अब किस जांच एजेंसी पर भरोसा करेंगे आप?

भाजपा की घटिया राजनीति और राहुल गांधी की राजनीति पर एक नजर

-संजय कुमार सिंह।।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जांच की मांग राजनीतिक थी। भले ही सुशांत के प्रशंसक होने के नाते दुनिया भर के लोगों ने इस मांग का समर्थन किया पर मांग राजनीतिक थी और यही राजनीति है। राजनीति जो भारतीय जनता पार्टी देश में कर रही है। ऐसी राजनीति जिसमें देश के संसाधन, ऊर्जा और समय की बर्बादी होती है जनता को कोई लाभ नहीं होता है और लक्ष्य भाजपा का भला होता है। हालांकि, राजनीति का एक बड़ा हिस्सा यह भी है कि भाजपा की सफलता को हिन्दुओं की सफलता से घोषित रूप से जोड़ दिया दिया गया है और इसका अघोषित मतलब है मुसलमानों को परेशान करना, कसना या किंकर्तव्यविमूढ़ करके छोड़ देना पर वह अलग मुद्दा है।
मूल विषय पर आने से पहले यह चर्चा कर लेना भी जरूरी है कि सरकार के लिए मुख्य रूप से राहुल गांधी और वैसे कांग्रेस पार्टी मुख्य प्रतिद्वंद्वी हैं। कांग्रेस मुक्त भारत का नारा राहुल गांधी की राजनीति से बुरी तरह पिटा और ऐसा पिटा कि कोई भूले-भटके भी नाम नहीं लेता। इसके बाद राहुल गांधी को पप्पू साबित करने का अभियान शुरू हुआ। उसमें और तमाम उल्टी-सीधी बातों के अलावा एक मुख्य रणनीति यही है कि राहुल गांधी जो करे उसका मजाक उड़ाओ, ट्रोल करो। अगर यह राजनीतिक चाल है तो इसका राजनीतिक मुकाबला भी अच्छा हुआ है। और भाजपा समर्थक कई बार जिसका विरोध करते थे उसी का समर्थन करते पाए गए हैं और इसमें यह तस्वीर सबसे अकाट्य है। हम करें तो रास लीला आप करें तो कैरेक्टर ढीला कहने की जरूरत नहीं है। याद भर दिला देना काफी है। हालांकि नरेन्द्र मोदी ऐसे कब सड़क पर रहे याद नहीं आता है।


इस क्रम में राहुल गांधी कुछ ना करें, विदेश चले जाएं तो विदेश चले गए और सड़क पर उतर जाएं को राजनीति कर रहे हैं। यहां जाएं तो वहां नहीं गए वहां जाएं तो यहां नहीं गए – चलता रहा और राहुल गांधी ने अपने ढंग से जवाब दिया और इतने सफल रहे कि अब तो यह भी कहा जाता है कि भाजपा की अंदरूनी लड़ाई में उन्हें राजनीतिक लाभ दिया जा रहा है। सच चाहे जो हो अभी मुद्दा वह नहीं है। पर यह तो दिख गया कि राजकुमार ने सड़क पर जाहिलों और जाहिलियत का भी बाकायदा मुकाबला किया और जुलूस निकल गया।

मैं राहुल गांधी की तारीफ नहीं कर रहा। मैं सिर्फ यह बताना चाह रहा हूं कि एक तरफ थे लंबे चौड़े दावे, भारी आरोप, दूसरी तरफ राजकुमार, वंश परंपरा आदि आदि। पर जनता के करीब कौन है। जनता के हित की बात कौन कर रहा है। मंदिर अगर बन रहा है और धारा 370 हट गई तो लाभ क्या हुआ और विदेश में भारी मात्रा में काला धन रखा था तो भुला क्यों दिया गया?


