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खाली सुरंग में अभिवादन की कला..

खाली सुरंग में अभिवादन की कला..

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उत्तरप्रदेश के हाथरस में दलित युवती की बलात्कार के बाद मौत का मामला अब केवल एक जघन्य अपराध, लैंगिक हिंसा तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इससे जुड़े नए पहलू अब खुलकर उभरने लगे हैं। बहुत से लोगों का इस मामले पर ये कहना था कि बलात्कार, बलात्कार होता है, उसमें दलित या सवर्ण या जाति-धर्म का सवाल कहां से आता है। इस बात से आंशिक रूप से सहमत हुआ जा सकता है, क्योंकि मानसिक-शारीरिक पीड़ा तो धर्म या जाति नहीं देखती। लेकिन जब किसी के साथ अनाचार करके पीड़िता के साथ उसके पूरे समुदाय को निशाने पर लिया जाने लगे तो फिर मानसिक पीड़ा का स्तर बढ़ जाता है, तब बलात्कार एक जघन्य अपराध नहीं, सोची-समझी साजिश के तहत जानबूझकर किया गया अपराध नजर आता है। हाथरस मामले में इसलिए मानसिक पीड़ा अब सहनशीलता के हद के बाहर हुई जा रही है।

सरकार का दुचित्तापन इस मामले में खुलकर दिख रहा है, जब वह एक ओर माताओं-बहनों की सुरक्षा की बात कर रही है, दूसरी ओर एक पीड़ित परिवार को राहत देने की जगह नई-नई चुनौतियां उसके सामने फेंक रही है। इस परिवार के सामने चुनौती है कि वे अपनी बेटी के साथ हुए गैंगरेप को साबित करें। इस परिवार के सामने चुनौती है कि वे अपनी नागरिक स्वतंत्रता और अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए खुलकर जिससे चाहें मिल सकें। इस परिवार के सामने चुनौती है कि वे दो पल एकांत में अपनी बेटी का शोक मना सकें और उसके बाद खुद जिंदा होने की खातिर दो वक्त ढंग से खाना खा सकें।  कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि लड़की के पिता की तबियत ठीक नहीं है, उनके घर दिन-रात जमावड़ा होने से घरवाले खाना बना या खा नहीं पा रहे हैं। विपक्ष के नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी तो उत्तरप्रदेश पुलिस की बदतमीजियों का सामना करने के बाद उस परिवार से मिल सके, लेकिन जयंत चौधरी और उनके कार्यकर्ताओं पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया। चंद्रशेखर और उनके समर्थकों पर एफआईआर दर्ज की गई।

संजय सिंह और राखी बिड़लान पर किसी शख्स ने काली स्याही फेंकी। एक सवर्ण जाति का छुटभैया नेता अपने कुछ साथियों के साथ पूरी दबंगई दिखाते हुए भीम आर्मी मुखिया चंद्रशेखर को घर से निकलने और सबक सीख लेने की धमकी दे रहा है, जबकि आसपास पुलिस वाले हैं, यह इस वीडियो में साफ दिख रहा है। जब एक दलित नेता के साथ इस तरह की गुंडागर्दी हो सकती है, तो उस समुदाय के बाकी लोगों को रोजाना कैसी जिल्लतों से गुजरना पड़ता होगा, यह समझा जा सकता है। 

खबर ये भी है कि इन अभियुक्तों के पक्ष में सवर्ण समाज के लोगों ने पंचायत बुलाई। इनका कहना है कि हम इन लोगों के साथ उठते-बैठते नहीं, इनकी लड़की को हाथ लगाना तो दूर की बात है। यह बयान अपने आप में आपराधिक है, फिर भी जातिगत मानसिकता से ग्रसित समाज और देश में यह स्वीकार्य है। सरकार के तलुवे चाटने वाले कुछ पत्रकारनुमा प्राणी चिल्ला-चिल्ला कर राहुल और प्रियंका गांधी के हाथरस जाने को राजनीतिक पर्यटन बता रहे हैं।

