दंगे, सांप्रदायिकता और भाजपा

ये जो योगी आदित्यनाथ हैं, इन्हें समझिए.. मोदी के शिष्य ऐसे ही नहीं कहे जाते हैं..

-संजय कुमार सिंह।।
आज के अखबारों में खबर है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने हाथरस की घटना के विरोध को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साजिश कहा है और उत्तर प्रदेश में 20 से ज्यादा एफआईआर दर्ज हुई है। इनमें छह हाथरस में हैं। इन आरोपों में राष्ट्रद्रोह, आपराधिक साजिश और आपसी वैमनस्य को बढ़ावा देना शामिल है।
दूसरी तरफ केंद्रीय मंत्री प्रताप चंद्र सारंगी के ख़िलाफ़ दंगा करने, धर्म के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच घृणा को बढ़ावा देने, आपराधिक धमकी और जबरन वसूली के आरोपों के तहत सात मामले दर्ज हैं। वे उड़ीशा के मोदी कहे जाते हैं। बजरंगदल के प्रमुख रह चुके हैं।
इसी तरह, उत्तर प्रदेश पुलिस ने पांच दिन में रोज एक-एक कर तीन सांसदों और दो बड़े नेताओं की पिटाई की धक्का-मुक्की की। 25 साल की उम्र में जब योगी सांसद बन गए थे वैसे पिटने वालों की तो गिनती ही नहीं है।