राजनीति इतनी फूहड़ हो सकती है, इसका अंदाजा बहुतों को नहीं था। मुझे तो बिल्कुल नहीं। इसमें मीडिया का ऐसा बेशर्म सहयोग रहेगा यह तो कल्पनातीत है। बेशक इसका बड़ा हिस्सा सरकारी एजेंसियों के डर और सरकारी विज्ञापनों के लालच से हासिल किया गया है। एक वर्ग मीडिया में घुसे संघियों का भी है जिन्हें सुनियोजित ढंग से मीडिया में प्लांट कराया गया है या मीडिया के धंधे में लगाया गया है। ऐसे लोगों का नाम गिनाने की जरूरत नहीं है, आप जानते हैं। ध्यान से देखेंगे तो समझ में आएगा कि कांग्रेस की राजनीति इससे अलग है। यह आदर्श है या पप्पूपना यह अलग मुद्दा है पर अंतर साफ दिख रहा है। हालांकि मेरा मुद्दा सुशांत की मौत की जांच पर हंगामा था। आप देखिए कि कैसे महाराष्ट्र पुलिस को बदनाम किया गया और इस नाते सीबीआई से लेकर नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो तक की पोल खोल गई पर किसी ने परवाह नहीं की।
आपने पढ़ा होगा कि अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली ने सुशांत की हत्या की आशंका से इनकार कर दिया है। इसे आत्महत्या के लिए लटककर मरने का मामला माना गया है। जो लोग बिना विवरण जाने मुंबई पुलिस की जांच या निष्कर्ष पर यकीन नहीं कर रहे थे उन्हें पूरा हक है कि वे इसपर भी यकीन नहीं करें पर सन्नाटा है। हालांकि, वह अलग मुद्दा है। मैं अभी दूसरे मुद्दे की चर्चा करना चाहता हूं और वह है – हाथरस का मामला। यहां अभियुक्त पक्ष कह रहा है कि बलात्कार नहीं हुआ था और ऐसा मानने के पर्याप्त कारण हैं कि सरकार भी कोशिश में है कि मामले को हल्का कर दिया जाए। यहां यह सब तब हो रहा है जब मौत हो चुकी है। स्पष्टतः यह आत्महत्या नहीं है और कोई अभियुक्त भी होगा और उसे सजा मिलनी चाहिए। लेकिन यहां मौत या हत्या तो जैसे मुद्दा ही नहीं है। जो लोग हैदराबाद बलात्कार और हत्या के मामले में अभियुक्तों को तुरंत फांसी की मांग कर रहे थे और उन्हें मुठभेड़ में मार ही दिया गया वे हाथरस के मामले में अभियुक्तों पर गलत आरोप लगने से ही परेशान हैं।
मुंबई में हुए अपराध की जांच बिहार पुलिस कर सकती है। लेकिन उत्तर प्रदेश की बलात्कार पीड़िता या संदिग्ध मौत की शिकार का शव रातो रात जला दिया जाएगा। पीड़ित परिवार से मिलने किसी को जाने नहीं दिया जाएगा। और जनता को कुछ गलत नहीं लगेगा। मुंबई में सब सही लग रहा था यहां भी सब सही है। उत्तर प्रदेश सरकार ने तो लोगों को हाथरस जाने से रोकने के नाम पर पुलिसिया ज्यादती की हद कर दी है और उसपर पीड़ित परिवार का नार्को टेस्ट कराने का मामला। पर सरकार की तरफ से जो झूठ बोले गए या झूठ लग रहे हैं उनकी जांच के लिए कौन सा नार्को होगा? और नार्को होना ही है तो पीड़ित पक्ष का, कमजोर पक्ष का क्यों नहीं? अभियुक्तों और बचाने की कोशिश करते नजर आ रहे लोगों का क्यों नहीं?
यह अंतर क्यों है? सुशांत की मौत के मामले में आत्महत्या के बावजूद – कोई अपराधी था और उसे सजा दिलाना जरूरी था। हाथरस मामले में कोशिश है कि बलात्कार का आरोप खत्म हो जाए। यहां किसी की मौत महत्वपूर्ण नहीं है – भले हत्या की गई हो। दोनों मामलों में नागरिकों का एक वर्ग दो अलग सरकारों के खिलाफ और समर्थन में है। यह राजनीति है। गंदी राजनीति। इसमें नागरिक का कोई महत्व नहीं है। वह मुद्दा है। दुखद यह है कि नागरिक राजनीतिकों के झांसे में आ जाते हैं। मुंबई में सरकार ने बिहार पुलिस को रोका तो कितने लोगों को एतराज था यहां सरकार लोगों को पीड़ित परिवार से मिलने नहीं दे रही है। पीड़ित परिवार को ही घेर दिया गया था। दोनों अलग तरह के मामले हैं पर गंभीर कौन है? मुंबई मामले की जांच सीबीआई से कराने का आदेश केंद्र सरकार दे सकती थी। पर सीबीआई जांच के लिए कितना हंगामा हुआ?
हाथरस मामले में अभी तक का समाधान ही सीबीआई जांच की सिफारिश है। मांग तो नहीं के बराबर की गई। उसी सीबीआई की जांच जो बाबरी मामले में किसी को सजा नहीं दिला पाई। सुशांत मामले में जांच की पूरी खबर लगभग रोज लीक होने के बावजूद हत्या साबित नहीं कर पाई। पर सीबीआई की कार्यकुशलता पर कोई सवाल नहीं है। सीबीआई जांच के लिए हंगामा होता रहा – मिला क्या? दूसरी ओर, एक बच्ची से रेप के मामले में सरकारी कार्रवाई लचर होने के बावजूद यहां वैसा विरोध नहीं हुआ जैसा मुंबई में हुआ। कारण आपको समझना है। अगर आप बिहारी के लिए बोलेंगे, दलित के नहीं बोलेंगे तो आपके लिए कौन बोलेगा ये सोचिए और अगर आप समझते हैं कि आपको जरूरत ही नहीं पड़ेगी तो आपका यह सुकून बना रहे।
एक और दिलचस्प सवाल आता है राहुल गांधी राजस्थान क्यों नहीं जा रहे। वैसे तो राहुल गांधी शायद राजस्थान में ही हैं पर वो जो करें उसके अलावा तो हमेशा बहुत कुछ रहेगा और ये हमेशा पूछा जा सकता है कि ये क्यों नहीं, वो क्यों? यह तब है जब विपक्ष के नेता का ना काम है और ना अपेक्षा होती है कि वह सब कुछ करे। पर सरकार को तो सब कुछ देखना है। हर किसी को देखना है। लेकिन सवाल उससे नहीं होता है जबकि जहां तक राहुल गांधी के राजस्थान जाने की बात है – वहां क्यों जाएं? उनकी सरकार है। ठीक काम कर रही है। जिसे शिकायत है वह बोले। विपक्ष जाए। वहां तो रोक भी नहीं है। विपक्ष का काम होता है राजनीति करना। अन्याय है तो उसका विरोध करना। सरकार का काम होता है हर नागरिक को बराबर मानना बराबर सेवा देना। राजस्थान में कुछ गड़बड़ है तो विपक्ष को जाना चाहिए। हालत यह है कि भाजपा की जहां सरकार है वहां काम नहीं। जहां विपक्ष में हैं – वहां भी काम नहीं। पर आलोचना राहुल गांधी की – काम करें या घर में बैठें, दोनों स्थितियों में। राजस्थान में सीबीआई जांच की मांग क्यों नहीं हो रही है, मुंबई की तरह? क्योंकि उसका बिहार चुनाव से संबंध नहीं है, उप चुनाव नहीं है।

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