सेक्स आदमी ही नहीं महिला की भी ज़रूरत है..

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-श्याम मीरा सिंह।।

जस्टिस मार्केंडेय काटजू द्वारा Rapes की जड़ों में बढ़ते Unemployment को बताने वाली पोस्ट को लेकर सोशल मीडिया पर आई प्रतिक्रियाओं से साफ हो गया है, फेसबुक गम्भीर बौध्दिक बहसों के विमर्श के लिए सही जगह नहीं है। यहां विषयों का मूल्यांकन तथ्यों पर नहीं बल्कि भावनाओं में बहकर किया जाता है। उनकी जिस पंक्ति को उठाकर सबसे अधिक भद्दी टिप्पणियां की गईं, वो पंक्ति ये थी कि “Sex is a natural urge in men”. इसके बाद अधकचरे बुद्धजीविवाद में उफने हुए युवक-युवतियों ने काटजू को घेर लिया। जबकि ये साइंटिफिक बात है कि “Sex is a natural urge in men”. सेक्स आदमी ही क्यों औरत की भी अपरिहार्य इच्छा है, और ये सामान्य सी बात है। लेकिन चूंकि काटजू ने ये बात उस समय कही जबकि रेप को लेकर पूरे देश में उत्तेजना फैली हुई है, ऐसे में Under cooked आइडियाज वाले विश्लेषकों के लिए काटजू को वैचारिक विलेन बनाना ईजी हो गया। यहां एकबात समझ लेने की है कि जब आप किसी को “वैचारिक विलेन” बना रहे होते हैं तब आप खुद को “वैचारिक नायक” की तरह प्रस्तुत भी कर रहे होते हैं। मोटामाटी ये कि इसके विचारों में सड़ांध है, मेरे विचारों में नवीनता है।

ये सर्वविदित तथ्य है कि हमारे देश में शादियां ही सेक्स के लिए सुलभ स्थल हैं, उसके अलावा सामान्य स्त्री-पुरुषों के लिए सेक्स सुलभ नहीं है, सेक्स को लेकर ये समाज पहले से ही पीड़ित है, ऐसे में बढ़ते Unemployment ने फ्रस्ट्रेटेड पुरुषों के लिए शादी से सेक्स मिलना और अधिक मुश्किल कर दिया। सेक्स एक सहज अभिव्यक्ति है लेकिन भारत जैसे देश में सेक्सुअल एक्सपोजर को इतना अधिक दबाया गया है कि वह जब भी बाहर आता है तो अपने सबसे विकृत और विद्रूप रूप में बाहर आता है। भारत में रोजगार प्राप्त पुरुषों में ही सेक्स को लेकर अत्यधिक फ्रस्टेशन है, ऐसे में Unemployment ने ऐसी फ्रस्टेशन को और अधिक विकराल बना दिया है। यहां एक बात स्पष्ट कर रहा हूँ कि Unemployment/employment/Rich/poor होना आपको किसी के साथ अपराध करने की छूट नहीं देता। लेकिन इसका अर्थ ये नहीं है कि इन घटनाओं के मूल में Poverty, Unemployment, illiteracy, sexual suppression, Regressive society नहीं है।

ये बात समझने की है कि Unemployment केवल सेक्स की एक्सेसिबिलिटी से ही जुड़ा हुआ मसला नहीं है, ये एजुकेशन की एक्सेसिबिलिटी से जुड़ा हुआ मसला भी है, ये कानून व्यवस्था से जुड़ा हुआ मसला भी है, जहां Unemployment अधिक होगा वहां कानून व्यवस्था हमेशा वल्नरेबल रहेगी। वहां शिक्षा और जागरूकता की स्थिति भी संवेदनशील होगी। इसलिए रेप से जुड़े मसलों के समाजशास्त्रीय विश्लेषणों में Unemployment के योगदान की उपेक्षा नहीं की जा सकती।

काटजू ने अपने लेख में Unemployment को बढ़ते रेप्स का कारण बताया। लेकिन उनके लेख में एक प्रॉब्लम ये रही कि उन्होंने ये तो लिखा कि Unemployment बढ़ते रेप्स का कारण है, लेकिन ये नहीं लिखा कि ये एकमात्र कारण नहीं है, इसके अलावा भी बाकी बड़े बड़े कारण हैं, बढ़ते दुष्कर्मों के पीछे जेंडर को लेकर हमारी परवरिश, स्त्री के प्रति समाज का attitude, अपराधियों में कानून का भय, देश का ज्यूडिशियल सिस्टम एवं मीडिया, सरकार और सामाजिक संगठनों की प्राथमिकताएं भी बराबर जिम्मेदार हैं। लेकिन काटजू के छोटे से आलेख में इनका जिक्र नहीं था, ये काटजू की स्वतंत्रता पर छोड़ता हूँ कि उन्हें कितना लिखना है, इस बात से भी वाकिफ हूँ कि कई बार आदमी किसी घटना के सभी कारणों पर लिखने के बजाय एकाध कारण पर ही लिखता है। ऐसे ही काटजू ने सिर्फ एक कारण पर लिखा। लेकिन ऐसी स्थिति में भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है, बुद्धजीवी समाज अपनी विचारधाराओं के हिसाब से उसकी व्याख्या करता है। यही काटजू के मामले में हुआ। काटजू को चाहिए था कि वे ऐसे गम्भीर मसले पर “क्या, क्यों, कब, कैसे, कहाँ” का पूरा मूल्यांकन करते, ताकि भ्रम की स्थिति बचती ही नहीं। लेकिन ये काटजू की स्वतंत्रता है कि वे कितना लिखते हैं और किस विषय पर केंद्रित रहते हैं। उनके लेख को व्यख्यायित करने की जरूरत है, उसे और बड़ा करके लिखने की जरूरत है। लेकिन उन्होंने अगर एक ही पहलू पर लिखा है तब भी यह उतना बड़ा अपराध नहीं है कि काटजू को विलेन बना दिया जाए। काटजू ने जो कारण गिनाया वह असल में कारण है भी, वह तथ्यपरक है, लेकिन काटजू ये बताना भूल गए कि इसके अलावा भी कारण हैं, और वे इन कारणों को बताकर अपराधों को जस्टिफाई नहीं कर रहे।