पहले दिन राहुल गांधी, दूसरे दिन डेरेक ओ ब्रायन, तीसरे दिन प्रियंका गांधी चौथे दिन जयंत चौधरी (दोनों सांसद नहीं हैं) और पांचवें दिन आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह पर उत्तर प्रदेश पुलिस की सुरक्षा में स्याही डाली गई।
इसके मुकाबले याद कीजिए कि यही योगी जब खुद परेशान थे तो लोकसभा अध्यक्ष से पूछ रहे थे कि संसद उनकी रक्षा कर सकती है कि नहीं। तब बता रहे थे कि वे कितने वोटों से जीते और कैसे उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई। सवाल यह उठता है कि कुर्सी मिलते वे पुरानी बातें भूल गए या बाकी लोगों की लोकप्रियता का कम महत्व है?
ऐसे योगी जो जन प्रतिनिधि हैं, सत्ता मिलने पर दो साल बाद दावा करते कि भाजपा राज में दंगे नहीं होते हैं। दंगा कितना खौफनाक है यह अलग-अलग लोगों के लिए अलग हो सकता है पर दो साल दंगा नहीं हुआ तो उसे उपलब्धि कहना और फिर अपनी गलती छिपाने के लिए दंगे की साजिश का प्रचार करने लगना कैसी राजनीति है?
दंगे कहां होते हैं, क्यों होते हैं कौन नहीं जानता है। फिर भी अपनी पीठ खुद थपथपाना – आप समझ सकते हैं। दिल्ली में दंगे 1984 के बाद अब हुए थे। और 84 के दंगे ना तो सामान्य स्थितियों में हुए थे ना सामान्य दंगे थे फिर भी लोगों को 2002 का दंगा याद नहीं रहता है। बाकी सब कुछ याद रहता है। आप कह सकते हैं कि दिल्ली में दंगा हुआ तो भाजपा का राज नहीं था पर जिस ढंग से जांच चल रही है उससे साफ है कि दंगे के मामले में किसका राज है।
एक तरफे दंगा नहीं होने का श्रेय लेना और दूसरी ओर दिल्ली दंगे के दौरान दमकल, एम्बुलेंस नहीं दिखना और सहायता के लिए किए जाने वाले फोन कॉल का जवाब नहीं मिलना और कार्रवाई नहीं होना जैसा गंभीर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट सरकार की पोल खोलती है तो प्रचारकों की किताब से भ्रम फैलाने की कोशिश जारी है।
दंगे अगर सरकार नहीं करवाए तो सरकार की नाकामी से ही होते हैं। रोकना सिर्फ और सिर्फ सरकार का काम है। दंगे के बाद अपनी कमजोरियों का पता लगाने और उसे ढूंढ़ने, ठीक करने की बजाय दंगे की साजिश का पता लगाना – दंगाई मानसिकता ही है। कायदे से दंगे की साजिश समय पर नहीं मालूम हुई यह भी नालायकी है। खासकर तब जब भाजपा दंगा नहीं होने देने और अभी पहले ही सुराग मिल जाने का दावा कर रही है।
इन तथ्यों के साथ यह भी तथ्य है कि सांप्रदायिक तनाव का लाभ भाजपा को लगातार मिला है और अयोध्या में राम मंदिर का ताला खुलवाने का श्रेय भले कांग्रेस को दिया जाए तथा मस्जिद गिराने का ठीकरा नरसिंह राव की सरकार पर फोड़ दिया जाए पर सच क्या है और सांप्रदायिकता को कैसे जिन्दा रखा गया यह किसी से छिपा नहीं है। भाजपा ने किन लोगों पर किसलिए कृपादृष्टि दिखाई वह भी सर्वविदित है।
आइए आज इसी बहाने गुजरात को भी याद कर ही लें।
27 फरवरी 2002 को सुबह साबरमती एक्सप्रेस गोधरा स्टेशन पर पहुंची। ट्रेन में अयोध्या से लौट रहे तीर्थयात्री थे। ट्रेन के कोच नंबर एस-6 और 7 में आग लग गयी थी। इस अग्निकांड में 59 लोग जलकर मर गए। बाद में हुए दंगे के सिलसिले में ट्रेन में आग लगने (या लगाने की घटना) को गोधरा कांड कहा गया। दंगे में 1044 (गैर आधिकारिक सूत्रों के अनुसार 2000) लोगों की जान चली गई थी।
aajtak.in की एक रिपोर्ट के अनुसार तमाम चेतावनियों आशंकाओं को नजरअंदाज कर 28 फरवरी 2002 को (कम से कम) 10 शवों को लेकर अंतिम यात्रा रामोल जनतानगर से हटकेश्वर श्मशान घाट तक निकाली गई। इसमें छह हजार लोग शामिल थे। अंतिम यात्रा को पूरे शहर में घुमाया गया। भीड़ अहमदाबाद के गुलबर्ग सोसायटी, नरोदा पाटिया और नरोदा गाम के करीब बेकाबू होने लगी (अन्य शवों के मामले अलग हैं)।
कहने की जरूरत नहीं है कि तब वहां भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी और गुजरात सरकार की भूमिका की जांच करने वाली एसआईटी मार्च 2012 में क्लोजर रिपोर्ट पेश कर चुकी है। सरकार के खिलाफ गवाही देने वाले संजीव भट्ट दूसरे मामले में जेल में हैं और सरकार के पक्ष में काम करने वाले उस समय के गुजराती अफसर मलाईदार पदों पर तैनात हैं। उनमें से कम से कम एक को बचाने के लिए सीबीआई दफ्तर में आधी रात की ऐतिहासिक कार्रवाई हो चुकी है।
एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट में दंगे को रोकने में नाकामी के लिए गुजरात सरकार की खिंचाई की गयी थी, लेकिन एसआईटी को मोदी और दूसरे आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाने लायक सबूत नहीं मिले। इसी सुबह जाकिया जाफरी ने एसआईटी से नरेंद्र मोदी को मिली क्लीन चिट के खिलाफ एक विरोध याचिका दायर की थी। ‘आज तक’ ने पुलिस कंट्रोल रूम के संदेश और सूबे के इंटेलिजेंस ब्यूरो की रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इसके अनुसार अप्रैल 2011 में पीसी पांडे ने इन रिपोर्टों को स्पेशल इनवेस्टिगेशन टीम के सामने पेश किया। पांडे 2002 के दंगो के वक्त अहमदाबाद के पुलिस कमिश्नर थे। सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को ये निर्देश दिया कि वो सभी पीसीआर रिकॉर्ड्स और खुफिया रिपोर्ट जाकिया जाफरी को सौंप दें ताकि वो उस स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम के खिलाफ विरोध याचिका दायर कर सकें, जिसने गुजरात सरकार को क्लीन चिट दे दी थी।
28 फरवरी 2002 को जाकिया जाफरी के पति और कांग्रेस सांसद एहसान जाफरी को 69 और लोगों के साथ गुलबर्ग सोसायटी में जिंदा जला दिया गया था। अपनी शिकायत में जाकिया ने दंगा बढ़ाने और भड़काने के लिए नरेंद्र मोदी और 57 दूसरे लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाने की मांग की। इस संबंध में मुझे अंतिम रिपोर्ट 4 फरवरी 2020 की मिली। द हिन्दू की इस खबर के अनुसार 14 अप्रैल को मोदी को क्लीन चिट दिए जाने के खिलाफ जकिया जाफरी के मामले की सुनवाई होनी थी।
तब होली की छुट्टी के बाद पोस्ट किए जाने का आदेश हुआ था। फिर कोरोना आने के बाद क्या हुआ पता नहीं। पर वह अलग मामला है। मैं अभी कुछ और बताना चाह रहा हूं। हालांकि, 2002 के दंगे का फैसला अभी हुआ नहीं है या 2020 में हुआ और उत्तर प्रदेश पुलिस ने हाथरस मामले में शव को बिना पोस्टमार्टम जला दिया। सबूत ही नहीं है। अब कहा जा रहा है कि बलात्कार नहीं हुआ था और दंगे की साजिश थी।
गुजरात में रेल गाड़ी में मरने वाले लोगों की शवयात्रा में छह हजार लोग शामिल हुए थे और यहां शव यात्रा निकली ही नहीं – दोनों कैसे ठीक हो सकते हैं। पर दोनों ठीक बताए जा रहे हैं। यहां भी पीड़िता हिन्दू ही थी मौत का कारण तब भी पता नहीं था अब भी पता नहीं था। अफवाह तब भी थे। अब भी थे। आज तक की पूरी खबर का लिंक कमेंट बॉक्स में।

