कोरोना के जाने के बाद मुंहदिखाई की जाएगी..

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-सुनील कुमार।।
कभी-कभी किसी महत्वहीन बात पर भी इसलिए लिखने को दिल करता है कि शायद उससे कुछ लोगों को सबक मिल जाए। अब अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और उनकी पत्नी दोनों कोरोना पॉजिटिव निकले हैं, जिसमें किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए। ट्रंप सार्वजनिक रूप से बिना मास्क रहते थे, और मास्क के लिए उनकी हिकारत अमरीकी लोगों के उस तबके जैसी थी जो कि मास्क जलाते थे, और यह दावा करते थे कि मास्क पहनने की बंदिश उनके बुनियादी संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ है। जिस तरह ट्रंप अधिकतर तथ्यों, तर्कों, और वैज्ञानिक बातों को खारिज करते रहते थे, उनका यह हाल होना ही था। अब उम्र भी इस बीमारी के लिए उनके साथ नहीं है, और उनकी नौजवान बीवी के मुकाबले उनके लिए यह अधिक खतरनाक है।

लोगों को याद होगा कि मध्यप्रदेश के गृहमंत्री भी इसी तरह बड़बोलेपन के शिकार थे, हैं, और सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी मास्क नहीं लगाते थे, और दंभ के साथ इस बात की घोषणा भी करते थे कि वे मास्क नहीं लगाएंगे। लेकिन जब शायद पार्टी ने उन्हें फटकारा, तब उन्हें यह बात समझ में आई कि उनका अहंकार तो मोदी के अनगिनत भाषणों के खिलाफ जा रहा है, और उन्हें विज्ञान को लात मारने की छूट तो है, मोदी की नसीहत को लात मारने की छूट उन्हें नहीं है। तब उन्होंने सार्वजनिक रूप से खेद जाहिर करते हुए कहा कि उनका मास्क न पहनने का उनका बयान कानून के खिलाफ है, और यह प्रधानमंत्री की भावनाओं के अनुकूल भी नहीं है, और वे अपनी गलती मानते हैं, खेद जाहिर करते हैं, मास्क पहनेंगे, और हर किसी से मास्क पहनने की अपील कर रहे हैं।

देश में बहुत से प्रमुख लोग, खासकर नेता बिना मास्क दिखते हैं। खुद प्रधानमंत्री मोदी मास्क के नाम पर जिस तरह से हलफ लगा और तह किया हुआ, प्रेस किया हुआ दुपट्टा चेहरे पर लपेटते हैं, वह नाक और मुंह को ढांकने के लिए बिल्कुल ही नाकाफी है। लेकिन अब उन्होंने इसे अपना एक अंदाज बना लिया है, और राजा से कौन कहे कि उनके नाक-मुंह ऊपर-नीचे से खुले हैं? लेकिन राजनीति में कदम-कदम पर ऐसे दुस्साहसी लोग दिखते हैं जो भीड़ में रहते हैं, इस बेमौके पर भी सहयोगियों से कंधे से कंधा भिड़ाकर चलते हैं, कानों में फुसफुसाते हैं, कैमरा देखते ही मास्क नीचे खींच लेते हैं। हालत यह है कि खास और आम सभी किस्म के लोग मास्क को नीचे खींचकर ठुड्डी पर इस तरह ले आते हैं कि आज दुनिया में सबसे अधिक दम किसी का घुट रहा है, तो वह ठुड्डी ही है। हमने इसी अखबार में एक बार मजाक में यह भी लिखा कि ईश्वर लोगों का ठुड्डी की हिफाजत का लगाव देखकर इंसानों के अगले मॉडल में ठुड्डी पर ही नाक लगाने वाला है ताकि नाक हिफाजत से तो रहे।

हम पिछले कुछ महीनों में कई बार इस बात को लिख चुके थे कि किस तरह कैमरे देखते ही नेताओं के मास्क उतर जाते हैं। अभी हाल के दिनों में कुछ अखबारों ने यह मुहिम भी शुरू की है, और अच्छी की है, कि नेताओं की तस्वीरें वे तब तक नहीं छापेंगे जब तक वे मास्क लगाए हुए नहीं रहेंगे। यह बात हर किसी को समझनी चाहिए कि जब कोई व्यक्ति नियम-कायदे तोड़ते हैं, कोई गलत काम करते हैं, तो वे कम से कम अपने आसपास के अपने मातहत लोगों के लिए एक बुरी मिसाल बन जाते हैं जिसे मानना लोगों के लिए सहूलियत का भी होता है। किसी दफ्तर के मुखिया अगर बिना मास्क के लापरवाह रहते हैं, तो पूरा दफ्तर लापरवाह होने लगता है, किसी परिवार में मुखिया अगर मास्क या दूसरे मामलों में लापरवाही बरतते हैं, तो परिवार के बाकी लोग भी उन्हें देखकर खतरे में पड़ते हैं।