काटजू के इस लेख के विरोध में लिखने वालों ने लिखा कि अगर कोई Unemployed है तो इसका अर्थ ये नहीं है कि वह किसी के भी साथ दुष्कर्म करने का अधिकारी हो जाता है। जबकि न तो काटजू ऐसा कहते हैं, न ही उनके लेख का ऐसा अर्थ निकलता है। किसी घटना की जड़ें बताने का अर्थ उन जड़ों का समर्थन करना नहीं होता। अगर मैं कहूँ कि दहेज के पीछे लालच है तो इसका अर्थ ये नहीं है कि मैं ये ये कह रहा हूँ कि अगर आप लालची हैं तो दहेज लेना सही है। इसका दूसरा उदाहरण ये कि जैसे मैं कहूँ कि लोग चोरी इसलिए करते हैं क्योंकि उनपर खाने, रहने के लिए आय का स्रोत नहीं है। अब इसका अर्थ ये नहीं है कि मैं ये कह रहा हूँ कि अगर आप पर आय का स्रोत नहीं है तो आप चोरी कर सकते हैं, या जो लोग चोरी कर रहे हैं तो वे गरीब होने के कारण अपराधी नहीं रह जाते। यही बात काटजू के आर्टिकल पर अप्लाई करने की जरूरत है अगर मैं कहूँ कि इस मुल्क के अधिकतर नागरिक Gender sensitise नहीं हैं, इसलिए महिलाओं के प्रति अपराध बढ़ रहे हैं। तो इसका अर्थ ये नहीं है कि मैं ये कह रहा हूँ कि जो जो लोग जेंडर के लिए संवेदनशील नहीं हैं वे महिलाओं के साथ अपराध कर सकते हैं।

किसी घटना की जड़ का नाम बताना, उस जड़ को जस्टिफाई करना नहीं होता। ऐसे ही अगर कोई कहे कि सेक्सुअल फ्रस्ट्रेशन का कारण सेक्स के लिए एक्सेसिबिलिटी का कम होना है तो वह गलत कहा हैं? और ये तो सच है कि Unemployment ने ये फ्रस्ट्रेशन और अधिक बढ़ाई है, ऐसा फ्रस्ट्रेटेड पुरुष, ऐसे सामान्य पुरुष जिसके लिए सेक्स सुलभ है के कंपेरिजन में महिलाओं के प्रति अधिक असंवेदनशील होगा। यही बात काटजू ने कही है।

काटजू की गलती ये है कि उन्होंने एक गम्भीर विमर्श को फेसबुक जैसे प्लेटफार्म पर रखा, जहां आज भी छक्के, और हिजड़े कहकर LGBT समाज का मजाक उड़ाया जाता है वहां स्त्रियों के प्रति अपराधों का समाजशास्त्रीय मूल्यांकन करना जोखिम भरा है, सोशल मीडिया गम्भीर विषयों पर मत लेने की सही जगह नहीं है, गर सही जगह होती तो ये देश पिछले 30 सालों से मंदिर-मस्जिद पर, और पिछले 3 महीने से रिया चक्रवर्ती पर बहस नहीं कर रहा होता। इसके अलावा फेसबुक पर जगह जगह उग आए नव बौध्दिक मठाधीशों के साथ भी ऐसे गम्भीर विषयों पर बहस करना जोखिम भरा है, जिनके ज्ञान का स्रोत ही फेसबुक पर पढ़ी किसी झंडाबरदार बुद्धजीवी की फेसबुक पोस्ट हों। ऐसे बुद्धजीवी तुरंत क्रिया- प्रतिक्रिया देने की उत्कंठा में होते हैं। इसलिए जब भी सिलेबस से बाहर का बौध्दिक विमर्श देखते हैं उनके सब्र का शीघ्रपतन हो जाता है। जिसकी अभिव्यक्ति वे टांगे हुए स्क्रीनशॉट पर थूक थूक कर करते हैं। ऐसा व्यक्ति आपको अपनी विचारधारा के बूढ़े शब्दकोश में से थके और घिसे पिटे टैग्स मारकर अपना झंडा उठाकर निकल लेगा। यही काटजू के साथ हुआ। जस्टिस काटजू को दी गई गलियों से यही निष्कर्ष निकलता है फेसबुक गम्भीर विषयों पर मत लेने की सही जगह नहीं।

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