Home गौरतलब शतरंज की चाल में ‘मात’ वज़ीर की होती है, पैदल की नहीं..

शतरंज की चाल में ‘मात’ वज़ीर की होती है, पैदल की नहीं..

-अनिल शुक्ल।।

देस-दुनिया से लगातार आते ‘थू-थू’ के छींटो से अठारह दिन तक अपना चेहरा पोंछ डालने की कोशिश में एनेक्सी भवन (लखनऊ) के पांचवे तल पर बैठे मुख्यमंत्री शतरंज खेलते रहे। बाज़ी बिछा कर सामने बैठा जोड़ीदार लुलपुंज था। डरता-काँपता अपने पैदल को एक-एक कदम आगे बढ़ाता। जवाब में यह अपने पैदल को तो कदम भर आगे बढ़ा ही देते, गाहे-बगाहे अपने ऊंटों को भी ढाई-ढाई कदम आगे कुदा कर जोड़ीदार को आतंकित कर देते।

चोट के दर्द में बिलबिलाती लड़की की चीख़ों ने एनेक्सी भवन की खिड़कियों को इतनी बार थपथपाया कि वह लहूलुहान हो गईं लेकिन साउंडप्रूफ़ कमरे के भीतर बैठे मुख्यमंत्री को उन चीख़ों की कोई आवाज़ नहीं सुनाई पडी।धीरे-धीरे इन चीख़ों पूरे मुल्क़ की चीखें आ मिली। जब ये चीख़ें लखनऊ से चलकर दिल्ली तक पहुँचने लगीं तो लाल क़िले के प्राचीर पर बैठे सत्तानशीं कसमसाने लगे।


अठारवें दिन उनकी कसमसाहटों से लखनऊ का पांचवा तल कांपने लगा। जब दिल्ली से आने वाली कसमसाहटों से तल का भूतल काँपा तो मुख्यमंत्री भी काँप गए। आननफ़ानन में बादशाह कांपे तो क्या पैदल, क्या ऊँट, क्या हाथी, क्या वज़ीर- सभी काँप गए। अचानक इल्हाम हुआ कि हाथरस में निर्भया नाम की कोई दलित लड़की थी। न मालूम कैसे उसके साथ ज़्यादती हो गई। पता चला कि इस ज़्यादती में न मालूम कैसे और प्रशासन बीच में आ गया। अब पुलिस और प्रशासन है, कहीं भी बीच में आ सकता है। आ गया तो आ गया।लेकिन यहाँ तो ‘शह’ सामने आन खड़ी हुई। कहीं ‘मात’ न हो जाए के डर से क़ुर्बानियां देने का सिलसिला शुरू हुआ। क्या हाथी, क्या ऊँट, क्या पैदल एक-एक कर सब लुढ़काए जाते रहे। लखनऊ ने हाथरस को क़ुर्बान कर दिया।


अपनी खाल बचाने के लिए हो सकता है कि लखनऊ आने वाले दिनों में हाथरस से कुछ और क़ुरबानी वसूल करे। बिहार विधानसभा के चुनाव सामने हैं। हाथरस की धमक सारे हिंदुस्तान को अपनी चपेट में ले रही है तो पटना कैसे अछूता रह जायेगा? इस मुए हाथरस के चक्कर में कहीं पटना न हाथ से निकल जाए। दिल्ली की साख का सवाल है इसलिए हो सकता है कि अपनी साख बचाने के लिए दिल्ली लखनऊ से भी कुछ क़ुरबानी तलब कर डाले।


एसआईटी की भारी भरकम टीम ने चंदपा थाने के हेड मोहर्रिर महेश पाल को फटकारते हुए पूछ कि क्यों उसने गलत-सलत तहरीर दर्ज़ की। हेड मोहर्रिर ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया- मेरा क्या दोष? मुझे तो एस आई ने जो दर्ज़ करने को कई, वही मैंने कागज़ पर उतार दीनी। एसआईटी ने आवाज़ को और ऊंचा करके एस आई जगवीर सिंह से पूछा तो उसने और ज़्यादा मासूमियत से जवाब दिया- सरकार मेरा क्या दोष? मुझे तो एसएचओ दिनेश कुमार वर्मा ने जैसे कहा, वैसे मैंने कर दिया। दिनेश कुमार को तलब किया गया। वह मुरझाए स्वर में बोला-हुज़ूर मैं क्या करता? सीओ साब ने जो ऑर्डर किया, उसे पूरा न करता तो कहाँ जाता। सीओ रामशब्द की पेशी हुई। उसकी आँखों से आंसू बह निकले। सर मुझसे कुछ न पूछिए। पूछना है तो कप्तान साब से पूछिए। मैंने उन्हें कहा था कि सर ऐसा करना ठीक नहीं, मामला एससी का न बन जाए लेकिन उन्होंने मेरी एक न सुनी। एसपी ठाकुर विक्रांत वीर ने आकर सेल्यूट ठोंका। पूछा गया तो जवाब मिला- सॉरी सर, मेरा इसमें कोई दोष नहीं। हमें तो लखनऊ से आदेश यही है कि किसी ठाकुर को न सताया जाए।

एसआइटी टीम सवाल-जवाब करने लखनऊ की तरफ दौड़ पडी। रास्ते में कोई ज़िम्मेदार सीनियर मिल गया। फटकारा। नौकरी गँवानी है क्या? हाथरस लौटो और जो तीर मरना है वहीँ मारो।

एसआईटी वापस हाथरस लौट आई। गुस्से में एक ‘नोट’ लिखा और लखनऊ पांचवे तल भेज दिया। तब तक पांचवे तल की खिड़कियां देश भर से आने वाले शोरग़ुल से कांपने लग गई थीं। मुख्यमंत्री हाथरस पुलिस की फ़ाइल खोले बैठे थे। बाहर से आने वाले शोर से उनके कान पके जाते थे थे कि तभी पीए मोबाइल हाथ में लेकर भगा-भगा चला आया। ‘सर…… सर दिल्ली से कॉल है। मुख्यमंत्री एक हाथ से फ़ोन पकड़े आंखे बंद किए दूसरे हाथ के पैन से फ़ाइल पर ‘टिक’ मार्क करते चले गए। एक, दो, तीन, चार, पांच। फ़ोन कट गया। उन्होंने फ़ाइल बंद करके पीए से कहा- लो जाओ। आज के लिए इतना काफी है। पीए ने बगल में रखी ‘हाथरस प्रशासन’ की फ़ाइल दिखाई।
मुख्यमंत्री ने मुस्कराकर कहा- दिल्ली की अगली कॉल का इंतज़ार करो।


अलीगढ़ के ‘जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज’ के बेड पर सिसकियाँ भरती या कि दिल्ली के ‘सफदरगजंग हॉस्पिटल’ की आईसीयू में नीमबेहोशी में डूबती-उतराती निर्भया को नहीं मालूम था कि उसके नाम पर चलने वाली दिल्ली-लखनऊ की सियासत में बिछी शतरंज में कब शह को टालने के लिए पैदल को क़ुर्बान कर दिया जायेगा। उस मासूम को यह ख़बर थोड़े ही थी कि शतरंज में मात से बचने के लिए वज़ीर को भी हलाल हो जाना पड़ता है।

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