गाड़ी में बैठ कर किसी बात पर हंसते इन लोगों की वीडियो में कैद हंसी तो इन प्राणियों को तुरंत सुनाई दे दी, लेकिन मृतका की मां का एंबुलेंस की बोनट पर सिर पटक-पटक कर रोना सुनाई नहीं दिया। इन्हें डीएम की परिवार को नसीहत देने के अंदाज में दी जाने वाली धमकी सुनाई नहीं दी। अगर विपक्षी नेताओं का यह पॉलिटिकल टूरिज्म है तो इस वक्त सत्ता के पंखों पर सवार होकर हवा में उड़ने वाले पत्रकारों को ऐसे टूरिज्म पर जाने से किसने रोका है। वे भी हाथरस जाएं और वस्तुस्थिति का जायजा लें। लेकिन उससे पहले सरकार की चाकरी से इस्तीफा दें, जाति और धर्म के अभिमान को छोड़ें, खांटी इंसान बन कर वहां जाएं, तो शायद उन्हें भी वो सब दिखाई-सुनाई देने लगे, जो किसी भी संवेदनशील इंसान को नजर आ रहा है। हत्या और बलात्कार जैसे अपराध अनादिकाल से होते रहे हैं।

इनका धर्म, संस्कृति या संस्कृत से कोई वास्ता नहीं है। कुरुसभा में भी द्रौपदी के चीरहरण पर सबने अपनी-अपनी सुविधानुसार आचरण किया था और बड़ी चालाकी से धर्म की आड़ ले ली थी। धृतराष्ट्र तो जन्म, पुत्रमोह और सत्तामोह सब वजहों से नेत्रहीन थे, भीष्म को राजगद्दी के लिए वफादारी निभानी थी, विदुर को महामंत्री होने का धर्म निभाना था और गुरु द्रोण को अश्वत्थामा की चिंता थी, कर्ण अपने अपमान का बदला लेने में ही लगे थे। युधिष्ठिर धर्म की खातिर जुआ खेलते रहे और उनके बाकी भाई अपने परिवार का धर्म निभाते रहे। द्रौपदी अकेले ही अपमान की आग में झुलसती रहीं। आज भी स्थितियां महाभारत के जैसी ही हैं।

देश के हालात पर सब अपनी चिंता दिखाते हैं, लेकिन वह भी अपनी सुविधा के मुताबिक। जैसे योगीजी को इस वक्त अपने प्रदेश में स्त्रियों, खासकर दलित महिलाओं के साथ हो रहे उत्पीड़न पर चिंतित होना चाहिए। लेकिन उन्हें राज्य के विकास की चिंता अधिक है। उनका कहना है कि जिसे विकास अच्छा नहीं लगता,  वो जातीय और सांप्रदायिक दंगा भड़काना चाहते हैं। हाथरस के चंदपा थाना में एक एफआईआर भी दर्ज की गई है कि प्रदेश का माहौल खराब करने का अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र रचा जा रहा है।

अगर योगीजी को दंगा भड़कने की आशंका है तो क्यों नहीं दलित और विपक्षी नेताओं के साथ उन सवर्ण लोगों पर भी कार्रवाई की जाती जो सरेआम धमका रहे हैं। अभी दो साल पहले कठुआ मामले में भी इसी तरह धर्म और जाति के नाम पर गुमराह करने की कोशिश की गई थी। तब पीड़िता नाबालिग थी और अल्पसंख्यक समुदाय की थी, जबकि उसके अपराधी सवर्ण समाज के थे। उनके बचाव में भारत माता की जय के साथ तिरंगा रैली निकाली गई थी।

मोदीजी के सपनों का नया भारत कैसा होगा, यह उसकी एक मिसाल थी। बहुत हुआ नारी पर वार, अबकी बार मोदी सरकार, इस जुमले में यकीन रखने वालों को एक और बात पर यकीन रखना चाहिए कि इस नए भारत में जाति-धर्म देखकर अगर नारी पर वार होगा, तो उसके लिए सरकार जिम्मेदार नहीं होगी। जिम्मेदार तो यह समाज है, जो किसी भी घटना के बाद यह मान लेता है कि अब इससे अधिक नृशंसता और क्या होगी, लेकिन जाति-धर्म से बनी सत्ता के अधीन हमारी यह धारणा गलत साबित हो जाती है। कठुआ के बाद हाथरस हो जाता है। और इसकी निंदा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होती है, तो हम मानते हैं कि इससे सरकार को फर्क पड़ेगा।

लेकिन यकीन मानिए हम एक बार फिर गलत साबित होंगे। क्योंकि ये सरकार सुनसान, निर्जन सुरंग में हाथ हिलाकर अभिवादन करने की कला जानती है। आईपीएल के खिलाड़ियों की तरह इन्हें पैसे के बदले खेलने के लिए खुला मैदान चाहिए, फिर स्टेडियम खाली रहे और झूठी तालियां पड़ती रहें, इन्हें मतलब नहीं। इस सरकार को भी सत्ता का खुला मैदान मिल गया है, जहां रोज नए खेल हो रहे हैं। लोकतंत्र का गलियारा खाली हो रहा है, और उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ रहा।

(देशबंधु)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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