गुजरात दंगे की जांच और संबंधित रिपोर्टिंग का बड़ा काम पत्रकार राणा अयूब ने किया है। उसी की रिपोर्ट से फर्जी मुठभेड़ और गुजरात के गृहमंत्री हरेन पंड्या की हत्या का मामला खुला था। पहचान बदलकर मैथिली त्यागी के नाम से काम करने वाली राणा अयूब ने गुजरात दंगों के दौरान महत्वपूर्ण पदों पर रहे लोगों से लंबी बात गुप्त कैमरे पर की है और इससे पता चलता है कि मानवता के खिलाफ अपराध में राज्य सरकार और उसके अधिकारी शामिल थे। जांच आयोग के सामने डरने वाले अधिकारियों के खुलासे इस स्टिंग में हैं क्योंकि उन्हें पता नहीं था कि रिकार्ड किया जा रहा है। राणा अयूब ने यह सब तहलका के लिए किया था। तहलका ने बाद में राणा को प्रकाशित करने से मना कर दिया और राणा अयूब उसके बाद से चुप हैं। मैथिली त्यागी की पहचान खत्म हो गई।
पुस्तक के अनुसार राणा अयूब की रिपोर्ट नहीं छापने का कारण तहलका के संपादक तरुण तेजपाल ने जो बताया वह इस प्रकार था, देखो राणा बंगारू लक्ष्मण से संबंधित तहलका के स्टिंग के बाद उनलोगों (भाजपा) ने हमारा ऑफिस बंद करा दिया। मोदी सबसे शक्तिशाली, प्रधानमंत्री बनने वाले हैं। अगर हम उन्हें छुएंगे तो खत्म हो जाएंगे।” सच यह है कि मोदी को छूने से बचकर भी तरुण तेजपाल नहीं बचे और सहकर्मी से यौन छेड़छाड़ के मामले में महीनों जेल रहने के बाद 01 जुलाई 2014 से जमानत पर हैं। मामले में अगली सुनवाई 15 अक्तूबर 2020 को है।

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