Home गौरतलब हाथरस में गुम हुआ इंसाफ..

हाथरस में गुम हुआ इंसाफ..

”मोहनजोदड़ो के तालाब के आखिरी सीढ़ी है / जिस पर एक औरत की जली हुई लाश पड़ी है/ और तालाब में इंसानों की हड्डियां बिखरी पड़ी हैं/ इसी तरह एक औरत की जली हुई लाश/ आपको बेबीलोनिया में भी मिल जाएगी/ और इसी तरह इंसानों की बिखरी हुई हड्डियां/ मेसोपोटामिया में भी मिल जाएंगी/ मैं सोचता हूं और बारहा सोचता हूं/ कि आखिर क्या बात है कि/ प्राचीन सभ्यताओं के मुहाने पर/ एक औरत की जली हुई लाश मिलती है…” 

कवि रमाशंकर यादव ‘विद्रोही की कविता मोहनजोदड़ो की आखिरी सीढ़ी से, की ये चंद पंक्तियां आज के हालात पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं। हाथरस में जब पीड़िता को न्याय की जगह अपने घरवालों की गैरमौजदूगी में, गैर लोगों के हाथों अंतिम क्रिया नसीब हुई, तो सचमुच लगा कि हम सभ्यता के अंत पर आ पहुंचे हैं। यह लगा कि उस युवती के साथ एक बार फिर बड़ा अन्याय हुआ है। एक बलात्कार की घटना की तुलना दूसरे बलात्कार से नहीं की जा सकती, क्योंकि दोनों में पीड़िता को मानसिक-शारीरिक यंत्रणा से गुजरना ही पड़ता है, लेकिन दो सरकारों के रवैये की तुलना तो की जा सकती है। मरने के बाद कम से कम दिल्ली की निर्भया को सम्मान नसीब हुआ, जबकि हाथरस की पीड़िता उससे भी वंचित रह गई।

2012 दिसंबर में दिल्ली की निर्भया को इलाज के लिए कांग्रेस सरकार ने सिंगापुर भेजा था, जहां उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनका पार्थिव शरीर एयर इंडिया के विशेष विमान से दिल्ली लाया गया और एयरपोर्ट पर प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी मौजूद थीं। अंतिम क्रिया से पहले मृत देह को घर ले जाया गया, सारे धार्मिक संस्कार पूरे हुए। फिर श्मशान लाकर सूर्योदय होने का इंतजार किया गया, क्योंकि यही हिंदू धर्म के संस्कार हैं। पुलिस वाले चाहते थे कि पहले ही अंतिम संस्कार हो जाए ताकि कानून व्यवस्था काबू में रहे, लेकिन परिजनों की भावनाओं की कद्र की गई। अंतिम संस्कार के दौरान दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भी मौजूद थीं। जबकि हाथरस मामले में उत्तरप्रदेश और केंद्र दोनों जगहों की भाजपा सरकार का रवैया नितांत क्रूर रहा। मुख्यमंत्री योगी से लेकर प्रधानमंत्री मोदी तक तो संवेदना के दो बोल बोलने में समय लग गया। आरोपियों को गिरफ्तार तो कर लिया गया है, लेकिन पीड़ित परिवार के साथ जिस तरह का रवैया सरकार का है, उससे डर लग रहा है कि कहीं उन्हें ही दोषी न साबित कर दिया जाए। 

हाथरस पीड़िता के शव को पहले तो चोरी-छिपे न जाने किस ज्वलनशील पदार्थ से ठिकाने लगाने के अंदाज में पुलिस वालों ने जला दिया। उसके बाद इस का कवरेज कर रहे पत्रकारों को धमकाने की भी कोशिश प्रशासन की हुई। विपक्ष के नेताओं को हाथरस पहुंचने से पहले रोका गया। लेकिन मीडिया और विपक्ष के लगातार आवाज उठाने के कारण सरकार की किरकिरी हुई, तो गांव की किलेबंदी को खोला गया। कुछेक अधिकारियों को सस्पेंड कर योगीजी ने ये संदेश देने की कोशिश की कि वे वाकई पीड़ित परिवार को न्याय दिलाना चाहते हैं।

