Home अपराध क्यों नहीं रुक रहे हैं बलात्कार ?

क्यों नहीं रुक रहे हैं बलात्कार ?

-ध्रुव गुप्त।।

देश के हर कोने से जिस तरह हमारी मासूम बच्चियों के साथ बलात्कार, सामूहिक बलात्कार और उनकी नृशंस हत्याओं की खबरें आ रही हैं, उससे पूरा देश सदमे में है। आज यह सवाल हर मां-बाप के मन में है कि इस वहशी समय में वे कैसे बचाएं अपनी बहन-बेटियों को ? कभी आपने सोचा है कि आज देश में बलात्कार के लिए फांसी सहित कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान होने के बावज़ूद स्थिति में कोई बदलाव क्यों नहीं आ रहा है ? दरअसल बलात्कार को देखने का हमारा नजरिया ही गलत है। हम स्त्रियों के प्रति इस क्रूरतम व्यवहार को सामान्य अपराध के तौर पर देखते रहे हैं, जबकि यह अपराध से ज्यादा एक मानसिक विकृति, एक भावनात्मक विचलन है। पुलिस में तीन दशक के कार्यकाल में सैकड़ों बलात्कारियों से पूछताछ का मेरा अनुभव यह रहा है कि देश में क़रीब अस्सी प्रतिशत बलात्कार की घटनाओं के लिए अश्लील ब्लू फिल्में और नशा ज़िम्मेदार हैं। स्त्रियों के साथ यौन अपराध पहले भी होते थे, लेकिन अश्लील फिल्मों की सर्वसुलभता के बाद ये आंकड़े आसमान छूने लगे हैं। गूगल पर सहजता से उपलब्ध इन फिल्मों का सेक्स सामान्य सेक्स नहीं है। यहां आपकी उत्तेजना जगाने के लिए अप्राकृतिक सेक्स, हिंसक सेक्स, सामूहिक सेक्स, पशु सेक्स और चाइल्ड सेक्स भी हैं। ये फिल्में अगम्यागमन अर्थात पिता-पुत्री, मां-बेटे, भाई-बहन के बीच भी शारीरिक रिश्तों के लिए भी उकसाने लगी हैं। क्लिक भर कीजिये और सेक्स का विकृत संसार आपकी आंखों के आगे है। परिपक्व लोगों के लिए ये यह सब यौन-उत्तेजना के साधन हो सकते हैं, पर कच्चे दिमाग के किशोरों और अशिक्षित या अल्पशिक्षित युवाओं पर इसका गहरा दुष्प्रभाव पड़ता है। ऐसी फिल्मों के आदी लोग अपने दिमाग में सेक्स का एक काल्पनिक संसार बुन लेते हैं जिसमें स्त्री व्यक्ति नहीं, सिर्फ देह नज़र आती है। नशा ऐसे लोगों के लिए तात्कालिक उत्प्रेरक का काम करता है जो लिहाज़ और सामाजिकता का झीना-सा पर्दा भी गिरा देता है।

अब यह मत कहिए कि बच्चों को अच्छी शिक्षा और संस्कार देकर ही बलात्कार जैसे अपराध पर काबू पाया जा सकता है। इंटरनेट के इस युग में बच्चे हमसे-आपसे नहीं, यो यो हनी सिंह, सनी लियोनी और ब्लू फिल्मों के हर तरफ फैले तिलिस्मी संसार से ही सीखेंगे। इन्हें प्रतिबंधित कर के देखिए, स्थिति में गुणात्मक परिवर्तन निश्चित तौर पर आएगा। कुछ लोगों के लिए अश्लील फ़िल्में देखना उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मसला हो सकता है, लेकिन जो स्वतंत्रता सामाजिक नैतिकता और जीवन-मूल्यों को ही तार-तार कर दे, वैसी स्वतंत्रता को कुचल ही देना बेहतर है।

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