लोगों को तो यह चाहिए कि वे जिन लोगों से सामान खरीदते हैं उन्हें देख लें कि उन्होंने मास्क लगाया हुआ है या नहीं। जो लोग नाक और मुंह ढांके बिना सामान बेच रहे हैं, उनसे सामान खरीदना भी खतरनाक हो सकता है क्योंकि उनके पास आने वाले बहुत से ग्राहकों से उन्हें भी संक्रमण का खतरा अधिक रहेगा, और उनसे सामान खरीदने पर आपको भी। पता नहीं किस दुस्साहस से आज लोग सडक़ के किनारे चाट-गुपचुप खाते ऐसे ठेलों पर खड़े दिखते हैं जहां ठेले वाले ने मास्क लगाया हुआ नहीं रहता। हम सडक़ किनारे उस वक्त भी लोगों को ठेलों पर खाते देखते थे जब सिर्फ पैक करके ले जाने की छूट थी। यही तमाम लापरवाहियां रहीं कि कोरोना इतनी तेजी से बढ़ा। और अब जैसे-जैसे लॉकडाउन घट रहा है, वैसे-वैसे इसके बढऩे के खतरे बढ़ते चलेंगे। दुनिया के कई देशों ने एक बार घटने के बाद कोरोना का ग्राफ फिर आसमान पर पहुंचते हुए देखा है, हिन्दुस्तान में छत्तीसगढ़ जैसे राज्य अभी कोरोना को बढ़ते हुए ही देख रहे हैं, और बाकी दुनिया अगर कोई मिसाल है, तो हो सकता है कि आने वाले महीनों में घटने के बाद एक बार फिर इसका दूसरा दौर भी आए। यह बीमारी, इसका इलाज का खर्च, और पूरे परिवार का क्वारंटीन या आइसोलेशन सबको तोडक़र रख सकता है, बहुत से हट्टे-कट्टे और पूरी तरह सेहतमंद लोगों को भी मार सकता है। हमने अपने आसपास ऐसे लोगों को कोरोना से मरते देखा है जिन्हें पहले कोई भी बीमारी नहीं थी, जिनकी उम्र भी बहुत अधिक नहीं थी, और जो प्रदेश के सबसे महंगे निजी अस्पतालों में अपने सारे प्रभाव के साथ भर्ती थे, फिर भी चिकित्सा विज्ञान उन्हें नहीं बचा पाया।

आज बहुत से लोग इस बात को लेकर लापरवाह हो चले हैं कि जो घर पर ही रहते हैं उनको भी कोरोना हो रहा है, जो इतनी सावधानी बरतते हैं उनको भी हो रहा है, ऐसे में इंसान अगर काम नहीं करेंगे तो भूख से मर जाएंगे, उससे तो अच्छा है कि कोरोना ही ले जाए। लेकिन ऐसी तमाम बातें निहायत बकवास की रहती हैं, और लोगों को काम करने के लिए कहीं से भी लापरवाही जरूरी नहीं रहती, लोग सावधानी के साथ भी काम कर सकते हैं। और लोगों को यह भी समझना चाहिए कि कोरोना कोई कैलेंडर नहीं है कि वह 31 दिसंबर को चल बसेगा। हो सकता है कि कई महीनों बाद भी कोई असरदार टीका न बन पाए, बने तो देश के आम लोगों तक न पहुंच पाए, और पहुंच भी जाए तो भी हो सकता है कि उसका असर कुछ महीनों में खत्म हो जाए। ऐसे बहुत से सवाल अभी हिफाजत के रास्ते में खड़े हुए हैं। इसलिए आज तमाम लोगों को बहुत सावधान रहने की जरूरत है, और जिम्मेदारी की जगहों पर बैठे हुए नेता, अफसर, मशहूर लोग अगर लापरवाही दिखाएंगे, तो हो सकता है कि वे खुद तो दुनिया में मौजूद सबसे महंगे इलाज की वजह से बच जाएं, लेकिन जिन लोगों को वे अपनी मिसाल सामने रखकर लापरवाह बनाएंगे, उनमें से अधिकतर तो ऐसा कोई इलाज पा नहीं सकते। इसलिए आज किसी भी मशहूर या ताकतवर व्यक्ति को अपने घमंड को, अपने दुस्साहस को संक्रामक नहीं बनने देना चाहिए ताकि वह लापरवाही बनकर दूसरों के दिमाग में भी घर कर जाए। लोगों को सोशल मीडिया पर ऐसे लोगों को रोकना-टोकना चाहिए जो कि मास्क उतारकर कैमरों के सामने अपना हॅंसता हुआ नूरानी चेहरा दिखाने को बेताब रहते हैं। लोगों को इस बारे में अधिक से अधिक लिखना चाहिए, कार्टून और दूसरे पोस्टर बनाने चाहिए, वॉट्सऐप पर फैलाना चाहिए, और सार्वजनिक रूप से लोगों को याद दिलाना चाहिए कि उनका चेहरा अभी भूल नहीं गया है, इसलिए उसे ढांककर रखें, और कोरोना के जाने के बाद मुंहदिखाई की जाएगी तब तक ट्रंप बनने की कोशिश न करें। कोरोना एक अदृश्य हमलावर है, और उसके सामने अपने चेहरे का दृश्य प्रस्तुत न करें।

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