लेकिन सचमुच ऐसा ही है, तो यह सदाशयता उन्होंने घटना की जानकारी लगते साथ ही क्यों नहीं दिखाई, क्यों अपनी सरकार के संवेदनहीन अफसरों के हवाले इस मामले को छोड़े रखा। अगर पीड़ित परिवार के साथ सरकार सचमुच है तो फिर उनके नार्को टेस्ट की बात क्यों उठी। क्या मौत से पूर्व लड़की के दिए बयान को सच नहीं मानना चाहिए। जिस परिवार ने पहले ही अपनी बेटी को इस तरह की क्रूर परिस्थितियों में खो दिया है, उनके साथ उदारता दिखाने में योगी सरकार ने कंजूसी क्यों की।

 30 सितंबर से लेकर अब तक सरकारी अधिकारियों या भाजपा नेताओं के ऐसे बयान सामने आए हैं, जिनसे पता चलता है कि ये सरकार पीड़ितों के पक्ष में कभी खड़ी नहीं हो सकती। पुलिस शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों पर लाठीचार्ज करती है, डीएम पर परिवार के ऊपर दबाव बनाने का आरोप है, भाजपा विधायक सुरेंद्र सिंह लड़कियों को संस्कार देने की वकालत कर रहे हैं, ताकि रेप रुक सकें। उन्हें लड़कों के संस्कारों में कोई कमी नजर नहीं आती। और इन सबके बीच योगीजी माताओं-बहनों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्धता जैसे सतही बयान दे रहे हैं। एक क्रिकेटर की उंगली पर चोट लगने पर ट्वीट करने वाले प्रधानमंत्री मोदी की सहानुभूति पीड़ित परिवार के साथ नजर नहीं आती, या शायद वे मन की बात के अगले संस्करण का इंतजार कर रहे हैं, जब वे इस मामले पर कोई प्रवचन देंगे। भाजपा के नेताओं में उमा भारती जैसे अपवाद को छोड़कर इस बात पर किसी को आपत्ति नहीं थी कि पीड़ित परिवार तक मीडिया या विपक्ष को पहुंचने से क्यों रोका जा रहा था। उन्हें तो राहुल गांधी-प्रियंका गांधी का हाथरस जाना भी राजनैतिक स्टंट दिख रहा था।

लेकिन जिस तरह प्रियंका गांधी ने बेटी खो चुकी मां को गले लगाया, या राहुल गांधी ने पिता का हाथ पकड़कर सिर झुकाया, ये तस्वीरें बयां करती हैं कि राजनेता सही मायने में कोई तभी कहला सकता है, जब पीड़ित, वंचित के साथ खड़े हो कर उनका दर्द बांटने का जज्बा हो। वैसे सोशल मीडिया पर एक तस्वीर और दिख रही है जिसमें दिल्ली की निर्भया के पिता झुककर मोदीजी का हाथ पकड़े हैं और हमारे प्रधानमंत्री तन कर खड़े हैं। 

चुनावों के वक्त मोदी बनाम राहुल की प्रतियोगिता चलाने वालों को राहुल गांधी और नरेन्द्र मोदी की इन तस्वीरों की तुलना भी जरूर करना चाहिए। और जो लोग इस बात पर आपत्ति कर रहे हैं कि हाथरस मामले में कांग्रेस राजनीति कर रही है, उन्हें इस बात पर भी आपत्ति जरूर होनी चाहिए कि राजनीति न सही, सत्ता में बैठे होने की जिम्मेदारी भाजपा क्यों नहीं उठा रही है।

2017 के विधानसभा चुनावों में तत्कालीन सपा सरकार में महिलाओं की सुरक्षा को भाजपा ने बड़ा मुद्दा बनाया था। लेकिन उन्नाव से लेकर हाथरस तक महिला का सम्मान दांव पर लगता रहा और भाजपा सरकार तुरंत एक्शन लेने की जगह पहले लीपापोती की कोशिश करती नजर आई। किसी मामले पर एसआईटी गठित करने या सीबीआई जांच के आदेश देने से इंसाफ नहीं मिल जाता, इंसाफ पीड़ित के पक्ष में शक्तिशाली के खड़े होने से मिलता है। हाथरस में यह इंसाफ अब तक गुम है या मोहनजोदड़ो के तालाब में डूब चुका है।

(देशबंधु)

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