलन में 21वीं सदी में गांधी के अहिंसक आंदोलन की मिसाल को एक बार फिर जिंदा किया, और देश के बाहर की एक पत्रिका ने उस आंदोलन की ताकत को पहचाना, उसका सम्मान किया। इस जगह पर यह लिखना अप्रासंगिक नहीं होगा कि इसी पत्रिका के इसी अंक की इसी लिस्ट में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी सबसे असरदार लोगों में छांटा गया है, लेकिन उन्हें छांटने की वजहों में इस पत्रिका ने उनके बारे में जितनी नकारात्मक बातें लिखी हैं, उनसे लगता है कि खुद मोदी यह सोच रहे होंगे कि खलनायक साबित करने के लिए इस पत्रिका को क्या वे ही मिले थे? जब मोदी और शाहीनबाग आंदोलन की 80 बरस की आंदोलनकारी बिल्किस बानो दोनों को एक फेहरिस्त में साथ रखा गया है, तो लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि एक सार्वजनिक जगह पर 101 दिन चले आंदोलन के बाद भी इस पत्रिका को यह महिला नायिका लगी। किसी सार्वजनिक जगह के इस्तेमाल को, उसके पीछे की नीयत को देखे बिना उसे सही या गलत करार नहीं दिया जा सकता। जम्मू में एक खानाबदोश बच्ची के साथ मंदिर में पुजारी और पुलिस समेत ढेर लोगों द्वारा किए गए बलात्कार और कत्ल के बाद भी उन्हें बचाने के लिए उनके हिमायती लोगों ने जिस तरह तिरंगा झंडा लेकर सडक़ों पर जुलूस निकाले थे, वे जुलूस शायद कुछ घंटों के ही रहे होंगे, लेकिन वे इस देश के सार्वजनिक जगह पर शाहीनबाग के मुकाबले लाख गुना अधिक बोझ थे। शाहीनबाग तो इस देश के लोकतंत्र का सम्मान बढ़ाने वाला आंदोलन था, और कोई अदालत इस बात का जिक्र अपने फैसले में करे, या न करे, यह तो उस जज, या उस बेंच की लोकतांत्रिक समझ की बात है, हम किसी जज के मुंह में अपने शब्द डालना नहीं चाहते, लेकिन इस फैसले पर लिखने के वक्त हम इस आंदोलन की खूबियों को याद करना जरूरी समझते हैं।

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